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    वह सूरतें जिन में नमाज़ी का बदन और लिबास पाक होना ज़रूरी नहीं है

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    856. तीन सूरतों में, जिनकी तफ़सील नीचे बयान की जा रही है, अगर नमाज़ पढ़ने वाले का बदन या लिबास नजिस भी हो तो उसकी नमाज़ सही है:

    1- उसके बदन पर ज़ख़्म, जराहत या फोड़ा होने की वजह से उसके लिबास या बदन पर ख़ून लग जाये।

    2- उसके बदन या लिबास पर दिरहम (जिसकी मिक़दार तक़रीबन हाथ के अंगूठे के ऊपर वाले पोरवे के बराबर है) की मिक़दार से कम ख़ून लगा हो।

    3- वह नजिस बदन या लिबास के साथ नमाज़ पढ़ने पर मजबूर हो। इसके अलावा एक और सूरत में अगर नमाज़ पढ़ने वाले का लिबास नजिस भी हो तो उसकी नमाज़ सही है और वह सूरत यह है कि उसका छोटा लिबास, मसलन मोज़ा और टोपी नजिस हो।

    इन चारो सूरतों के मुफ़स्सल अहकाम आईन्दा मसअलों में बयान किये जायेगें।

    857. अगर नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास पर ज़ख्म या जराहत या फोड़े का ख़ून हो तो वह उस ख़ून के साथ उस वक़्त तक नमाज़ पढ़ सकता है जब तक ज़ख्म या जराहत या फोड़ा ठीक न हो जाये, और अगर उसके बदन या लिबास पर ऐसी पीप हो जो ख़ून के साथ निकली हो या ऐसी दवा हो जो ज़ख़्म पर लगाई गयी हो और नजिस हो गयी हो, तो उसके लिए भी यही हुक्म है।

    858. अगर नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास पर ऐसी ख़राश या ज़ख़्म का ख़ून लगा हो जो जल्दी ठीक हो जाता हो और जिसका धोना आसान हो तो उसकी नमाज़ बातिल है।

    859. अगर बदन या लिबास की ऐसी जगह, जो ज़ख्म से फ़ासिले पर हो, ज़ख़्म की रतूबत से नजिस हो जाये तो उसके साथ नमाज़ पढ़ना जाइज़ नही है। लेकिन अगर लिबास या बदन की वह जगह जो आम तौर पर ज़ख़्म की रुतूबत से गीली हो जाती है, उस ज़ख़्म की रूतूबत से नजिस हो जाये तो उसके साथ नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नही है।

    860. अगर किसी इंसान के बदन या लिबास पर, उस बवासीर से जिसके मस्से बाहर न हों या उस ज़ख़्म से जो मुँह और नाक वग़ैरह के अन्दर हो, ख़ून लग जाये तो ज़ाहिर यह है कि वह उसके साथ नमाज़ पढ़ सकता है। अलबत्ता जिस बवासीर के मस्से बाहर हों उसके ख़ून के साथ नमाज़ पढ़ना बिला इशकाल जाइज़ है।

    861. अगर कोई ऐसा इंसान जिसके बदन पर ज़ख़्म हो अपने बदन या लिबास पर ऐसा ख़ून देखे जो दिरहम से ज़्यादा हो और यह न जानता हो कि यह ख़ून ज़ख़्म का है या कोई और ख़ून है, तो एहतियाते वाजिब यह है कि उस ख़ून के साथ नमाज़ न पढ़े।

    862. अगर किसी इंसान के बदन पर चंद ज़ख़्म हों और वह एक दूसरे के इस क़दर नज़दीक हों कि एक ज़ख़्म शुमार होते हों तो जब तक वह ज़ख़्म ठीक न हो जायें, उनके ख़ून के साथ नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नही है,लेकिन अगर वह एक दूसरे से इतने दूर हों कि उनमें से हर ज़ख़्म एक अलैहदा ज़ख़्म शुमार होता हो तो जो ज़ख़्म ठीक हो जाये, नमाज़ के लिए अपने बदन और लिबास को उस ज़ख़्म के ख़ून से पाक करे।

    863. अगर नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास पर सुईँ की नोक के बराबर भी हैज़ का ख़ून लगा हो तो उसकी नमाज़ बातिल है और एहतियात की बिना पर नजिस जानवर, मुर्दार, हराम गोश्त जानवर और निफास व इस्तेहाज़ा के खून का भी यही हुक्म है। लेकिन अगर किसी दूसरे ख़ून छींटें (मसलन इंसान या हलाल गोश्त जानवर के ख़ून की छींटें) बदन के कई हिस्सों पर लगी हो और वह सब मिला कर एक दिरहम से कम हों तो उसके साथ नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नही है।

    864. जो ख़ून बग़ैर अस्तर के कपड़े पर गिरे और दूसरी तरफ़ पहुँच जाए, वह एक ख़ून शुमार होता है। लेकिन अगर कपड़े की दूसरी तरफ़ अलग से ख़ून कोई ख़ून लग जाये तो उनमें से हर एक को अलैहदा ख़ून शुमार किया जायेगा। बस वह ख़ून जो कपड़े की दोनों तरफ़ लगा है, अगर कुल मिला कर एक दिरहम से कम हो तो उसके साथ नमाज़ सही है और अगर उससे ज़्यादा हो तो उसके साथ नमाज़ बातिल है।

    865. अगर अस्तर वाले कपड़े ख़ून गिरे और उसके अस्तर तक पहुच जाये या अस्तर पर गिरे और कपड़े कर पहुच जाये तो ज़रूरी है कि हर ख़ून को अलग शुमार किया जाये। लेकिन अगर कपड़े का ख़ून और अस्तर का ख़ून इस तरह मिल जाये कि लोगों के नज़दीक एक ख़ून शुमार हो तो अगर कपड़े का ख़ून और अस्तर का ख़ून मिलाकर एक दिरहम से कम हो तो उसके साथ नमाज़ सही है और अगर ज़्यादा हो तो नमाज़ बातिल है।

    866. अगर बदन या लिबास पर एक दिरहम से कम ख़ून लगा हो और कोई रतूबत उस ख़ून से मिल जाये और उसके अतराफ़ को गीला कर दे तो उसके साथ नमाज़ बातिल है, चाहे वह ख़ून और जो रतूबत उससे मिली है एक दिरहम के बराबर न हो, लेकिन अगर रतूबत सिर्फ़ ख़ून से मिले और उसके अतराफ़ को गीला न करे तो ज़ाहिर यह है कि उसके साथ नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नही है।

    867. अगर बदन या लिबास पर ख़ून न हो, लेकिन रतूबत लगने की वजह से ख़ून से नजिस हो जायें, तो अगर नजिस होने वाला हिस्सा एक दिरहम से कम भी हो तो उसके साथ नमाज़ नही पढ़ी जा सकती।

    868. अगर बदन या लिबास पर मौजूद ख़ून एक दिरहम से कम हो और उससे कोई दूसरी निजासत आ लगे, मसलन पेशाब का एक क़तरा उस पर गिर जाए और बदन या लिबास से लग जाए तो उसके साथ नमाज़ पढ़ना जाइज़ नही है। बल्कि अगर बदन और लिबास तक न भी पहुँचे तब भी एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसमें नमाज़ पढ़ना सही नही है।

    869. अगर नमाज़ पढ़ने वाले का कोई ऐसा छोटा लिबास (मसलन टोपी और मोज़ा) जिससे शर्मगाह को न ढाँपा जा सकता हो, नजिस हो जाये और एहतियाते लाज़िम की बिना पर वह नजिस मुर्दार या नजिसुल ऐन जानवर, मसलन कुत्ते के अज्ज़ा से न बना हो, तो उसके साथ नमाज़ सही है। इसी तरह अगर नजिस अंगूठी पहन कर भी नमाज़ पढ़ी जाये तो कोई हरज नही।

    870. नमाज़ी का अपने साथ किसी नजिस चीज़, मसलन नजिस रुमाल, चाबी या चाक़ू को रखना जाइज़ है। अगर कोई पूरा नजिस लिबास भी उसके पास हो (जो उसने पहन न रखा हो) तो भी बईद नही कि उसकी नमाज़ को कोई ज़रर पहुँचाए।

    871. अगर कोई जानता हो कि जो ख़ून उसके लिबास या बदन पर लगा है, वह एक दिरहम से कम है, लेकिन उसे इस बात का एहतेमाल हो कि यह उस ख़ून में से है, जो मुआफ़ नही है, तो उसके लिए उस ख़ून के साथ नमाज़ पढ़ना जाइज़ है और उसका धोना ज़रूरी नही है।

    872. अगर किसी इंसान के लिबास या बदन पर मौजूद ख़ून एक दिरहम से कम हो और उसे यह मालूम न हो कि यह उन ख़ूनों में से है जो मुआफ़ नही है और वह उसी हालत में नमाज़ पढ़ ले और फिर उसे पता चले कि यह उन ख़ूनों में से था, जो मुआफ़ नही है, तो उसके लिए दोबारा नमाज़ पढ़ना ज़रूरी नही है। इसी तरह अगर कोई यह समझे कि ख़ून एक दिरहम से कम है और उसी हालत में नमाज़ पढ़ ले और बाद में पता चले कि उसकी मिक़दार एक दिरहम या उससे ज़्यादा थी तो इस सूरत में भी दोबारा नमाज़ पढ़ना ज़रूरी नही है।

    वह चीज़ें जो नमाज़ी के लिबास में मुस्तहब हैं

    873. कुछ चीज़ें नमाज़ी के लिबास में मुस्तहब है, जैसे- अम्मामे का तहतुल हनक लटकाना, अबा ओढ़ना, सफ़ेद लिबास पहनना, साफ़ लिबास पहनना, ख़ूशबू लगाना और अक़ीक़ की अंगूठी पहनना।

    वह चीज़ें जो नमाज़ी के लिबास में मकरूह हैं

    874. कुछ चीज़ें नमाज़ी के लिबास में मकरूह हैं, जैसे- स्याह, मैला और तंग लिबास पहनना, शराबी का लिबास पहनना या उस इंसान का लिबास पहनना जो निजासत से परहेज़ न करता हो और ऐसा लिबास पहनना जिस पर चेहरे की तस्वीर बनी हो। इसके अलावा लिबास के बटनों का ख़ुला होना और ऐसी अंगूठी पहनना भी मकरूह है, जिस पर चेहरे की तस्वीर बनी हो ।


    [1] ख़ूने जहिन्दादार जानवर, वह होते हैं, जिनकी रगे काटने पर उनके अन्दर से ख़ून छल कर निकलता है, जैसे भेड़, बकरी, भैंस…..

    [2] ग़ैरे ख़ूने जहिन्दादार जानवर, वह होते हैं, जिन्हें काटने पर उनके अन्दर से ख़ून उछल कर नही निकलता है, जैसे मच्छर, मक्ख़ी, साँप, मछली…….