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    वाज़िब गुस्ल

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    इंसान के ऊपर निम्न लिखित सात ग़ुस्ल वाज़िब हैं।

    1. ग़ुस्ले जनाबत( यह वह ग़ुस्ल है जो संभोग के बाद किया जाता है।)
    2. ग़ुस्ले हैज़ (यह वह ग़ुस्ल है जो स्त्री मासिक समाप्त होने के बाद करती है।)
    3. ग़ुस्ले निफ़ास(यह वह ग़ुस्ल है जो स्त्री बच्चा पैदा होने के बाद करती है।)
    4. ग़ुस्ले इस्तेहाज़ा (यह वह ग़ुस्ल है जो स्त्री हैज़ व निफ़ास के अतिरिक्त अन्य खून आने पर करती है।)
    5. ग़ुस्ले मसे मय्यित (यह वह ग़ुस्ल है जो किसी मुर्दा इंसान को छूने के बाद किया जाता है।)
    6. ग़ुस्ले मय्यित(यह वह ग़ुस्ल है जो मुर्दा इंसान को दिया जाता है।)
    7. मन्नत व क़सम आदि के कारण वाजिब होने वाला ग़ुस्ल।

    जनाबत (संभोग) के अहकाम

    351 इंसान दो चीज़ों के द्वारा जुनुब हो जाता है। या तो वह संभोग करे या उसकी मनी(वीर्य) स्वयं निकल जाये चाहे सोते हुए या जागते हुए, कम मात्रा में हो या अधिक मात्रा में, मस्ती के साथ निकले या बिना मस्ती के, चाहे इंसान उसे स्वयं निकाले या खुद निकल जाये।

    352  अगर किसी इंसान के मुत्र मार्ग से कोई तरी निकले और वह यह न जानता हो कि यह तरी वीर्य है या पेशाब या अन्य कोई चीज़ तो अगर वह तरी मस्ती के साथ व उछल कर निकली हो और उस के निकलने के बाद बदन सुस्त हो गया हो तो वह तरी मनी के हुक्म में है। लेकिन अगर इन तीनों लक्ष्णों में से समस्त या कुछ मौजूद न हो तो वह तरी मनी के हुक्म में नही है। लेकिन अगर वह इंसान बीमार हो तो यह आवश्यक नही है कि वह तरी उछल कर नुकले व उसके निकलने के बाद बदन सुस्त हो जाये। बल्कि अगर केवल मस्ती के साथ निकले तो वह तरी मनी के हुक्म में होगी।

    353 अगर किसी तन्दरुस्त इंसान के मुत्र मार्ग से कोई ऐसी तरी निकले जिसमें उपरोक्त वर्णित तीनों लक्ष्णों में से कोई लक्षण पाया जाता हो और वह यह न जानता हो कि अन्य लक्षँ भी उसमें पाये जाते हैं या नही तो अगर उस तरी के निकलने से पहले उसने वुज़ू कर रखा हो तो उसी वुज़ू को काफ़ी समझना चाहिए। और अगर वुज़ू से न हो तो केवल वुज़ू करना ही काफ़ी है उस पर  ग़ुस्ल वाजिब नही है।

    354 वीर्य निकलने के बाद इंसान के लिए मुस्तहब है कि वह पेशाब करे। और अगर पेशाब न करे व ग़ुस्ल करने के बाद उसके मुत्र मार्ग से कोई ऐसी तरी निकले जिसके बारे में वह यह न जानता हो कि यह वीर्य है या कोई और चीज़ तो वह तरी वार्य ही मानी जायेगी।

    355  अगर कोई इंसान संभोग करे और उसका लिंग शिर्ष की मात्रा तक स्त्री की यौनी या गुदा में प्रवेश कर जाये तो चाहे वार्य निकले या न निकले वह दोनो जुनुब हो जायेंगे चाहे बालिग़ हो या ना बालिग़।

    356  अगर किसी को शक हो कि उसका लिंग शीर्ष की मात्रा तक अन्दर गया है या नही तो उस पर ग़ुस्ल वाजिब नही है।

    357  (खुदा न करे कि ऐसा हो) अगर कोई इंसान किसी जानवर के साथ संभोग करे और उसका वीर्य निकल जाये तो केवल ग़ुस्ल कर लेना ही काफ़ी है। और अगर वीर्य न निकले और उसने संभोग से पहले वुज़ू किया हो तो भी ग़ुस्ल करना ही काफ़ी है। और अगर वुज़ू न कर रखा हो तो एहतियाते वाजिब यह है कि वुज़ू और ग़ुस्ल दोनों करे। और अगर मर्द ने  किसी मर्द के साथ संभोग किया हो तब भी यही हुक्म है।

    358  अगर वीर्य अपनी जगह से हिल जाये परन्तु बाहर न निकले या इंसान को शक हो कि वीर्य निकला है या नही तो उस पर ग़ुस्ल वाजिब नही है।

    359 जो इंसान ग़ुस्ल न कर सकता हो परन्तु तयम्मुम कर सकता हो तो वह इंसान नमाज़ का समय होने के बाद भी अपनी बीवी से संभोग कर सकता है।

    360 अगर कोई इंसान अपने कपड़ों पर वीर्य लगा देखे और यह भी जानता हो कि यह उसका स्वयं का वीर्य है और उसने इसके निकलने के बाद ग़ुस्ल न किया हो तो उसके लिए ग़ुस्ल करना ज़रूरी है। और जिन नमाज़ों के बारे में उसे यक़ीन हो कि उसने इन्हें वीर्य निकलने के बाद पढ़ा है उनकी कज़ा करे। लेकिन उन नमाज़ों की कज़ा ज़रूरी नही है जिनके बारे में यह एहतिमाल कि वह उसने वीर्य निकलने से पहले पढ़ी थीं।

    वह कार्य जो मुजनिब पर हराम है।

    नोटः वीर्यनिकलने के बाद, ग़ुस्ल या तयम्मुम करने से पहले इंसान मुजनिब कहलाता है)

    361  मुजनिब इंसान पर निम्न लिखित पाँच कार्य हराम हैं।

    · क़ुरआने करीम के अलफ़ाज और अल्लाह के नामों को छूना चाहे वह किसी भी ज़बान में लिखे हो। और बेहतर यह है कि पैगम्बरो, इमामों और हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के नामों को भी न छुवा जाये।

    · मस्जिदुल हराम व मस्जिदुन नबी में जाना चाहे एक दरवाज़े से दाख़िल हो कर दूसरे दरवाज़े से बाहर निकलना ही क्योँ न हो।

    · मस्जिदुल हराम व मस्जिदुन नबी के अलावा अन्य मस्जिदों में रुकना। और एहतियाते वाजिब यह है कि इमामों के हरम में भी न रुका जाये। लेकिन अगर आम मस्जिदों को केवल पार करना हो तो यानी एक दरवाज़े से दाख़िल हो कर दूसरे दरवाज़े से निकल जाना हो तो इसमें कोई हरज नही है।

    · एहतियाते लाज़िम की बिना पर किसी मस्जिद में कोई चीज़ रखने या उठाने के लिए दाख़िल होना।

    · कुरआने करीम की उन आयतों का पढ़ना जिन के पढ़ने पर सजदा वाजिब हो जाता हो। और वह आयते इन सूरोह में हैं- (अ) सूरह-ए-अलिफ़ लाम तनज़ील (ब) सूरह-ए- हाम मीम सजदह (स) सूरह-ए-वन नज्म (द) सूरह-ए –अलक़।

    वह कार्य जो मुजनिब के लिए मकरूह हैं।

    362  मुजनिब इंसान के लिए नौ कार्य मकरूह हैं।

    ·खाना, पीना लेकिन अगर हाथ मुँह धो लिये जायें और कुल्ली कर ली जाये तो मकरूह नही है। और अगर सिर्फ़ हाथ धो लिये जायें तो तब भी कराहत कम हो जायेगी।

    ·कुरआने करीम की सात से ज़्यादा उन आयतों को पढ़ना जिनमें वाजिब सजदा न हो।

    ·कुरआने मजीद की ज़िल्द, हाशिये या अलफ़ाज़ के बीच की ख़ाली जगह को छूना।

    ·कुरआने करीम को अपने साथ रखना।

    ·सोना- लेकिन अगर वुज़ू कर ले या पानी न होने की वजह से ग़ुस्ल के बदले तयम्मुम कर ले इसके बाद सोना मकरूह नही है।

    ·मेंहदी या इससे मिलती जुलती किसी चीज़ से ख़िज़ाब करना।

    ·बदन पर तेल की मालिश करना।

    ·एहतिलाम(स्वप्न दोष) हो जाने के बाद संभोग करना।

    ग़ुस्ले जनाबत

    363 ग़ुस्ले जनाबत वाजिब नमाज़ पढ़ने और ऐसी ही दूसरी इबादतों के लिए वाजिब हो जाता है, लेकिन नमाज़े मय्यित,सजदा-ए-सह्व, सजद-ए-शुक्र और कुरआने मजीद के वाजिब सजदों के लिए ग़ुस्ले जनाबत ज़रूरी नही है।

    364 ज़रूरी नही है कि इंसान ग़ुस्ल के वक़्त नियत करे कि वाजिब ग़ुस्ल कर रहा हूँ, बल्कि अगर अल्लाह की कुरबत के इरादे से ग़ुस्ल करे तो काफ़ी है।

    365 अगर किसी इंसान को यक़ीन हो कि नमाज़ का वक़्त हो गया है और वह वाजिब की नियत से ग़ुस्ल कर ले, बाद में मालूम हो कि अभी नमाज़ का वक़्त नही हुआ है तो उसका ग़ुस्ल सही है।

    366 ग़ुस्ले जनाबत करने के दो तरीक़े हैं। (अ) तरतीबी (आ) इरतेमासी।

    ग़ुस्ले तरतीबी  

    367 एहतियाते लाज़िम यह है कि अगर इंसान ग़ुस्ले तरतीबी करना चाहे तो नियत करने के बाद, पहले अपने सर व गर्दन को धोये और बाद में बदन को। बेहतर यह है कि पहले बदन का दाहिना हिस्सा धोये और बाद में बायाँ हिस्सा। अगर कोई इंसान ग़स्ले तरतीबी की नियत से अपने सर, दाहिने हिस्से और बायँ हिस्से को पानी में डुबो कर पानी के अन्दर ही अन्दर हिलाये तो उसके ग़ुस्ल के सही होने में इश्काल है। और एहतियात यह है कि ऐसा न करे। अगर कोई इंसान, जान बूझ कर या मसला न जानने की बिना पर बदन को सर से पहले धो ले तो उसका ग़ुस्ल सही नही है।

    368   

    369  इंसान को इस बात का नयक़ीन करने के लिए कि उसने सर व गर्द और बदन के दाहिने व बायेँ हिस्से को पूरा धो लिया है, उसे चाहिए कि हर हिस्से को धोते वक़्त उसके साथ बाद वाले हिस्से का भी थोड़ा धो ले।

    370  अगर किसी इंसान को ग़ुस्ल करने बाद पता चले कि बदन कुछ हिस्सा धुले बग़ैर रह गया है लेकिन उसे यह पता न हो कि कौनसा हिस्सा रह गया है तो सर का दोबारा धोना ज़रूरी नही है, बल्कि बदन के सिर्फ़ उसी हिस्से को धोना ज़रूरी है, जिसके न धोये जाने का एहतेमाल हो।

    371  अगर किसी इंसान को ग़ुस्ल के बाद पता चले कि बदन की कुछ जगह धुलने से रह गयी है, तो अगर वह जगह बायीं तरफ़ की है तो सिर्फ़ उस जगह का धोना काफ़ी है। लेकिन अगर बग़ैर धुली जगह दाहिनी तरफ़  रह गयी हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस जगह को धोने के बाद बायीँ तरफ़ को दोबारा धोया जाये। लेकिन अगर सर या गर्दन का कोई हिस्सा धुले बग़ैर रह गया हो तो ज़रूरी है कि उस हिस्से को धोने के बाद गर्दन से नीचे के पूरे बदन को दोबारा धोये।

    372  अगर किसी इंसान को ग़ुस्ल पूरा होने से पहले शक हो कि दाहिनी या बायीं तरफ़ का कुछ हिस्सा धुलने से रह गया है तो उसके लिए ज़रूरी है कि जिस हिस्से के बारे में शक हो सिर्फ़ उसे धेये। लेकिन अगर उसे सर या गर्दन के कुछ हिस्से के न धुलने के बारे में शक हो तो ज़रूरी है कि पहले उस शक वाले हिस्से को धोये और बाद में बदन के दाहिने व बायें हिस्से को दोबारा धोये।

    ग़ुस्ले इरतेमासी

    इरते मासी ग़ुस्ल दो तरीक़ों से किया जा सकता है (अ) दफ़ई (आ) तदरीजी

    373  जब इंसान ग़ुस्ले इरतेमासी दफ़ई कर रहा हो तो ज़रूरी है कि एक साथ पूरे बदन को पानी में डुबा दे। लेकिन ज़रूरी नही है कि ग़ुस्ल की नियत से पहले उसका पूरा बदन पानी से बाहर हो। अगर इंसान के बदन का कुछ पानी में और कुछ हिस्सा पानी से बाहर हो और वह वहीँ, ग़ुस्ल की नियत कर के पानी में डुबकी लगा ले तो उसका ग़ुस्ल सही है।

    374  अगर इंसान ग़ुस्ले इरतेमासी तदरीज़ी करना चाहता हो तो ज़रूरी है कि ग़ुस्ल की नियत से, एक दफ़ा बदन को धोने का ख़याल रखते हुए पानी में आहिस्ता आहिस्ता डुबकी लगाये। लेकिन इस तरह के ग़ुस्ल में ज़रूरी है कि ग़ुस्ल से पहले, ग़ुस्ल करने वाले का पूरा बदन पानी से बाहर हो।

    375  अगर किसी इंसान को ग़ुस्ले इरतेमासी करने के बाद पता चले कि बदन का कुछ हिस्सा ऐसा रह गया है जिस तक पानी नही पहुँच पाया है, तो चाहे वह इस हिस्से के बारे में जानता हो या न जानता हो, उसके लिए ज़रूरी है कि दोबारा ग़ुस्ल करे।

    376  अगर किसी इंसान के पास ग़ुस्ले तरतीबी के लिए वक़्त न हो लेकिन वह इस कम वक़्त में ग़ुस्ले इरतेमासी कर सकता हो तो उसके लिए ग़ुस्ले इरतेमासी करना ही ज़रूरी है।

    377  हज व उमरे का एहराम बाँधे होने की हालत में इंसान ग़ुस्ले इरतेमासी नही कर सकता, लेकिन अगर वह भूले से ग़ुस्ले इरतेमासी कर ले, तो उसका ग़ुस्ल सही है।

    ग़ुस्ल के अहकाम

    378  चाहे ग़ुस्ल तरतीबी हो या इरतेमासी, ग़ुस्ल से पहले पूरे बदन का पाक होना ज़रूरी नही है। बल्कि अगर पानी में डुबकी लगाने या ग़ुस्ल के इरादे से बदन पर पानी डालने से बदन पाक हो जाये तो ग़ुस्ल सही है।

    379  अगर कोई इंसान अपने वीर्य को हराम प्रकार से निकाले के बाद गर्म पानी से ग़ुस्ल करे और उसे पसीना आ जाये तो उसका ग़ुस्ल सही है। लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि वह ठंडे पानी से ग़ुस्ल करे।

    380  ग़ुस्ल में अगर जिस्म का बाल बराबर हिस्सा भी बग़ैर धुला रह जाये तो ग़ुस्ल बातिल है। लेकिन कान, व नाक के अन्दुरूनी हिस्सों का धोना ज़रूरी नही है। इसी तरह बदन के अन्य वह हिस्से जो अन्दुरूनी समझे जाते हैं उनका धोना बी ज़रूरी नही है।

    381  अगर किसी इंसान को यह शक हो कि बदन का यह हिस्सा बाहरी होता है या अन्दुरूनी, तो ज़रूरी है कि वह उसे धोये।

    382   अगर, कान में बाली पहन ने वाला सुराख़ या इसी जैसा कोई और सुराख इतना खुला हुआ हो कि उसे बदन का ज़ाहिरी हिस्सा समझा जाता हो तो उसे धोना ज़रूरी है, लेकिन अगर बाहरी हिस्सा न समझा जाता हो तो उसे धोना ज़रूरी नही है।

    383  अगर इंसान के बदन पर कोई ऐसी चीज़ लगी हो जो बदन तक पानी पहुँचने में रुकावट हो, तो ग़ुस्ल से पहले साफ़ कर देना चाहिए। लेकिन अगर उसके साफ़ होने का यक़ीन किये बग़ैर ग़ुस्ल कर ले , तो ग़ुस्ल बातिल है।

    384  अगर ग़ुस्ल करते वक़्त इंसान को शक हो कि बदन पर कोई ऐसी चीज़ तो मौजूद नही है जो बदन तक पानी के पहुँचने में रुकावट हो, तो उसे चाहिए कि पहले इस शक को दूर करे और जब मुतमइन हो जाये कि ऐसी कोई चीज़ नही है तो ग़ुस्ल करे।

    385  ग़ुस्ल में बदन के उन छोटे छोटे बालों का धोना ज़रूरी है जो बदन का जुज़ माने जाते हैं, मगर लम्बे बालों का धोना वाजिब नही है, बल्कि अगर इनके धोये बिना बदन की खाल तक पानी पहुँच जाये तो ग़ुस्ल सही है। लेकिन अगर इनको धोये बिना पानी बदन की खाल तक न पहुँचता हो तो इनका धोना भी ज़रूरी है।

    386  वह तमाम शर्तें जो वुज़ू के सही होने के लिए ज़रूरी हैं, जैसे पानी का पाक होना, ग़स्बी न होना आदि , वह तमाम शर्तें ग़ुस्ल के सही होने के लिए भी ज़रूरी है। लेकिन ग़ुस्ल में यह ज़रूरी नही है कि बदन को ऊपर से नीचे की तरफ़ धोया जाये। दूसरे यह कि ग़ुस्ले तरतीबी में ज़रूरी नही है कि सरव गर्दन धोने के फ़ौरन बाद बदन को भी धोये,बल्कि अगर सर व गर्दन धोने के बाद कुछ देर रुक जाये और बाद में बाक़ी बदन के धोये तो कोई हरज नही है। यह भी ज़रूरी नही है कि सर व गर्दन और तमाम बदन को एक साथ धोये। मसलन अगर अगर एक इंसान सर धोने के बाद रुक जाये और कुछ देर गुज़रने के बाद गर्दन धोये तो यह जायज़ है।लेकिन जो इंसान पेशाब या पख़ाने को न रोक सकता हो अगर उसको इतनी देर के लिए पेशाब या पख़ाना न आता हो जितनी देर में वह वुज़ू कर के नमाज़ पढ सके, तो उसके लिए ज़रूरी है कि फ़ासले किये बिना गुस्ल करे और नमाज़ पढ़े।

    387  अगर कोई इंसान यह इरादा करे कि हमाम वाले के पैसे उधार करेगा, और वह हमाम वाले से यह पूछे बग़ैर कि वह उधार पर राज़ी है या नही ग़ुस्ल कर ले, तो अगर वह बाद में हमाम वाले को राज़ी कर ले तब भी उसका ग़ुस्ल बातिल है।

    388   अगर हमाम का मालिक उधार ग़ुस्ल कराने पर राज़ी हो, लेकिन ग़ुस्ल करने वाले उसके पैसे न देने या हराम माल से देने का इरादा रखता हो तो इसका ग़ुस्ल बातिल है।

    389  अगर कोई इंसान हमाम वाले को ऐसी रक़म से पैसा दे जिसका ख़ुमुस न निकला हो, तो वह एक हराम काम का तो मुरतकिब होगा लेकिन उसका ग़ुस्ल सही है। और ख़ुमुस के हक़दारों को खुमुस देना उसके ज़िम्मे रहेगा।

    390  अगर कोई इंसान हमाम के हौज़ के पानी से पखाने की तहारत करे और ग़ुस्ल करने से पहले शक करे कि  चूँकि उसने हमाम के हौज़ के पानी से तहारत की है लिहाज़ हमाम वाला उसके ग़ुस्ल करने पर राज़ी है या नही, तो अगर वह ग़ुस्ल से पहले हमाम वाले को राज़ी कर ले तो उसका ग़ुस्ल सही है,वरना बातिल है।

    391  अगर कोई इंसान शक करे कि उसने ग़ुस्ल किया है या नही तो उसके लिए ज़रूरी है कि ग़ुस्ल करे, लेकिन अगर ग़ुस्ल करने के बाद शक करे कि उसने ग़ुस्ल सही किया है या नही तो दोबारा ग़ुस्ल करना सही नही है।

    392  अगर ग़ुस्ल करते वक़्त कोई हदसे असग़र सर ज़द हो जाये मसलन वह पेशाब कर दे या उसकी रीह ख़ारिज हो जाये तो, नये सिरे से ग़ुस्ल करना ज़रूरी नही है, बल्कि वह अपने ग़ुस्ल के पूरा करे और एहतियाते लाज़िम की बिना पर वुज़ू भी करे। लेकिन अगर वह ग़ुस्ले तरतीबी से ग़ुस्ले इरतेमासी की तरफ़ या ग़ुस्ले इरतेमासी से तरतीबी की तरफ़ या इरतेमासी दफ़ई की तरफ़ पलट जाये तो वुज़ू करना ज़रूरी नही है।

    393  अगर वक़्त कम होने की वजह से किसी की ज़िम्मेदारी तयम्मुम करना हो, लेकिन वह इस ख़्याल से कि अभी उसके पास ग़ुस्ल व नमाज़ का वक़्त बाक़ी है, ग़ुस्ल करे, तो अगर उसने ग़ुस्ल क़ुरबत की नियत से  किया है तो उसका ग़ुस्ल सही है चाहे उसने नमाज़ पढ़ने के लिए ही ग़ुस्ल क्योँ न किया हो।

    394  जिस इंसान का वीर्य निकला हो, अगर वह शक करे कि वीर्य निकलने के बाद उसने ग़ुस्ल किया है या नही तो जो नमाज़े वह पढ़ चुका है वह सही हैं, लेकिन बाद की नमाज़ों के लिए ग़ुस्ल करना ज़रूरी है। और अगर नमाज़ के बाद उससे कोई हदसे असग़र सादिर हुआ हो (अर्थात पेशाब, पख़ाना या रीह का निकलना) तो ज़रूरी है कि वुज़ू भी करे। और अगर वक़्त बाक़ी हो तो एहतियाते लाज़िम यह है कि इस हालत में पढ़ी हुई नमाज़ों को दोबारा पढ़े।

    395  जिस इंसान पर कई ग़ुस्ल वाजिब हो, वह उन सब की नियत कर के एक ग़ुस्ल कर सकता है। और ज़ाहिर यह है कि अगर उन में से किसी एक मख़सूस ग़ुस्ल की नियत करे, तो वह बाक़ी ग़ुस्लों के लिए भी काफ़ी है।

    396  अगर बदन के किसी हिस्से पर क़ुरआने करीम की कोई आयत  या अल्लाह का नाम लिख़ा हो, तो उसे चाहिए कि वुज़ू या ग़ुस्ले तरतीबी करते वक़्त अपने बदन पर पानी इस तरह पहुँचाये कि उसका हाथ इन अलफ़ाज़ों को न लगे।

    397  जिस इंसान ग़ुस्ले जनाबत किया हो उसके लिए ज़रूरी नही है कि नमाज़ के लिए वुज़ू करे। बल्कि ग़ुस्ले इस्तेहाज़ा मुतवस्सेता के अलावा अन्य वाजिब ग़ुस्लों और मुस्तहब ग़ुस्लों के बाद जिनका बयान मसला न. 651 में आयेगा, नमाज़ वुज़ू केन बग़ैर पढ़ सकता है, लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि इन ग़ुस्लों के बाद नमाज़ के लिए वुज़ू करे।