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    वहाबियत, वास्तविकता और इतिहास-8

    वहाबियत, वास्तविकता और इतिहास-8
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    शेफ़ाअत अर्थात सिफ़ारिश के शब्द से सभी पूर्णरूप से अवगत हैं। जब भी अपराध, पाप और एक व्यक्ति की निंदा की बात होती है और कोई व्यक्ति मध्यस्थ बनता है ताकि उसे दंड से मुक्ति दिलाए तो कहते हैं कि अमुक व्यक्ति ने उसके लिए सिफ़ारिश की।

    शेफ़ाअत का अर्थ होता है किसी व्यक्ति को होने वाली हानि को दूर करने के लिए मध्यस्थ बनना और उसके हितों की पूर्ति करना है। धार्मिक दृष्टि में शेफ़ाअत का अर्थ यह है कि ईश्वर के निकट बंदों में से एक मनुष्य के लिए पापों की क्षमा याचना करता है और ईश्वर से वितनी करता है कि अमुक व्यक्ति के पापों को क्षमा कर दे या उसके प्रकोप को कम कर दे। अन्य इस्लामी समुदायों और वहाबी पंथ के मध्य पाये जाने वाले मतभेदों में से शेफ़ाअत भी का मुद्दा है। अलबत्ता वहाबी भी मूल सिद्धांत के रूप में एक प्रकार की शेफ़ाअत को स्वीकार करते हैं किन्तु उनका मानना है कि शेफ़ाअत प्रलय के दिन से विशेष है कि शेफ़ाअत करने वाले मुसलमानों के पापों के संबंध में शेफ़ाअत करेंगे और शेफ़ाअत के संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम का सबसे अधिक भाग होगा। वहाबियों की मूल बातें यह हैं कि किसी भी मुसलमानों को इस संसार में पैग़म्बरे इस्लाम और ईश्वर के निकट बंदों से शेफ़ाअत मांगने का कोई अधिकार नहीं है। जबकि पैग़म्बरे इस्लाम और ईश्वर के अन्य निकटवर्ती बंदों से शेफ़ाअत, पैग़म्बरे इस्लाम के काल से अब तक मुसलमानों के मध्य प्रचलित रही है। मुसलमानों के किसी भी बुद्धिजीवी और धर्मगुरू ने भी योग्य बंदो से शेफ़ाअत की बात का खंडन नहीं किया है किन्तु आठवीं हिजरी क़मरी के आरंभ में इब्ने तैमिया और उसके बाद मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब नज्दी ने ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य से शेफ़ाअत को वर्जित घोषित कर दिया और इस दृष्टिकोण के विरोधियों को काफ़िर और अनेकेश्वरवादी बताया।

    इन दोनों का मानना था कि पैग़म्बर, फ़रिश्ते और ईश्वर के निकटवर्ती बंदे जिस शेफ़ाअत के स्वामी हैं उसका संसार से कोई लेना देना नहीं है बल्कि उन्हें केवल प्रलय में शेफ़ाअत का अधिकार प्राप्त है। इस आधार पर यदि कोई बंदा इस संसार में अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से अपने और ईश्वर के मध्य मध्यस्थ बनाए और उनकी शेफ़ाअत पर नज़र रखे हुए हो तो उसका यह कार्य अनेकेश्वरवाद में गिना जाता है और वह ईश्वर के अतिरिक्त किसी और का बंदा समझा जाता है। हर बंदे को प्रत्यक्ष रूप से केवल ईश्वर से आस लगाना चाहिए और कहे कि ईश्वर मुझे उन लोगों में शुमार कर जिनकी मुहम्मद (स) शेफ़ाअत करें। यह न कहो कि मुहम्मद, ईश्वर के निकट मेरी शेफ़ाअत कीजिए।

    सलफ़ियों और मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के अनुयायियों ने शेफ़ाअत के विषय पर बहुत अधिक हंगामा मचाया है और अब तक शेफ़ाअत के विषय पर आतंक मचाते चले आ रहे हैं और शेफ़ाअत के मानने वालों के विरुद्ध बहुत उटपटांग बातें करते हैं।

    सलफ़ियों ने ईश्वर के निकटवर्ती बंदों से शेफ़ाअत न करने पर कुछ तर्क पेश किए हैं। पहला यह है कि वे इस काम को अनेकेश्वरवाद समझते हैं क्योंकि उनका मानना है कि शेफ़ाअत मांगना, वास्तव में शेफ़ाअत करने वाले की उपासना है। अर्थात मनुष्य शेफ़ाअत की विनती करके मानो ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य से सहायता मांग रहा है और दूसरे को ईश्वर का समकक्ष ठहराता है।

    वहाबी पंथ के संस्थापक मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब ने अपनी पुस्तक कश्फ़ुश्शुबहात में अनेकेश्वरवाद की चर्चा में दावा किया है कि शेफ़ाअत और तवस्सुल अर्थात किसी को मध्यस्थ बनाना अनेकेश्वरवाद का भाग है और इसीलिए वे बहुत से मुसलमानों को अनेकेश्वरवादी कहते हैं।

    वास्तव में इस पंथ का दृष्टिकोण इस्लाम धर्म में प्रचलित दृष्टिकोणों से पूर्ण रूप से भिन्न है। सौभाग्य की बात यह है कि हम आपको यह बताएं कि शेफ़ाअत के विषय में वहाबी भ्रांतियों का शिकार हैं। इन भ्रांतियों के उत्तर में यह कहना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति से शेफ़ाअत की विनती को उसी समय अनकेश्वरवाद में गिना जाता है जब शेफ़ाअत करने वाले को ईश्वर, सृष्टि का रचयिता और लोक परलोक का स्वामी कहा जाए किन्तु वास्तव में ईश्वर के निकट बंदो से शेफ़ाअत की इच्छा अनेकेश्वरवाद नहीं है बल्कि शेफ़ाअत मांगने वाले शेफ़ाअत करने वाले को ईश्वर का निकटवर्ती बंदा जानते हैं जो न तो कदापि ईश्वर है और न ही ईश्वरीय काम करता है बल्कि चूंकि वे ईश्वर के निकटवर्ती थे इसीलिए उनमें शेफ़ाअत की योग्यता पैदा हो गयी। दूसरी ओर इस्लामी शिक्षाओं में आया है कि शेफ़ाअत करने वाले केवल ईश्वर की अनुमति की परिधि में ही पापियों और एकेश्वरवादियों की शेफ़ाअत कर सकते हैं और ईश्वर से उनके पापों को क्षमा करने का अह्वान करते हैं।

    पवित्र क़ुरआन की आयतों के दृष्टिगत हमें यह पता चलता है कि पैग़म्बरे इस्लाम और अन्य सच्चे लोगों से शफ़ाअत मांगना वास्तव में ईश्वरीय क्षमायाचना के लिए दुआ है। ईश्वर के निकट पैग़म्बरे इस्लाम और ईश्वरीय बंदों के निकट और उच्च स्थान के दृष्टिगत मुसलमान उनसे चाहते हैं कि वे उनके लिए दुआएं करें क्योंकि उनका मानना है कि ईश्वर अपने पैग़म्बर और निकटवर्ती बंदों की दुआओं को रद्द नहीं करता और उनकी दुआओं को अवश्य स्वीकार करता है और उनके माध्यम से पापियों के पाप को क्षमा कर देता है।

    पवित्र क़ुरआन गवाही देता है कि लोगों के संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम की क्षमा याचना पूर्ण रूप से प्रभावी और लाभदायक है। सूरए मुहम्मद की आयत क्रमांक 19 में आया है कि अपने पापों और ईमान वालों के लिए क्षमा याचना करो। इसी प्रकार सूरए तौबा की आयत संख्या 103 में आया है कि उनके लिए दुआएं करो, आपकी दुआएं उनकी शांति का स्रोत हैं।

    जब लोगों के लिए पैग़म्बरे इस्लाम की दुआएं इतनी लाभदायक हैं तो इस बात में क्या समस्या है कि उनसे अपने लिए दुआएं करने की विनती की जाए। दूसरी ओर दुआ करना शेफ़ाअत के अतिरिक्त क्या कोई और वस्तु है?

    हदीस की किताबों में भी शेफ़ाअत शब्द का प्रयोग दुआ के अर्थ में बहुत अधिक किया गया है। यहां तक कि सुन्नी समुदाय की प्रसिद्ध पुस्तक सही बुख़ारी के लेखक ने अपनी पुस्तक में शेफ़ाअत शब्द से लाभ उठाया है। सही बुख़ारी सुन्नी समुदाय की सबसे मान्यता प्राप्त पुस्तकों में से एक है जिसके लेखक इमाम मुहम्मद बुख़ारी हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक के दो अध्यायों में लिखा कि पैग़म्बर और ईश्वर के निकटवर्ती बंदो से दुआ करने को शेफ़ाअत कहा जाता है। वे लिखते हैं कि जब भी लोगों ने इमाम से शेफ़ाअत की कि वे उनके लिए ईश्वर से वर्षा की मांग करें तो उन्हें उनकी मांग को रद्द नहीं करना चाहिए। इस आधार पर सुन्नी समुदाय के धर्म गुरू भी ईश्वर के अतिरिक्त अन्य लोगों से शेफ़ाअत को वैध समझते हैं।

    एक अन्य स्पष्ट साक्ष्य जो इस बात का चिन्ह है कि शिफ़ाअत का अर्थ दुआ है, इब्ने अब्बास के हवाले से पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है। इस कथन में आया है कि जब भी कोई मुसलमान मरता है और उसके जनाज़े पर चालीस लोग जिन्होंने अनेकेश्वरवाद नहीं किया, नमाज़ पढ़ें तो ईश्वर उसके संबंध में उनकी शिफ़ाअत को स्वीकार करता है।

    मुर्दे के संबंध में चालीस लोगों की शिफ़ाअत इसके अतिरिक्त कुछ और नहीं है कि उसके जनाज़े पर नमाज़ पढ़ने के समय उसके लिए ईश्वर से क्षमा याचना करें। इस आधार पर यदि शिफ़ाअत की प्रवृत्ति दुआ करना है तो इस दुआ की मांग करने को अनेकेश्वरवाद क्यों समझा जाता है?

    शिफ़ाअत के विषय को रद्द करने में वहाबी कठमुल्लाओं का एक और तर्क यह है कि अनेकेश्वरवादियों के अनेकेश्वरवाद का कारण, मूर्तियों से शिफ़ाअत की विनती करना है और पवित्र क़ुरआन में भी इस विषय का वर्णन किया गया है। सूरए यूनुस की आयत संख्या 18 में आया है कि और यह लोग ईश्वर को छोड़कर उनकी उपासना करते हैं जो न हानि पहुंचा सकते हैं और न लाभ और यह लोग कहते हैं कि यह ईश्वर के यहां हमारी सिफ़ारिश करने वाले हैं। इस आधार पर पैग़म्बरे इस्लाम और ईश्वर के निकटवर्ती बंदों से हर प्रकार की शिफ़ाअत मांगना, अनेकेश्वरवादियों के मूर्ति से शिफ़ाअत की विनती के भांति है।

    वहाबियों की इस आस्था के उत्तर में यह कहना चाहिए कि इन दोनों शिफ़ाअतों में ज़मीन आसमान का अंतर है। अनेकेश्वरवादी, मूर्तियों को अपना ईश्वर समझते हैं इसीलिए वे उनसे शिफ़ाअत की विनती करते हैं जबकि एक मुसलमान व्यक्ति, ईश्वर के निकटवर्ती बंदे के रूप में ईश्वर के निकट व सच्चे बंदों से दुआ और उनसे शिफ़ाअत की विनती करता है।

    मुसलमानों का मानना है कि पैग़म्बरे इस्लाम, शालीन मोमीनों और ईश्वर के निकटवर्ती बंदों और शहीदों के लिए शिफ़ाअत के स्थान की पुष्टि हो गयी है। कितना अच्छा है कि मनुष्य चाहे लोक में या परलोक में ईश्वर के निकट बंदों और उसके पैग़म्बर को ईश्वर के समक्ष अपना शिफ़ाअत करने वाला बनाए।