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    वर्ष 2010 और महिलाएं

    वर्ष 2010 और महिलाएं
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    वर्ष 2010 भी विभिन्न उतार चढ़ाव के साथ समाप्त हो गया। इस वर्ष भी विश्व की आधी जनसंख्या के रूप में महिलाएं, विभिन्न मामलों में उलझी रहीं जिनमें से कुछ उनसे विशेष थे। इस कार्यक्रम में हम पिछले वर्ष 2010में महिलाओं और परिवार के विभिन्न मामलों पर एक दृष्टि डालने जा रहे हैं।

    वर्ष 2010 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने कार्यक्रमानुसार, संसार में महिलाओं की स्थिति के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की। इस रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को समाज की एक जटिल समस्या घोषित किया। संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकारियों ने 30 अक्तूबर वर्ष 2010 में पारित होने वाले प्रस्ताव में घोषणा की है कि विश्व के तनावग्रस्त क्षेत्रों में महिलाओं के विरुद्ध हिंसाओं में वृद्धि हुई है। यौन उत्पीड़न जो सामाजिक त्रासदी और बुराई का परिणाम है, अब भी महिला समाज को गहरा आघात लगा रहा है। यद्यपि महिलाओं के कारण बहुत कम ही युद्ध छिड़े हैं किन्तु युद्ध के अधिकतर दुष्परिणाम महिला समाज पर पड़ते हैं। महिलाओं के विरुद्ध हिंसाओं में वृद्धि के मामलों में से एक यौन उत्पीड़न विशेषकर बलत्कार और दुराचार है। इस प्रस्ताव मं् सशस्त्र युद्ध और झड़पों में महिलाओं और बच्चियों के विरुद्ध हर प्रकार की हिंसा की निंदा और नीति निर्धारित करने की गतिविधियों व शांति की प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका पर बल दिया गया है।

    पिछले वर्ष अमरीका में भी महिलाओं के विरुद्ध हिंसाओं में वृद्धि हुई है। एमेनेस्टी इन्टरनेश्नल की रिपोर्ट के अनुसार, हर दस में से एक अमरीकी महिला सबके सामने हिंसा का शिकार होती है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 14 वर्ष की अल्पायु वाली बच्चियों से लेकर लगभग 45 वर्ष की आयु वाली महिलाओं को सड़कों पर शाब्दिक हिंसा और छेड़छाड़ का शिकार बनाया जाता है और उनसे बुरे व्यवहार किए जाते हैं, यहां तक कि यह महिलाएं आफ़िसों, कार्यालयों और शिक्षण संस्थानों में इस प्रकार की हिंसाओं से सुरक्षित नहीं हैं। विभिन्न रिपोर्टों के आधार पर पूर्ण रूप से पश्चिमी देशों में महिलाओं के विरुद्ध हिंसाओं का प्रचलन बहुत अधिक है।

    ज़ायोनी शासन की सुपर मार्केटों में महिलाओं की ब्रिकी और व्यापार भी महिलाओं पर होने वाली हिंसाओं का एक भाग हैं। सीएनएन टीवी चैनल ने अक्तूबर वर्ष 2010 में में तेल अवीव की सड़कों की एक डाक्योमेंट्री फ़िल्म दिखाई। जिसमें यह दिखाया गया था कि इस नगर के व्यापारिक प्रतिष्ठानों में पर्दे के पीछे महिलाओं के व्यापार के लिए एक विशेष स्थान पाया जाता है। इन व्यापारिक प्रतिष्ठानों के शो केस में महिलाएं मौजूद होती हैं जिनके हाथों में एक बोर्ड होता है जिस पर उनके मूल्य, आयु, वज़न, लम्बाई और उनका जन्म स्थल लिखा होता है। अधिक खेद की बात यह है कि उनके जन्म स्थल को दिखाने के लिए “मेड इन” शब्द का प्रयोग होता है जो सामान्यतः वस्तुओं के बारे में प्रयोग किया जाता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि ज़ायोनी शासन में महिलाएं भी वस्तुओं की भांति ख़रीदी और बेची जाती हैं। सीएनएन टीवी चैनल आगे कहता है कि उक्त महिलाएं, बलत्कार के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के दुर्व्यहार का सामना करती हैं और मारपीट और गाली गलौंज का भी शिकार होती हैं। उल्लेखनीय यह है कि संसार में महिलाओं की तस्करी के संबंध में ज़ायोनी शासन तीसरे नंबर पर है।

    वर्ष 2010 में हम विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में परिवार के आधारों के कमज़ोर होने के साक्षी थे। वास्तव में पश्चिमी देश अपने नारीवाद और सेक्यूलर दृष्टिकोंणों के आधार पर किसी भी प्रकार के औपचारिक वैवाहिक बंधन के बिना महिलाओं और पुरूषों के मध्य संयुक्त जीवन को प्रचलित कर रहे हैं। वर्तमान समय में पश्चिमी देशों में चाहे वह अमरीका हो या यूरोप, 75प्रतिशत से अधिक संयुक्त जीवन इसी प्रकार के हैं। चूंकि परिवार के गठन, विवाह और महिलाओं के लिए मां बनने के मामले को महत्त्वहीन बना दिया गया है। ब्रिटिश समाचार पत्र डेलीमेल ने 12 अक्तूबर वर्ष 2010 के अपने संस्करण में ब्रिटेन के नेश्नल स्टैटिस्टिक्स कार्यालय के हवाले से लिखा कि लगभग 20 प्रतिशत अधेड़ ब्रिटिश महिलाएं दबाव, ऋण के भारी बोझ और ग़लत सामाजिक संबंधों के कारण परिवार और संतान की अनुकंपा से वंचित हैं। इस समाचार पत्र ने स्पष्ट किया कि परिवार न रखने और मातृत्व के अधिकार से वंचित महिलाओं की संख्या ब्रिटेन के इतिहास में अभूतपूर्व है और यह एक कीर्तिमान समझा जाता है। बहुत सी महिलाएं वर्तमान समय में कार्य करने और कमाने पर विवश हैं और इसी चीज़ ने उन्हें संतानों से वंचित कर दिया है। यहां तक कि सरकारी सहायताएं भी उन महिलाओं को नहीं मिलती जो मातृत्व के अधिकार से वंचित होती हैं।

    वर्ष 2010 में वह लोग चुप नहीं बैठे जिन्हें परिवार को सुदृढ़ करने और उसकी रक्षा की चिंता थी और उन्होंने समाज की आधार शिला को सुरक्षित करने की दिशा में प्रयास किए। 9 नवम्बर वर्ष 2010 में अमरीका में विभिन्न धर्मों और समुदाय के नेताओं और धर्मगुरूओं ने “विवाह का समर्थन एक संयुक्त कटिबद्धता” शीर्षक के अंर्तगत एक खुले पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसमें एक महिला और पुरूष के मध्य अटूट बंधन के रूप में पारंपरिक ढंग से विवाह का भरपूर समर्थन किया गया है। धर्मगुरूओं ने इस पत्र में बल दिया कि हम दंपत्ति के मध्य अपार प्रेम विशेषकर माता पिता के स्थान और समस्त बच्चों की प्रतिष्ठा और अधिकारों का सम्मान करेंगे। विवाह न केवल धार्मिक समाज बल्कि पूरे समाज के कल्याण के लिए मुख्य आधार समझा जाता है। एक महिला और पुरुष के मध्य अटूट बंधन के रूप में विवाह के प्रचलन और समर्थन के लिए धार्मिक समाज और समस्त लोगों को क़दम बढ़ाना चाहिए।

    परिवार को सुदृढ़ करने के परिप्रेक्ष्य में पिछले वर्ष जापान में एक क़ानून पारित किया गया। इस क़ानून के आधार पर इस देश के पुरुषों को उस समय छुट्टी दे दी जाती है जब उनकी पत्नी बच्चे को जन्म देती है ताकि वह अपनी पत्नी और बच्चे का अच्छी तरह ध्यान रखें। जापानी अधिकारियों ने देश में जन्म दर में कमी के बाद इस प्रकार का क़ानून पारित करने का फ़ैसला किया कि जिसका उद्देश्य अधिक से अधिक संतान के लिए जापानी दंपत्तियों को प्रेरित और उत्साहित करना है। सरकार का यह मानना है कि यदि जनता ने इस नये क़ानून का समर्थन करते हुए अधिक संतानों के लिए प्रयास किए तो महिलाएं भी मां बनने और गर्भवती होने में अधिक रूचि दिखाएंगी और परिवार के गठन में लोग अधिक रूचि दिखाएंगे।

    वर्ष 2010 में हम यह देखते हैं कि संसार में महिलाओं ने महत्त्वपूर्ण छाप छोड़ी है। इस वर्ष पहली नवम्बर को ब्राज़ील की जनता ने पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में डिल्मा रूसेफ़ को चुना। वह पूर्व राष्ट्रपति लूला डिसिल्वा की उतराधिकारी बनीं।62 वर्षीय ब्राज़ील की महिला राष्ट्रपति ने राष्ट्रपति पद ग्रहण करने के बाद जनता को वचन दिया कि वे दो करोड़ ब्राज़ीली जनता की दरिद्रता को कम करने के लिए प्रयास करेंगी।

    पिछले वर्ष भी महिलाओं ने यह दर्शा दिया कि वे विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विशिष्टता को सिद्ध करने में सक्षम हैं। 30अक्तूबर वर्ष 2010 में तेहरान में इस्लामी जगत की श्रेष्ठ महिला पत्रकार सम्मेलन में इस्लामी जगत की श्रेष्ठ महिला पत्रकार के रूप में अलआलम टीवी चैनल की पत्रकार श्रीमती असरा बुहैसी को चुना गया। 24 वर्षीय असरा बुहैसी ही वह फ़िलिस्तीनी महिला पत्रकार हैं जिन्होंने 22 दिवसीय ग़ज़्जा युद्ध के दौरान विषम परिस्थितियों में ग़ज़्ज़ा के निर्दोष, निहत्थे और बेघर बच्चों और महिलाओं के विरुद्ध ज़ायोनी सैनिकों के अपराधों और अत्याचारों पर प्रभावित विडियो रिपोर्ट बनाई और विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया।

    पिछले वर्ष हमने देखा कि कुछ सरकारों ने हेजाब पर प्रतिबंध लगाया। जर्मनी, हालैंड, फ़्रांस, आस्ट्रेलिया, केनेडा, स्पेन,आज़रबाईजान और मिस्र की सरकारों ने महिलाओं के हेजाब पर प्रतिबंध लगाए। मिस्र में महिलाओं ने हेजाब पर प्रतिबंध लगाने की नीति के विरुद्ध व्यापक प्रदर्शन किए। क़ाहिरा विश्वविद्यालयों में हेजाब और नक़ाब के प्रयोग के प्रतिबंध के क़ानून के पारित होने के एक दिन बाद 10 जुलाई वर्ष 2010 को सैकड़ों छात्र छात्राओं ने याचिका बनायी और संयुक्त राष्ट्र संघ को भेज दी। इस याचिका में आया है कि महिलाओं का वस्त्र नागरिक अधिकारों का भाग है और किसी को इस पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं है। इसके अतिरिक्त हेजाब एक सामाजिक और धार्मिक अधिकार है जो मुस्लिम महिलाओं की पहचान और मानदंड है और इस पर प्रतिबंध लगने से महिलाओं का अपमान होगा और समाज पर इसके दुष्परिणाम पड़ेंगे। मिस्र की छात्राओं ने ह्यूमन राईट्स वाच से मांग की है कि वह मिस्री महिलाओं को उनके अधिकार दिलवाने के लिए कार्यवाही करे। आज़रबाईजान में भी जनता ने स्कूलों और विश्वविद्यालयों में हेजाब के प्रतिबंध के विरुद्ध व्यापक प्रदर्शनों का आयोजन किया।

    वर्ष 2010 में हमने देखा कि तुर्की सहित विभिन्न देशों में महिलाओं का इस्लामी वस्त्रों और हेजाब की ओर का रूझहान बहुत अधिक बढ़ा है। वर्तमान समय में हेजाब, मुसलमान देश तुर्की के लिए एक प्रतीक में परिवर्तित हो गया है और तुर्की के राष्ट्रपति अब्दुल्लाह गुल की पत्नी खैरून निसा, इस देश के प्रधानमंत्री रजब तय्यब अर्दोग़ान की पत्नी और पुत्री और अन्य तुर्क अधिकारियों की पत्नी और पुत्रियों ने हेजाब का खुलकर समर्थन किया है। यहां तक कि तुर्की में मॉडलों ने भी पश्चिमी वस्त्रों के प्रचार करने से इनकार कर दिया और स्कार्फ़ व लंबे वस्त्र पहनने लगी।

    तुर्क महिलाओं के हेजाब की ओर झुकाव के बाद तुर्की में हवाई कर्मचारियों के लिए भी हेजाब न होने की शर्त समाप्त हो गयी। तुर्क विमानन कंपनी ने भी 26 नवम्बर वर्ष 2010 में उस क़ानून को समाप्त कर दिया जिसमें उसने अपनी कर्मचारियों के लिए इस्लामी हेजाब न होने को अनिवार्य किया था। इस क़ानून के समाप्त होते ही वे महिलाएं जो अभी तक विग लगाने पर विवश थीं उन्होंने तुरंत इसे उतार फेंका और कार्यालय में इस्लामी हेजाब में आने लगीं।

    हमने देखा कि वर्ष 2010 में बहुत सी महिलाओं ने सर्वकालिक धर्म इस्लाम को स्वीकार किया। एक अमरीकी नन डेबोरा लेन्डेस ने इस्लाम धर्म का बचाव करते हुए अमरीकी जनता से धार्मिक विनमर्ता का अह्वान किया। इस्लाम धर्म स्वीकार करने वाली फ़्रस्ट कम्युनिटी चर्च की नन ने बहुत से अमरीकियों के मध्य, उनके द्वारा इस्लामी आस्थाओं को ग़लत तरीक़े से तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने के बारे में कहा कि आजकल अमरीकी जनता को बहुत अधिक धार्मिक विनमर्ता की आवश्यकता है और इस्लाम पर आक्रमणों का क्रम रूकना चाहिए। इसी प्रकार पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेअर की पत्नी की बहन और मानवाधिकार कार्यकर्ता लोर्न बूथ ने भी अक्तूबर में इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। उन्होंने इस ईश्वरीय धर्म को पूर्ण कल्याण और वास्तविक प्रेम का धर्म बताया।