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    वरिष्ठ नेता-३

    वरिष्ठ नेता-३
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    वर्ष 1368 हिजरी शम्सी में इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी के स्वर्गवास के बाद आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई ने एक जागरुक व अनुभवी हस्ती के रूप में इस्लामी क्रान्ति का नेतृत्व संभाला। उन्होंने ऐसे समय ईरान में नवस्थापित इस्लामी क्रान्ति का नेतृत्व संभाला जब इमाम ख़ुमैनी के स्वर्गवास के पश्चात साम्राज्यवादी सरकारें इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था को समाप्त करने के लिए एकजुट हो गयी थीं। ईरान के विरुद्ध व्यापक आर्थिक प्रतिबंध, सद्दाम द्वारा थोपे गए युद्ध से हुयी तबाही, राजनैतिक दबाव व दिगभ्रमित करने वाले प्रचारों के कारण इस्लामी क्रान्ति के शत्रुओं के बुरे लक्ष्य के व्यवहारिक होने की पृष्ठभूमि तय्यार दिखाई दे रही थी किन्तु ईश्वर की कृपा, वरिष्ठ नेता की सूझबूझ तथा ईरानी जनता द्वारा अपने नए नेता को पूर्ण समर्थन ने एक बार फिर शत्रु के षड्यंत्र को विफल बना दिया।
    आयतुल्लाह ख़ामेनई अपने नेतृत्व के 22 वर्षीय काल में साम्राज्वादियों के षड्यंत्रों व धमकियों के सामने डटे रहे और क्रान्ति के शत्रुओं को निराश किया। दूरदृष्टि, विवेकपूर्ण विश्लेषण, शत्रु की पहचान, इमाम ख़ुमैनी के उच्च उद्देश्यों पर बल, ईरानी युवाओं पर वरिष्ठ नेता के विश्वास, और उनके दिशा-निर्देश से ईरान प्रगति कर रहा है।
    अमरीका के कार्नेगी शोध केन्द्र ने वर्ष 2009 में वरिष्ठ नेता के संबंध में किए गए अपने एक शोध का परिणाम प्रकाशित किया। इस लेख का शीर्षक थाः वरिष्ठ नेता के व्यक्तित्व का अध्ययन और विश्व के सबसे प्रभावशाली नेता पर दृष्टि। लेख के आरंभ में लेखक लिखता हैः शायद ही विश्व में कोई ऐसा नेता हो जो वरिष्ठ नेता के जितना अंतर्राष्ट्रीय मामलों के संदर्भ में इतना महत्वपूर्ण हो किन्तु साथ ही विश्व के लिए इस सीमा तक अपरिचित हो। वह अपने लेख में आगे लिखते हैः इस्लामी गणतंत्र ईरान इमाम ख़ुमैनी के दिशा-निर्देश पर चल रहा है और इसी आधार पर आयतुल्लाह ख़ामेनई भी न्याय, स्वाधीनता, आत्मनिर्भरता और धर्मपरायणता को क्रान्ति के चार उद्देश्य मानते हैं।
    न्याय के विषय पर शोध करने वाले विचारकों में अधिकांश विचारकों ने इस विषय के वैचारिक आयाम पर चर्चा की है और कुछ विचारकों ने केवल न्याय की परिभाषा की और इसके विभिन्न स्वरूप को प्रस्तुत किया है किन्तु न्याय के विषय पर वरिष्ठ नेता को विशिष्टता प्राप्त है कि उन्होंने इस पर केवल वैचारिक दृष्टि से चर्चा नहीं की है बल्कि इस्लामी समाज में न्याय के क्रियान्वयन के विषय पर बहुत से महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर ध्यान दिया है।
    पश्चिम की समकालीन विचारधारा विशेष रूप से उदारवाद और पूंजि के लिए स्वतंत्र बाज़ार की विचारधारा के मानने वाले इस बात पर बल देते हैं कि विकास को सामाजिक न्याय पर प्राथमिकता प्राप्त है। अर्थात आर्थिक विकास के परिणाम में समाज के कमज़ोर वर्ग को अंततः न्याय मिल जाएगा।
    वरिष्ठ नेता इस विचारधारा को इस्लामी विचार के विरुद्ध बताते हुए बल देते हैं कि विकास व प्रगति की सामाजिक न्याय की प्राप्ति की परिधि में परिभाषित होना चाहिए और उसे इस दिशा में होना चाहिए। इस संदर्भ में वरिष्ठ नेता कहते हैः हम विश्व में प्रचलित उन कुछ नीतियों के समर्थक नहीं हैं जिसके बहुत से समर्थक भी हैं कि केवल उत्पादन और देश में पूंजि में वृद्धि पर ध्यान दें और इसके साथ न्याय के बारे में न सोचें। नहीं यह हमारी सोच नहीं है। हमारी व्यवस्था की रचनात्मकता यह है कि हम न्याय और आर्थिक विकास साथ साथ चाहते हैं। वरिष्ठ नेता का यह मानना है कि इस्लामी समाज का उद्देश्य न्याय है और न्याय की प्राप्ति के लिए विकास व प्रगति पृष्ठभूमि है।
    इस सदंर्भ में वरिष्ठ नेता कहते हैः हमारा उद्देश्य समाज में न्याय स्थापित करना है। न्याय की स्थापना के लिए सभी कामों को महत्व मिलता है। असमानता वाले समाज में यदि पूंजि बढ़ भी जाए तो इसका लाभ समाज के केवल एक वर्ग को मिलेगा किन्तु जिस समाज में न्याय व समानता होगी वह सभी के हित में होगी।
    आयतुल्लाह ख़ामेनई देश के अधिकारियों पर देश के वंचित वर्ग पर अधिक ध्यान देने और सांसदों से क़ानून बनाने में इस वर्ग के हित में न्याय को दृष्टिगत रखने के लिए सदैव बल देते हैं। ईरान में सरकार वंचित वर्ग पर सदैव ध्यान देती है और विशेष रूप से हालिया कुछ वर्षों में अधिकारियों ने सुदूर क्षेत्रों व गावों के दौरे में कम आय वाले वर्ग के लोगों से संपर्क किया और इन क्षेत्रों की जनता की मुख्य समस्याओं को दूर करने तथा आवास निर्माण और रोज़गार के अवसर मुहैया करने की दिशा में उचित क़दम उठाया।
    ईरान की स्वाधीनता पर बल इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता के व्यक्तित्व की एक और बड़ी विशेषता है। इमाम ख़ुमैनी के स्वर्गवास के तुरंत पश्चात वरिष्ठ नेता के पहले दृढ़तापूर्वक क़दम को विश्व ने देखा। वरिष्ठ नेता ने यह दृढ़ता सलमान रुश्दी को जान से मारने के इमाम ख़ुमैनी के फ़त्वे के ख़िलाफ़ पश्चिमी सरकारों के प्रयास के विरुद्ध दिखाई क्योंकि पश्चिमी सरकारें सलमान रुश्दी को जान से मारने के फ़त्वे को निरस्त करवाना चाहती थीं। सलमान रुश्दी ने शैतानी आयत नामक किताब लिख कर इस्लाम की आस्था का घोर अनादर किया था। इमाम ख़ुमैनी के सल्मान रुश्दी को जान से मारने से संबंधित ऐतिहासिक फ़त्वा देने के बाद कुछ देशों ने अपने राजदूतों को ईरान से वापस बुला लिया था। इन देशों के इस अपमानजनक व अहंकारी क़दम से वरिष्ठ नेता न केवल यह कि प्रभावित नहीं हुए बल्कि पूरी दृढ़ता से उन्होंने कहा थाः बुलाए गए राजदूतों के पास सिवाए लौटने के कोई और मार्ग नहीं है। यद्यपि उन दिनों वरिष्ठ नेता के इस दृढ़तापूर्वक क़दम को कुछ लोग भीतर से स्वीकार नहीं कर पा रहे थे किन्तु समय बीतने के साथ ही वरिष्ठ नेता की दूरदृष्टि व सूझबूझ स्पष्ट हो गयी। समय बीतने के साथ पश्चिम के सभी राजदूत रात के समय पत्रकारों की दृष्टि से बचते हुए ईरान लौट आए और रुश्दी को जान से मारने का फ़त्वा न केवल यह कि निरस्त नहीं हुआ बल्कि ईरान के मुसलमान राष्ट्र का सम्मान भी बढ़समय बीतने के साथ पश्चिम के सभी राजदूत रात के समय पत्रकारों की दृष्टि से बचते हुए ईरान लौट आए और रुश्दी को जान से मारने का फ़त्वा न केवल यह कि निरस्त नहीं हुआ बल्कि ईरान के मुसलमान राष्ट्र का सम्मान भी बढ़ गया।
    वरिष्ठ नेता द्वारा देश के संचालन में ईरान की स्वाधीनता की रक्षा का और उदाहरण वर्ष 1990 में सद्दाम द्वारा कुवैत पर हमले के समय दिखने में आया। कुवैत के अतिग्रहण के पश्चात सद्दाम के विरुद्ध अमरीका की अगुवाई में एक गठजोड़ तय्यार हुआ और वह कुवैत के समर्थन में सद्दाम से युद्धरत हुआ। कुवैत पर इराक़ के हमले के समय देश के भीतर कुछ लोगों का यह दृष्टिकोण था कि ईरान को इराक़ की सहायता करनी चाहिए क्योंकि सद्दाम वास्तव में अमरीका से लड़ रहा है किन्तु वरिष्ठ नेता ने उस अवसर पर कहा थाः नहीं! यह एक जाल है और हमें इराक़ की सरकार का समर्थन नहीं करना चाहिए। बाद में यह बात सिद्ध भी हुयी कि यह मामला ईरान के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर देता किन्तु वरिष्ठ नेता के समझदारी भरे दृष्टिकोण से जो देश इस चरण से शांति से गुज़र गया वह केवल ईरान था क्योंकि बाद में अरब देश अमरीका को लगभग 53 अरब डॉलर देने पर मजबूर हुए जो बड़ा आर्थिक नुक़सान था।
    संकट निवारण वरिष्ठ नेता की नेतृत्व क्षमता का एक और स्पष्ट उदाहरण है। अनुभव से सिद्ध हो चुका है कि वरिष्ठ नेता देश के दूसरे अधिकारियों की तुलना में शत्रु के षड्यंत्रों की अधिक गहन समीक्षा करते हैं और इन षड्यंत्रों का पहले से अनुमान लगा लेते हैं। वरिष्ठ नेता शत्रु के षड्यंत्रों और विदेशी मामलों में गहरी दृष्टि रखते हैं और इस दृष्टि वे बेजोड़ हैं। वर्ष 2009 के षड्यंत्र को विफल बनाना भी इसी संदर्भ का एक उदाहरण है। वर्ष 2009 में ईरान में राष्ट्रपति पद के चुनाव के समय देश के भीतर कुछ तत्वों ने व्यवस्था को कमज़ोर करने वाला मार्ग अपनाया। अलबत्ता इस षड्यंत्र के आयामों के स्पष्ट होते ही यह तथ्य सामने आया कि कुछ थोड़े तत्वों ने देश के बाहर मुख्य रूप से अमरीका के इशारे पर काम किया था। साम्राज्यवादियों ने एक बार फिर इस्लामी क्रान्ति के मूल्यों को महत्वहीन दर्शाने के लिए षड्यंत्र रचे किन्तु वरिष्ठ नेता द्वारा छिपे हुए षड्यंत्र से पर्दा उठाए जाने से ईरान की क्रान्तिकारी जनता ने देशव्यापी रैली में भाग लेकर इस षड्यंत्र को विफल बना दिया। इस संदर्भ में वरिष्ठ नेता की भूमिका की व्याख्या करते हुए ईरान के महान्यायवादी मोहसेनी एजेई कहते हैः राष्ट्रपति पद के चुनाव से पूर्व जब अमरीका ने थोड़ी से लचक दिखाई तो व्यवस्था के कुछ बड़े अधिकारियों ने वरिष्ठ नेता से कहा कि हम क्यों अमरीका से बात न करें? हमें पश्चिम और अमरीका के लिए अपने द्वार खोल देने दीजिए। जो आना चाहे उसे एक सप्ताह का वीज़ा देने दीजिए और इसी तरह की बातें। वरिष्ठ नेता ने कहाः ये सब कार्यक्रम है और शायद इस तरह की बात अमरीकी अधिकारियों की रणनीति हो। जैसा कि सबने देखा कि चुनाव के बाद की प्रक्रियाओं के संदर्भ में थोड़े से धैर्य ने यह दर्शा दिया कि यह घटना अमरीकी षड्यंत्रों का भाग थी और वरिष्ठ नेता के शब्दों में अमरीका की ओर से आरंभिक लचक, ईरान में उपद्रव फैलाने की मात्र चाल थी।

    देश के अधिकारियों व जनता को इस षड्यंत्र के आयाम को पहचनवाने में वरिष्ठ नेता सबसे ज़्यादा योगदान दिया। उस दौरान वरिष्ठ नेता ने कई भाषण के दौरान षड्यंत्र से पर्दा उठाया। वरिष्ठ नेता ने अपने भाषणों में अमरीका और उससे धोखा खाने वाले तत्वों की संलिप्तता को स्पष्ट किया और सबको वास्तविकता को समझने का आह्वान किया। जनता को जागरुक बनाने में वरिष्ठ नेता का योगदान बेजोड़ है।
    वरिष्ठ नेता के संबंध में लेबनान के जनप्रतिरोध आंदोलन हिज़्बुल्लाह के महासचिव सय्यद हसन नसरुल्लाह कहते हैः इस्लामी जगत में बहुत से ऐसे हैं जिन्हें इस महान हस्ती की थोड़ी पहचान है।

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