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    विकास

    विकास
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    विकास बहुत रोचक और लुभावना शब्द है और इसमें बहुत अर्थ निहित हैं किंतु यह भी एक सच्चाई है कि विकास के कई रूप हैं और ज़रूरी नहीं है कि विकास का हर रूप हर समाज और हर राष्ट्र के लिए हितकर व रुचिकर हो। यही कारण है कि इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता ने बार बार इस बात पर बल दिया है कि विकास के ईरान-इस्लामी आदर्श का निर्धारण किया जाना आवश्यक है ताकि आदर्श का निर्धारण हो जाने के बाद सही दिशा में प्रगति की जा सके। आदर्श सामने हो तो गंतव्य की ओर प्रस्थान करने में देरी नहीं  लगती और इंसान इधर उधर भटके बग़ैर सही दिशा में आगे बढ़ता है।

    विकास के ईरान-इस्लामी आदर्श का निर्धारण देश के महत्वपूर्ण विषयों में से एक है। यह मामला एसा है जिसमें दूसरे दर्जनों आंशिक मामले निहित हैं जिन्हें बाद में बयान किया जाएगा। यह मामले इसी प्रकार जारी रहेंगे और इनकी समीक्षा की प्रक्रिया भी जारी रहेगी। विकास के एक नए नमूने पर विचार और यह आभास करना कि इस संबंध में हमें अपने पांव पर खड़ा होना और आज़ाद होकर सोचना चाहिए, इस बात का कारण बनेगा कि दूसरों के विकास नमूनों की कमियां और त्रुटियां हमारे सामने आ जाएंगी। आज हमें इस चीज़ की बड़ी आवश्यकता है। विकास से हमारा तात्पर्य क्या है यह हमारी नज़र में पूरी तरह स्पष्ट है। हम इसकी सही परिभाषा भी पेश कर सकते हैं और यह भी बता सकते हैं कि विकास के मैदान क्या हैं। इसकी दिशा क्या है? हम विकास का नमूना दूसरों से नहीं लेना चाहते। हम यह चाहते हैं कि जो हमारी नज़र में आवश्यक है, जो हमारे देश के हित में है, जिससे हमारा भविष्य संवर सकता है, हम उसे एक विशेष रूप में ढालें और उस विकास के लिए प्रयास तेज़ करें। अतः विकास का यह नमूना शुद्ध ईरानी व इस्लामी नमूना हैं क्योंकि लक्ष्य, गंतव्य, मूल्य, और शैली सब इस्लामी शिक्षाओं से उत्प्रेरित है। अर्थात हमने इस्लामी शिक्षाओं और इस्लामी ज्ञान को आधार बनाया है। हमारा समाज एक इस्लामी समाज है, हमारी सरकार के एक इस्लामी सरकार है और हमारी विशेषता यह है कि हम इस्लामी सिद्धांतों और इस्लामी शिक्षाओं के दायरे में आगे बढ़ते हैं। हम जो कहते हैं कि विकास का नमूना तो नमूने का अर्थ है समग्र योजना और रोडमैप। यदि हमारे पास रोडमैप न हो तो हम भटक जाएंगे। आप देखिए कि इन तीस वर्षों के दौरान हम कभी कभी जटिल और निर्रथक तथा महत्वहीन कामों में भी उलझ गए और कभी कहीं तो कभी हीं सर धुनते रहे। एसा भी हुआ कि कभी एक काम अंजाम दिया गया और फिर उसके बिल्कुल विपरीत और प्रतकूल काम करना पड़ा। सांस्कृतिक मैदान में भी, आर्थिक क्षेत्र में भी और अन्य मैदानों में भीं इसका कारण यह है कि हमारे पास रोडमैप नहीं था। विकास का नमूना एक समग्र नमूना है। इससे हमें यह भी ज्ञात रहेगा कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और हमारा लक्ष्य क्या है?

    हम जो ईरानी व इस्लामी नमूने की बात करते हैं तो इससे कदापि यह तात्पर्य नहीं है कि हम दूसरों के अनुभवों से लाभ नहीं उठाना चाहते। हम ज्ञान की प्राप्ति में किसी सीमा को नहीं मानते। जहां भी हमें ज्ञान मिल जाए जहां भी हमें सफल और अच्छा अनुभव मिले हम वहां जाएंगे किंतु हम कहीं से कुछ भी आंखें बंद करके नहीं लेंगे। ज्ञान की दुनिया में जो चीज़ हमें फ़ायदे की और काम की लगेगी हम उसे ले लेंगे।

    विकास के आदर्श के निर्धारण का कारण पूछा जाता है कि इसकी क्या ज़रूरत है? यह काम पहले क्यों नहीं किया गया और अब क्या ज़रूरत आ पड़ी है? क्रान्ति के बाद तीस साल का समय बीता है और इस प्रकार के बड़े कामों के लिए तीस साल का समय बहुत अधिक नहीं होता। धीरे धीरे अनुभव जमा होते हैं, जानकारियों एकत्रित होती हैं, राजनैतिक व आर्थिक परिस्थितियां बनती हैं तब हम कुछ एसी मंज़िलों पर पहुंचते हैं जो अज्ञात हों और जिन्हें हमने पहली बार देखा हो।

    विकास के मूल रूप से चार मैदान हें। एक है जीवन का मैदान जिसमें न्याय, स्वास्थ्य, सरकार, सुविधाएं आदिश शामिल हैं। सबसे पहले विकास सोच और चिंतन के क्षेत्र में होना चाहिए। हमें अपने समाज को सोच समझ कर और चिंतन के साथ काम करने वाला समाज बनाना चाहिए। यह पाठ हमें क़ुरआन से मिलता है। आप देखिए! क़ुरआन में बार बार वह जाति के लिए जो विचार करती हे, उस जाति के लिए जो बुद्धि को प्रयोग करती है, तो क्या उनके पास अक़्ल नहीं है, क्या वे सोचते नहीं। हमें  चाहिए कि अपने समाज में सोच विचार और चिंतन मनन को आम कर दें लोगों को मंथन करने का आदी बनाएं।

    विकास का दूसरा मैदान जिसका महत्व पहले मैदान से अधिक है, ज्ञात विज्ञान का मैदान है। हमें ज्ञान के मैदान में विकास करने की आवश्यकता है। वैसे ज्ञान प्रतिफल होता है चिंतन और मंथन का। अतः वर्तमान काल में वैचारिक विकास के संबंध में किसी प्रकार की भी लापरवाही नहीं होनी चाहिए। ज्ञान का मामला यह है कि तकनीक और नए विज्ञान के रूप में ज्ञान का अस्तित्व सामने आता है।

    विकास का एक और मैदान है अध्यात्म व शिष्टाचार। हमें यह नमूना इस प्रकार तैयार करना है कि वह हमारे ईरानी समाज को अधिक से अधिक अध्यात्म और धर्म की ओर आकर्षित करे। यह बात हमारे सामने स्पष्ट हो जानी चाहिए कि अध्यात्म का ज्ञान विज्ञान, शासन, राजनीति, स्वतंत्रता और अन्य बातों से टकराव और विरोधाभास नहीं है क्योंकि अध्यात्म तो इन सब बातों की आत्मा है। अर्थात विज्ञान और ज्ञान के साथ ही यदि धर्म और अध्यात्म भी हो तो दुनिया इंसानियत के आभूषण से संवर सकती है। संसार इस प्रकार संवर जाएगा कि वह मानव जीवन की प्रतिष्ठा और गौरव के अनुरूप दिखाई देगा। जिस दुनिया में ज्ञान के साथ साथ अध्यात्म और धर्म भी हो उसे सही मानवीय दुनिया कहा जाना चाहिए। वैसे इस प्रकार की दुनिया का सही आदर्श और नमूना बारहवें इमाम के काल में हमारे सामने आएगा।

    विकास

    विकास बहुत रोचक और लुभावना शब्द है और इसमें बहुत अर्थ निहित हैं किंतु यह भी एक सच्चाई है कि विकास के कई रूप हैं और ज़रूरी नहीं है कि विकास का हर रूप हर समाज और हर राष्ट्र के लिए हितकर व रुचिकर हो। यही कारण है कि इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता ने बार बार इस बात पर बल दिया है कि विकास के ईरान-इस्लामी आदर्श का निर्धारण किया जाना आवश्यक है ताकि आदर्श का निर्धारण हो जाने के बाद सही दिशा में प्रगति की जा सके। आदर्श सामने हो तो गंतव्य की ओर प्रस्थान करने में देरी नहीं  लगती और इंसान इधर उधर भटके बग़ैर सही दिशा में आगे बढ़ता है।

    विकास के ईरान-इस्लामी आदर्श का निर्धारण देश के महत्वपूर्ण विषयों में से एक है। यह मामला एसा है जिसमें दूसरे दर्जनों आंशिक मामले निहित हैं जिन्हें बाद में बयान किया जाएगा। यह मामले इसी प्रकार जारी रहेंगे और इनकी समीक्षा की प्रक्रिया भी जारी रहेगी। विकास के एक नए नमूने पर विचार और यह आभास करना कि इस संबंध में हमें अपने पांव पर खड़ा होना और आज़ाद होकर सोचना चाहिए, इस बात का कारण बनेगा कि दूसरों के विकास नमूनों की कमियां और त्रुटियां हमारे सामने आ जाएंगी। आज हमें इस चीज़ की बड़ी आवश्यकता है। विकास से हमारा तात्पर्य क्या है यह हमारी नज़र में पूरी तरह स्पष्ट है। हम इसकी सही परिभाषा भी पेश कर सकते हैं और यह भी बता सकते हैं कि विकास के मैदान क्या हैं। इसकी दिशा क्या है? हम विकास का नमूना दूसरों से नहीं लेना चाहते। हम यह चाहते हैं कि जो हमारी नज़र में आवश्यक है, जो हमारे देश के हित में है, जिससे हमारा भविष्य संवर सकता है, हम उसे एक विशेष रूप में ढालें और उस विकास के लिए प्रयास तेज़ करें। अतः विकास का यह नमूना शुद्ध ईरानी व इस्लामी नमूना हैं क्योंकि लक्ष्य, गंतव्य, मूल्य, और शैली सब इस्लामी शिक्षाओं से उत्प्रेरित है। अर्थात हमने इस्लामी शिक्षाओं और इस्लामी ज्ञान को आधार बनाया है। हमारा समाज एक इस्लामी समाज है, हमारी सरकार के एक इस्लामी सरकार है और हमारी विशेषता यह है कि हम इस्लामी सिद्धांतों और इस्लामी शिक्षाओं के दायरे में आगे बढ़ते हैं। हम जो कहते हैं कि विकास का नमूना तो नमूने का अर्थ है समग्र योजना और रोडमैप। यदि हमारे पास रोडमैप न हो तो हम भटक जाएंगे। आप देखिए कि इन तीस वर्षों के दौरान हम कभी कभी जटिल और निर्रथक तथा महत्वहीन कामों में भी उलझ गए और कभी कहीं तो कभी हीं सर धुनते रहे। एसा भी हुआ कि कभी एक काम अंजाम दिया गया और फिर उसके बिल्कुल विपरीत और प्रतकूल काम करना पड़ा। सांस्कृतिक मैदान में भी, आर्थिक क्षेत्र में भी और अन्य मैदानों में भीं इसका कारण यह है कि हमारे पास रोडमैप नहीं था। विकास का नमूना एक समग्र नमूना है। इससे हमें यह भी ज्ञात रहेगा कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और हमारा लक्ष्य क्या है?

    हम जो ईरानी व इस्लामी नमूने की बात करते हैं तो इससे कदापि यह तात्पर्य नहीं है कि हम दूसरों के अनुभवों से लाभ नहीं उठाना चाहते। हम ज्ञान की प्राप्ति में किसी सीमा को नहीं मानते। जहां भी हमें ज्ञान मिल जाए जहां भी हमें सफल और अच्छा अनुभव मिले हम वहां जाएंगे किंतु हम कहीं से कुछ भी आंखें बंद करके नहीं लेंगे। ज्ञान की दुनिया में जो चीज़ हमें फ़ायदे की और काम की लगेगी हम उसे ले लेंगे।

    विकास के आदर्श के निर्धारण का कारण पूछा जाता है कि इसकी क्या ज़रूरत है? यह काम पहले क्यों नहीं किया गया और अब क्या ज़रूरत आ पड़ी है? क्रान्ति के बाद तीस साल का समय बीता है और इस प्रकार के बड़े कामों के लिए तीस साल का समय बहुत अधिक नहीं होता। धीरे धीरे अनुभव जमा होते हैं, जानकारियों एकत्रित होती हैं, राजनैतिक व आर्थिक परिस्थितियां बनती हैं तब हम कुछ एसी मंज़िलों पर पहुंचते हैं जो अज्ञात हों और जिन्हें हमने पहली बार देखा हो।

    विकास के मूल रूप से चार मैदान हें। एक है जीवन का मैदान जिसमें न्याय, स्वास्थ्य, सरकार, सुविधाएं आदिश शामिल हैं। सबसे पहले विकास सोच और चिंतन के क्षेत्र में होना चाहिए। हमें अपने समाज को सोच समझ कर और चिंतन के साथ काम करने वाला समाज बनाना चाहिए। यह पाठ हमें क़ुरआन से मिलता है। आप देखिए! क़ुरआन में बार बार वह जाति के लिए जो विचार करती हे, उस जाति के लिए जो बुद्धि को प्रयोग करती है, तो क्या उनके पास अक़्ल नहीं है, क्या वे सोचते नहीं। हमें  चाहिए कि अपने समाज में सोच विचार और चिंतन मनन को आम कर दें लोगों को मंथन करने का आदी बनाएं।

    विकास का दूसरा मैदान जिसका महत्व पहले मैदान से अधिक है, ज्ञात विज्ञान का मैदान है। हमें ज्ञान के मैदान में विकास करने की आवश्यकता है। वैसे ज्ञान प्रतिफल होता है चिंतन और मंथन का। अतः वर्तमान काल में वैचारिक विकास के संबंध में किसी प्रकार की भी लापरवाही नहीं होनी चाहिए। ज्ञान का मामला यह है कि तकनीक और नए विज्ञान के रूप में ज्ञान का अस्तित्व सामने आता है।

    विकास का एक और मैदान है अध्यात्म व शिष्टाचार। हमें यह नमूना इस प्रकार तैयार करना है कि वह हमारे ईरानी समाज को अधिक से अधिक अध्यात्म और धर्म की ओर आकर्षित करे। यह बात हमारे सामने स्पष्ट हो जानी चाहिए कि अध्यात्म का ज्ञान विज्ञान, शासन, राजनीति, स्वतंत्रता और अन्य बातों से टकराव और विरोधाभास नहीं है क्योंकि अध्यात्म तो इन सब बातों की आत्मा है। अर्थात विज्ञान और ज्ञान के साथ ही यदि धर्म और अध्यात्म भी हो तो दुनिया इंसानियत के आभूषण से संवर सकती है। संसार इस प्रकार संवर जाएगा कि वह मानव जीवन की प्रतिष्ठा और गौरव के अनुरूप दिखाई देगा। जिस दुनिया में ज्ञान के साथ साथ अध्यात्म और धर्म भी हो उसे सही मानवीय दुनिया कहा जाना चाहिए। वैसे इस प्रकार की दुनिया का सही आदर्श और नमूना बारहवें इमाम के काल में हमारे सामने आएगा।

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