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    रूदबार नगर

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    पिछली कुछ कड़ियों में हरे-भरे व सुंदर गीलान प्रान्त की यात्रा को जारी रखते हुए इस कार्यक्रम में हम रूदबार शहर की चर्चा कर रहे हैं। ऐसा शहर जिसका इतिहास 6 हज़ार वर्ष पुराना है और यह तेहरान-रष्त राजमार्ग पर रष्त नगर से 67 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। रूदबार पर विहंगम दृष्टि डालने से यह नगर ज़ैतून के हरे वृक्षों से भरा दिखाई देता है। इसी प्रकार यह नगर मीठे खनिज पानी के भंडार से भी समृद्ध है। एक ऐसा नगर जिसकी पहचान उसका ऐतिहासिक मारलीक टीला है जिसे देखने के लिए विश्व के कोने कोने से लोग आते हैं। श्रोताओ आशा करते हैं कि रूदबार नगर पर चर्चा में हमारे साथ रहेंगे।

    रूदबार नगर रूदबार प्रांत का केन्द्र है और यह नगर भी गीलान के तलहटी नगरों में आता है। यह नगर अल्बुर्ज़ पर्वत श्रंख्ला के आंचल में बसा है। रूदबार नगर सफ़ेदरूद नामक नदी के किनारे लंबाई में ज़ैतून के घने बाग़ों के बीच बसा है। यह नगर नगरीकरण और प्रकृति के संगम का अद्भुत दृष्य पेश करता है। इस इलाक़े की अर्थव्यवस्था विशेष भौगोलिक स्थिति के दृष्टिगत कृषि और पशुपालन पर आधारित है।

    रूदबार का सबसे महत्वपूर्ण उत्पादन ज़ैतून है और ज़ैतून से तेल और साबुन उप-उत्पाद के रूप में प्राप्त होते हैं।

    रूदबार को गीलान के सबसे पुराने इलाक़ों में गिना जाता है। सफ़ेदरूद नदी के पूर्वी छोर पर गौहर रूद नामक एक सुंदर घाटी है। यह घाटी उपजाउ मिट्टी, अच्छी हवा, आर्द्रता पर्याप्त वर्षा जैसी विशेषताओं के कारण इस क्षेत्र का सबसे अच्छा स्थल है। गौहर रूद घाटी के बीच में इसी नाम की एक नदी भी बहती है जो सफ़ेद रूद नदी की छोटी शाखाओं में है।

    गौहर रूद घाटी में छोटे-बड़े टीले हैं जिनका प्राचीन कालों से संबंध है। इन टीलों में सबसे महत्वपूर्ण टीले का नाम मारलीक है। स्थानीय लोग इसे चेराग़ अली टीला कहते हैं। यह इस टीले के पुराने मालिक का नाम है। मारलीक समेत गौहर रूद घाटी के प्राचीन टीले अपने पेट में ऐसी प्राचीन सभ्यता के अवशेष समोए हुए हैं जिसे लोग भूल गए हैं। मारलीक टीला कि जिसके पेट में शताब्दियों तक मानव सभ्यता व कला के मूल्यवान ख़ज़ाने छिपे रहे, वास्तव में आयरन-सल्फ़ेट की चट्टान है और इसकी निचली परत प्राकृतिक रूप से ऐसी है कि टीले के भीतर बड़ी दरारें बनी हुयी हैं।

    वर्ष 1961-62 में तेहरान विश्वविद्यालय और पुरातन विभाग के आपसी सहयोग से मारलीक टीले की खुदाई आरंभ हुयी। खुदाई के दौरान इस टीले ने प्राचीन काल की भुलाई जा चुकी जातियों के क़ब्रस्तान के रूप में अपना परिचय कराया। इस बात की प्रबल संभावना है कि मारलीक टीला स्थानीय शासकों और युवराजों से विशेष क़ब्रस्तान रहा है जो दूसरी ईसापूर्व सहस्राब्दी के अंतिम और प्रथम ईसापूर्व सहस्राब्दी के आरंभिक काल में इस क्षेत्र पर शासन किया करते थे और अपने मृतकों को अपने काल की रीति-रिवाजों के अनुसार मूल्यवान वस्तुओं के साथ इस क़ब्रस्तान में दफ़्न किया करते थे।

    मारलीक टीले की खुदाई के दौरान लगभग 25 क़बरे कमरों के साथ प्रकट हुयीं कि इन सभी कमरों में पीतल और मिट्टी के बर्तन, सजावटी बटन, अनेक प्रकार की गदाएं, बरछी, तलवार, ख़ंजर, कांस्य और पीतल की प्रमिमाएं, हेलमेट, भाले की नोक, सोने और पीतल की सुइयां सहित और दूसरी बहुत सी वस्तुएं बरामद हुयीं। इसी प्रकार मनुष्य, वनस्पतियों और कोहान दार और पंख वाली गाय, सींगदार घोड़े के चित्र, बच्चों के खिलौने, ऊन कातने की तकली सहित इसी प्रकार के दूसरे उपकरण बरामद हुए जो इन जातियों की संस्कृति एवं जीवन शैली का परिचय देते हैं और इसी प्रकार मृत्यु के बाद के जीवन के संबंध में इन जातियों की आस्था का वर्णन करते हैं।

    मारलीक टीलों से बरामद कपड़े इस बात का पता देते हैं कि हज़ारों वर्ष पूर्व गीलान में बुनाई उद्योग किस स्तर तक प्रगति कर चुका था।

    खोज करने वालों को प्राप्त रोचक चीज़ों में एक मुहर भी है जिस पर मीख़ी लीपि में कुछ अंकित है। इसी प्रकार एक ऐसी मुहर प्राप्त हुयी जिस पर शिकार का दृष्य बना है। परातनविदों के अनुसार ये मोहर हज़ारों वर्ष पुरानी हैं।

    इन खुदाइयों के दौरान एक और बहुत ही मूल्यवान न अनुपम वस्तु प्राप्त हुयी जिसे मारलीक प्याला कहते हैं। यह प्याला शुद्ध सोने का बना है और 18 सेंटीमीटर ऊंचा है। इस प्याले पर उकेरे हुए चित्र 2 सेंटीमीटर उभरे हुए हैं। इस प्याले के चित्र को कलाकार ने हथौड़ी से बनाया है। प्याले के पेंदे में एक सुन्दर चित्र बना है। फूल के बीच में चमकता हुआ सूरज बना है कि जिसकी किरणें बराबर से बिखरी हुयी हैं। मारलीक जातियों के लिए सूर्य बहुत पवित्र था यहां तक कि ये जातियां सूर्य के प्रतीक को अधिकांश बर्तनों व धातु के प्यालों के पेंदे पर ज्यामितीय आकार के चकोतरे के रूप में चित्रित करत थीं। जब इन चकोतरों के चित्रों पर ध्यान देते हैं तो पाते हैं कि सूर्य सभी चीज़ के केन्द्र में है और सभी चीज़े उसके प्रकाश व जीवनदायक गर्मी से जीवन प्राप्त करती हैं। संगीत

    हालांकि मनुष्य 6 सहस्राब्दी ईसापूर्व धातु प्रयोग करने लगा था किन्तु मारलीक सभ्यता का एक गौरव धातु उद्योग विशेष रूप से पीतल उद्योग में विकास रहा है। मारलीक क्षेत्र में धातु की चट्टानें और बड़ी मात्रा में लकड़ी जैसे ईंधन के स्रोत पीतल के उत्पादन का कारण बने। मारलीक सभ्यता में एक और उद्योग जिसमें आश्चर्यजनक स्तर तक विकास हुआ वह शीशे के प्यालों का उत्पादन है। कहा जाता है कि ये शीशा उद्योग के आरंभिक नमूनों में गिने जाते हैं।

    मारलीक टीले से प्राप्त वस्तुओं में सजावटी साधन, शस्त्र, घरेलू प्रयोग की चीज़ें, बर्तन, मिट्टी और धातु की प्रतिमाएं शामिल हैं। यह वस्तुएं तेहरान में ईरान के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखी हैं।

    मारलीक का भ्रमण कि जिसके निवासी अपने काल में मानवीय सभ्यता के अग्रणियों में रहे हैं, हर देखने वाले के एक असाधारण अनुभव रखता है। मारलीक अपने रेतीले, कंकरी और मिट्टी के टीलों के साथ कि जो गांव के चारों ओर छोटे-बड़े आकार में मौजूद हैं, गीलान के लोगों और उनकी ऐतिहासिक सभ्यता के लिए गौरान्वित करने वाला दस्तावेज़ है।

    रूदबार के दूसरे दर्शनीय स्थलों में अम्मारमू का मक़बरा, इमामज़ादे मोहम्मद हनफ़िया का रौज़ा और दरफ़्क ज्वालामुखी हैं। हरज़ेवील नामक सरो का पुराना वृक्ष और कुमुदिनी की विशेष प्रजाति का सुंदर फूल जिसे स्थानीय भाषा में चलचेराग़ कहते हैं, रूदबार के अन्य आकर्षण हैं। कुमुदिनी की इस विशेष प्रजाति के फूल की ईरान की राष्ट्रीय धरोहर में गणना होती है।

    अब जबकि कुमुदिनी की विशेष प्रजाति की बात निकल आयी है तो इस मूल्यवान बनस्पति के बारे में और जानना बेहतर रहेगा। कुमुदिनी की इस विशेष प्रजाति का वैज्ञानिक नाम लीलियम डिडबूरी (Lilium Ledebourii) है। यह कुमुदिनी की गाढ़े रंग की प्रजाति में आती है। इसका पौधा 50 सेंटिमीटर से 150 सेंटिमीटर ऊंचा होता है। यह वनस्पति ईरानी कुमुदिनी की एकमात्र प्रजाति है जो सुंदरता की दृष्टि से इसकी दूसरी प्रजातियों के बराबर है। इसके पौधों में 15 से अधिक फूल वाले पौधे दिखने में आए हैं किन्तु आम तौर से इसके पौधों में 4 से 10 फूल होते हैं। यह प्रजाति अब तक गीलान प्रांत के एक इलाक़े में ही देखी गयी है और ईरान से बाहर आज़रबाइजान गणराज्य के लंकरान नगर में केवल होती है। चलचेराग़ नामक कुमुदिनी की विशेष प्रजाति रूदबार नगर में समुद्र की सतह से लगभग 2000 मीटर की ऊंचाई पर रूदबार के उपनगरीय क्षेत्र के अम्मारलू वार्ड के दमाश गांव में उगती है। यह अनुपम प्रजाति 57 हज़ार घन मीटर के क्षेत्रफल में उगती है। चलचेराग़ कुमुदिनी के पौधे में जून में फूल निकलते हैं। चूंकि यह बहुत ही सीमित स्तर पर उगता है इसलिए ईरान के पर्यावरण विभाग की ओर से इसे एक प्राकृतिक एवं दुर्लभ प्रजाति के रूप में वर्ष 1976 से संरक्षण प्राप्त है।

    यह भी बताते चलें कि ईरान में ज़ैतून को रूदबार से पहचानते हैं और रूदबार गीलान प्रान्त में एकमात्र स्थल है जिसे ज़ैतून की खेती का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र समझा जाता है। ज़ैतून के वृक्ष और इसके फल का बड़े धर्मों की पवित्र किताबों जैसे पवित्र क़ुरआन, बाइबल, और तौरैत में उल्लेख किया गया है। इस वनस्पति की मध्यपूर्व के दक्षिणी इलाक़े में तीन सहस्राब्दी ईसापूर्व से खेती होती आ रही है। इसका फल उपचारिक एवं पौष्टिक विशेषताएं रखता है तो इसके पत्ते को शांति का चिन्ह माना जाता है। गीलान प्रांत में केवल रूदबार में ज़ैतून होता है। ज़ैतून की खेती रूदबार की घाटियों या कम ढलाने वाले पर्वतांचल में होती है और यह इस इलाक़े की सबसे महत्वपूर्ण कृषि है। अकेले रूदबार नगर में पूरे ईरान का 83 प्रतिशत से अधिक ज़ैतून का उत्पादन होता है। ज़ैतून का एक भाग सीधे तौर से या बंद डिब्बे में उपभोग के लिए मुहैया रहता है जबकि दूसरे भाग से तेल के विशेष कारख़ानों में तेल निकाला जाता है। इस क्षेत्र का भ्रमण करने वाले ज़ैतून को उपहार के रूप में ख़रीदते हैं।