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    वह मक़ामात जहाँ नमाज़ पढ़ना मुस्तहब है

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    902. इस्लाम की मुक़द्दस शरीयत में बहुत ताकीद की गयी है कि नमाज़ मस्जिद में पढ़ी जाए। दुनिया भर की सारी मस्जिदों में सबसे बेहतर मस्जिदुल हराम और उसके बाद मस्जिदुन नबी(स.) है। उसके बाद मस्जिदे कूफ़ा और उसके बाद मस्जिदे बैतुल मुक़द्दस का दर्जा है। उसके बाद शहर की जामा मस्जिद और उसके बाद मोहल्ले की मस्जिद और उसके बाद बाज़ार की मस्जिद का नम्बर आता है।

    903. औरतों के लिए बेहतर है कि नमाज़ ऐसी जगह पढ़ें जो नामहरम से महफ़ूज़ होने के लिहाज़ से दूसरी जगहों से बेहतर हो, चाहे वह जगह मकान या मस्जिद या कोई और जगह हो।

    904. आईम्मा –ए- अहलेबैत (अ.) के हरमों में नमाज़ पढ़ना मुस्तहब है, बल्कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ने से बेहतर है और रिवायत में है कि हज़रत अमीरूल मोमीनीन (अ.) के हरमे पाक में नमाज़ पढ़ना दो लाख नमाज़ों के बराबर है।

    905. मस्जिद में ज़्यादा जाना और उस मस्जिद में जाना जो आबाद न हो (यानी जहाँ लोग बहुत कम नमाज़ पढ़ने आते हों।) मुस्तहब है। अगर कोई इंसान मस्जिद के पड़ोस में रहता हो और कोई उज़्र भी न रखता हो तो उसके लिए मस्जिद के अलावा किसी और जगह नमाज़ पढ़ना मकरूह है।

    906. जो इंसान मस्जिद में न आता हो, मुस्तहब है कि इंसान उसके साथ मिलकर खाना न खाए, अपने कामों में उससे मशवेरा न करे, उसके पड़ोस में न रहे और उसके यहाँ शादी ब्याह भी न करे। (यानी उसका सोशल बायकाट करे)