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    वुज़ू का तरीक़ा

    वुज़ू का तरीक़ा
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    वुज़ू एक इस्लामी इबादत है हालांकि वुज़ू ख़ुद मुस्तहेब है मगर कुछ इबादतों से पहले उसका अंजाम देना ज़रूरी है जैसे कि नमाज़ से पहले वाजिब है। इमाम मोहम्मद बाक़िर अ. का इरशाद हैः

    لاصلوۃ الا بطھور
    तहूर (वुज़ू या ग़ुस्ल) के बिना नमाज़ सही नहीं है।

    रसूले इस्लाम स. के हवाले से एक हदीस में आया हैः

    {افتتاح الصلوٰۃ الوضوء و تحریمھا التکبیر و تحلیلھا ،التسلیم}
    नमाज़ की शुरूआत वुज़ू से होती है….

    यह हदीस हज़रत अली अ. से बयान हुई है।
    वुज़ू के फ़िक़ही अहकाम (धर्मशास्त्र द्वारा दिए गए आदेश) बहुत हैं जिनका विवरण फ़िक़ही किताबों में मौजूद है इस स्थान पर हम केवल वुज़ू के तरीक़े और उसके बारे में शियों और सुन्नियों के बीच मौजूद मतभेद पर रौशनी डालेंगे जिनमें सबसे महत्व पूरण मतभेद यह है कि शियों की निगाह में चेहरे और दोनों हाथों को ऊपर से नीचे की तरफ़ धोना ज़रूरी है जबकि अहले सुन्नत इस शर्त को ज़रूरी नहीं समझते हैं, दूसरे शियों का नज़रिया यह है कि चेहरा और दोनों हाथ धोने के बाद सर और पैर का मसह करना ज़रूरी है और उन्हे धोना सही नहीं है लेकिन अहले सुन्नत सर और पैर के मसे को काफ़ी नहीं समझते बल्कि उन्हे धोना भी ज़रूरी जानते हैं।

    वुज़ू की आयत
    अब हम वुज़ू से सम्बंधित आयत पर एक निगाह डालते हैं यानि रिसर्च करते हैं ताकि इस बारे में शियों के नज़रिये की दलील और उनका तर्क मालूम हो सके।

    {یَاأَیُّہَا الَّذِینَ آمَنُوْا إِذَا قُمْتُمْ إِلَی الصَّلوٰۃِ فَاغْسِلُوا وُجُوہَکُمْ وَأَیْدِیَکُمْ إِلَی الْمَرَافِقِ وَامْسَحُوا بِرُئُ وْسِکُمْ وَأَرْجُلَکُمْ إِلَی الْکَعْبَیْنِ}
    ईमान वालों! जब भी नमाज़ के लिये उठो तो पहले अपने चेहरों, अपने हाथों को कोहनियों तक धुलो और सर और पैरों का गट्टे तक मसा करो।

    आयत से यह मालूम होता है कि वुज़ू में दो काम ज़रूरी हैं, ग़ुस्ल (धोना) और मसा करना।
    इस बारे में शियों और अहले सुन्नत के बीच यह मतभेद पाया जाता है कि चेहरे और हाथों को किस तरह धोया जाए? उन्हे ऊपर से नीचे की तरफ़ धोना ज़रूरी है या जिस तरह भी धो लिया जाए काफ़ी है? दूसरे यह कि पैरों का मसा ज़रूरी है या उन्हे धोना चाहिए?

    1. चेहरा और हाथ धोने का तरीक़ाः
    मशहूर शिया फ़क़ीहों (धर्मशास्त्रियों) का कहना यह है कि चेहरे और हाथों को ऊपर से नीचे की तरफ़ धोना चाहिये। हालांकि यह हुक्म वुज़ू से सम्बंधित आयत में नहीं आया है लेकिन अइम्मए ताहेरीन अ. से वुज़ू के तरीक़े के बारे में जो हदीसें बयान हुई हैं उनमें इसका पूरा विवरण मौजूद है, दूसरी तरफ़ दुनिया भर में हाथ-पैर और चेहरे या दूसरे हिस्सों को धोने का यही तरीक़ा प्रचलित है कि उन्हे ऊपर से नीचे की तरफ़ धोया जाता है इसके अलावा शिया उल्मा में सय्यद मुर्तुज़ा रह. के अलावा कोई इस नज़रिये से मतभेद नहीं रखता है इसी तरह अइम्मा के सहाबियों के बीच भी कोई इस अमल का मुख़ालिफ़ नज़र नहीं आता है। उपरोक्त दलीलों की रौशनी में शिया समुदाय का मशहूर, सर्वसम्मत और निश्चित नज़रिया यही है कि चेहरे और हाथों को ऊपर से नीचे की तरफ़ धोया जाए।
    इस स्थान पर ध्यान देने वाली बात यह है कि आयत में الی المرافق (कोहनियों तक) की क़ैद के द्वारा हाथों के धोने का तरीक़ा नहीं बल्कि हाथों को धोने की मात्रा बयान की गयी है क्योंकि अरबी ज़बान में, यद (हाथ) काँधे से लेकर उंगलियों तक के हिस्से को कहा जाता है क्योंकि बदन के अंगों की अहमियत उनके कामों के ऐतबार से होती है और हाथ के जो काम हैं वह आम तौर से कोहनी और उससे निचले हिस्से से अंजाम पाते हैं जैसे लिखना आदि। इस आधार पर यद इन सभी हिस्सों के लिये बोला जाता है। इसलिए उनके बीच इस हिसाब से सहभाजन (कुल एंव अंश) पाया जाता है जिसको निश्चित करने के लिये संकेत (indication) है इस आधार पर (الی المرافق) हाथों के धोने की मात्रा को निश्चित कर रहा है और रिवायतों को देखने के बाद साफ़ हो जाता है कि कोहनी तक से कोहनी के नीचे वाला हिस्सा मुराद है ना कि कोहनी से ऊपर का हिस्सा। इसी तरह रिवायतों से यह भी मालूम हो जाता है कि हथेली और उंगलियों का धोना भी वाजिब है लिकिन उन्हें किस तरह धोया जाए (ऊपर से नीचे की तरफ़ या नीचे से ऊपर की तरफ़) यह बयान नहीं हुआ है और नियम यह है कि जो शब्द बिना किसी क़ैद व शर्त के इस्तेमाल होता है उससे इसका नैचुरल और आम प्रमाण मुराद लिया जाता है और बदन को धोने के लिये आम और प्रचलित तरीक़ा यही है कि वह ऊपर से नीचे की तरफ़ धोते हैं उदाहरण स्वरूप अगर एक डाक्टर यह हुक्म दे कि बीमार के पैरों को घुटने तक धो दिया जाए तो आम तौर से उसके पैर को घुटने से नीचे की तरफ़ ही धोया जाता है, मासूमीन अ. की रिवायतें भी इसी करीक़े को ज़रूरी बताती हैं इस आधार पर चेहरे और दोनों हाथों को ऊपर से नीचे की तरफ़ धोना ज़रूरी है।
    अल्लामा तबरसी रह. के के अनुसार चेहरे और दोनों हाथों को ऊपर से नीचे की तरफ़ धोना काफ़ी और सही है इसमें भी कोई मतभेद नहीं है इसी तरह इसमें कोई मतभेद नहीं है कि कोहनी और हाथ के बाक़ी हिस्से को धोया जाएगा, मतभेद इसमें है कि हाथों और चेहरे को नीचे से ऊपर की तरफ़ तथा हाथों को कोहनी के नीचे से उंगलियों के सिरे तक धोना सही है या नहीं?
    इससे यह मालूम होता है कि ऊपर से नीचे की तरफ़ धोना ख़ुद आयत से समझ में आता है और यह उस वक़्त सम्भव है कि जब الی المرافق (कोहनियों तक) में الی (तक) ایدی (हाथों) के लिये क़ैद समझा जाए न कि ग़ुस्ल की क़ैद (धोने की क़ैद) क्योंकि अगर यह धोने की क़ैद होगी तो यह धोने के तरीक़े को बयान करेगी कि उंगलियों से कोहनी की तरफ़ धोया जाए और इससे यह समझ में आएगा कि ऊपर से नीचे की तरफ़ धोना सर्वसम्मत नहीं है।

    2. पैर का मसा
    शिया उल्मा का यह इजमाअ (सर्वसम्मति) है कि पैरों का मसा करना वाजिब है और उन्हे धोने से वुज़ू बातिल (ग़लत) हो जाता है यह बात अइम्मए मासूमीन अ. की रिवायतों से भी साबित है और वुज़ू की आयत से भी साफ़ तौर से समझ में आता है क्योंकि आयत ने पहले दो अंगों को (चेहरे और हाथ) को धोने का हुक्म दिया है और इसके बाद दो अंगों (सर और पैर) के मसे का हुक्म दिया है।

    1. {فاغسلوا وجوہکم و ایدیکم الی المرافق}
    2. {وامسحوا برئُ وسکم و أرجلکم الی الکعبین}
    मसे के हुक्म के बारे में ارجلکم को मंसूब (ज़बर के साथ) पढ़ा जाए या मजरूर (ज़ेर के साथ) इस से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है क्योंकि अरबी ज़बान के नियम के अनुसार ارجلکم बहेर हाल رؤو سکم पर अत्फ़ हुआ है यानि जो हुक्म उसपर लागू होगा वही इस पर भी लागू होगा।
    अगर ارجلکم को मजरूर पढ़ेंगे तो इसे लफ़्ज़े رؤو سکم पर अत्फ़ किया जाएगा और अगर इसे मन्सूब पढ़ेंगे तो वह رؤو سکم के महेल पर अत्फ़ होगा।
    (यह अरबी ज़बान के नियम से सम्बंधित बहेस है जिसे किसी उस्ताद से पूछा जा सकता है सादी ज़बान में इसे समझाना बहुत मुश्किल काम है।)
    कुछ सहाबी और ताबेईन भी इसी नज़रिये को मानते थे जिनमें इब्ने अब्बास, अनस इब्ने मालिक, अबुल आलिया, शअबी व अकरमा शामिल हैं। हसन बसरी और ज़ैदिया समुदाय के अगुवा नासेरुल हक़ जैसे लोग पैरों के ग़ुस्ल और मसे के बीच इख़्तियार को क़ुबूल करते हैं यानि इंसान कि इच्छा और मर्ज़ी पर निर्भर है।
    लेकिन अहले सुन्नत के चारों मज़हबों के इमामों और अहले सुन्नत का मशहूर नज़रिया यही है कि पैरों को धोना वाजिब है और वह उनके मसे को काफ़ी नहीं समझते हैं इस बारे में उनका स्रोत वह हदीसें हैं जो उनकी हदीसों की किताबों में लिखी हुई हैं जबकि यह हदीसें आयते वुज़ू के विवरण के बारे में नहीं हैं बल्कि उनमें केवल रसूले इस्लाम स. के अमल और कुछ सहाबियों के फ़त्वों का उल्लेख है और यह भी दो तरह की हैं कुछ रिवायतों के ऐतबार से पैर का मसा वाजिब है और कुछ के मुताबिक़ उन्हे धोना वाजिब है, बहेरहाल अहले सुन्नत के अधिकांश उल्मा पैरों के धोने को वाजिब जानते हैं क्योंकि यह नज़रिया वुज़ू की आयत के ज़ाहिरी अर्थ के अनुसार नहीं है इसलिए उन्होंने इसके विभिन्न अर्थ बयान किए हैं जैसेः