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    लालची कवि

    लालची कवि
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    प्राचीनकाल मे एक कवि था जो विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण किया करता था। वह लोगों की प्रशंसा में कविताएं कहता और उसके बदले में उनसे पैसे लेता था। उसका जीवन इसी प्रकार से गुज़र रहा था किंतु जीवन कठिनाइयों में व्यतीत हो रहा था। एक बार वह व्यक्ति संयोगवश ऐसे गांव से गुज़रा जहां पर चोर रहा करते थे। वास्तव में वह चोरों का गावं था। वहां पहुंचकर कवि ने स्वयं से कहा कि इस समय मेरा भाग्य भी मेरे साथ है। शायद मैं एक अच्छे स्थान पर आ गया हूं। क्योंकि सामान्यतः यहां के चोर पैसेवाले हैं। उचित यह होगा कि चलकर चोरों के मुखिया की प्रशंसा में कविता कहूं। कवि ने स्वयं से कहा कि चोरों ने क्योंकि बिना परिश्रम के पैसा कमाया है अतः वे दान दक्षिणा भी अच्छे ढंग से करेंगे और उनसे मैं जो कुछ भी चाहूंगा वे मुझको देंगे। इसके बाद वह सोचने लगा कि चोरों के बारे में कौन सी कविता कहूं? क्या मैं कविता में यह कहूं कि चोर अच्छा काम करते हैं? लेकिन इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग भी नहीं है। उसने स्वयं से कहा कि मैं दिल से तो यह बात कहूंगा नहीं बल्कि उनसे केवल पैसे लेने के लिए इस प्रकार की कविता कहूंगा। मुझको इससे क्या लेना-देना कि चोरों का काम अच्छा है या बुरा। मैं तो केवल अपना काम करूंगा। सामने वाला चाहे चोर और या अच्छा आदमी हो। मैं अपनी कविता में चोर को चोर कहूंगा और अच्छे को अच्छा कहूंगा। कवि ने एक कोने में बैठकर जल्दी में कुछ शेर कहे और चोरों के मुखिया के घर का रास्ता लिया। लोगों से पूछते-पूछते वह चोरों के मुखिया के घर पहुंचा। चोरों का मुखिया अपने घर की खिड़की के किनारे खड़ा हुआ था। उसने कवि से पूछा कि तुमको मुझसे क्या काम है? उसने कहा कि मैं कवि हूं और मैने तुम्हारी प्रशंसा में कविता कही है। यदि तुम अनुमति दो तो मैं अंदर आकर तुम्हारी प्रशंसा में कुछ शेर सुनाऊं। चोरों के मुखिया ने कहा की आवश्यक नहीं है कि तुम घर में ही आओ। वहीं पर खड़े होकर सुना दो। कवि ने कहा नहीं यहां पर नहीं सुना सकता देख नहीं रहे हो कितनी ठंड पड़ रही है। ठंड के कारण यहां पर तो ज़मी पर बर्फ जमी हुई है। तुम अनुमति दो कि मैं घर में आकर आग के किनारे बैठ कर तुम्हें शेर सुनाऊं। चोरों के मुखिया ने कहा कि बेकार की बातें मत करो। यदि कविता सुनाना है तो वहीं पर खड़े होकर सुनाओ वर्ना अपना काम करो। बेचारा कवि वहीं ठंड में खड़े होकर खिड़की के नीचे कविता सुनाने लगा। ठंड के कारण उसके हाथ-पैर कांप रहे थे। जब उसकी कविता समाप्त हुई तो वह इस बात की प्रतीक्षा करने लगा कि चोरों का मुखिया उसे कुछ उपहार दे। चोरों के मुखिया ने कवि की कविता को ध्यानपूर्वक सुना और कविता समाप्त हो जाने के बाद वह कवि को बहुत ग़ौर से देखने लगा। चोरों के मुखिया की इस बात से कवि बहुत प्रसन्न हुआ। वह मन ही मन सोचने लगा कि लगता है कि मेरी कविता से वह खुश हो गया है। अब ऐसा लगता है कि वह मुझको सिक्कों की थैली पुरुस्कार स्वरूप देगा। सिक्कों की थैली से मुझको इस ठंड मे गर्मी का आभास होगा। कुछ देर तो चोरों का सरदार कवि को देखता रहा फिर उसने आदेश दिया कि कवि के कपड़े उतारकर उसे गांव के बाहर कर दें। इससे पहले कि कवि कुछ कहे या आपत्ति करे उसके कपड़े उतारकर उसे ठंड में छोड़ दिया गया। बेचारा कवि उस ठंड में बर्फ़ जमी ज़मीन पर नंगे पैर और नंगे बदन, आगे बढ़ने लगा। वह बहुत ही जल्दी उस गांव से बाहर निकल जाना चाहता था। जब वह गांव से निकल रहा था कुत्तों ने उसका पीछा ले लिया। यह देखकर कवि ने ज़मीन से पत्थर उठाकर कुत्तों पर मारना चाहा ताकि वे डरकर भाग जाएं किंतु बर्फ़ जमने के कारण पत्थर भी धरती से चिपक चुके थे। उसने पत्थरों को धरती से अलग करने के बहुत प्रयास किये किंतु सफल नहीं हो सका। आख़िरकार थककर उसने क्रोध में धरती से जमे हुए पत्थरों पर ठोकर मारते हुए कहा कि यह कैसे बुरे लोग हैं जिन्होंने कुत्तों को तो छोड़ रखा है किंतु पत्थरों को धरती से चिपका दिया है। चोरों का मुखिया जो अपने घर की खिड़की से यह दृश्य देख रहा था और हंस रहा था उसे कवि का यह वाक्य अच्छा लगा। उसने कवि को कुछ इनाम देने का निर्णय किया। उसने आदेश दिया कि कवि को वापस गांव में लाया जाए। कवि जब वापस आया तो चोरों के मुखिया ने उससे क्षमा मांगी। उसने कहा कि कवि, तुम्हारी यह बात मुझको बहुत अच्छी लगी। तुम मुझसे जो कुछ मांगना चाहते हो मांग सकते हो। कवि ने जो यह जानता था कि चोरों से उसे कुछ भी नहीं मिलने वाला, कांपते हुए कहा कि मुझको मेरे कपड़े वापस कर दो। तुम आदेश दो कि मेरे कपड़े मुझको वापस कर दिये जाएं। कवि की स्थिति से चोरों के मुखिया को उसपर तरस आया। उसने आदेश दिया कि कवि के कपड़े वापस किये जाएं और साथ ही उसने थोड़े से पैसे और कुछ पहनने की चीज़ें उसे उपहार दीं।