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    शन्ज़बे का अंजाम

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    पिछली कड़ी में हमने यह बताया था कि शन्ज़बे नामक गाय करवां से अलग होकर एक हरे भरे कछार में पहुंची। शन्ज़बे की दिमने नामक सियार के माध्यम से जो बहुत ही महत्वकांक्षी था, शेर से परिचित हुयी और यह परिचय दोनों के बीच गहरी मित्रता का आधार बनी यहां तक कि गाय, शेर की सलाहकार बन गयी। दिमने, जो इस पद की प्राप्ति का इच्छुक था, शन्ज़बे से जलने लगा और उसके मन में द्वेष पनपने लगा। उसने एक षड्यंत्र द्वारा शन्ज़बे से द्वेष के बीज को शेर के मन में बो दिया और अंततः यह षड्यंत्र शेर के हाथों शन्ज़बे की मौत का कारण बना। जिस समय दिमने के मित्र केलीले उसे उसके पाप के लिए धिक्कार रहा था, शेर का निकटवर्ती बाघ वहां से गुज़र रहा था उसने पूरी बात को सुन लिया और समझ गया कि शन्ज़बे निर्दोष मारी गयी और यह सब दिमने की चाल का परिणाम रहा है। बाघ, शेर की मां के पास गया और सारी घटना उसे बता दी। शेर की मां अपने लड़के के पास गयी। शेर ने जो शन्ज़बे की हत्या से पछता रहा था, अपनी मां को देखते ही अपना दुख इस प्रकार व्यक्त कियाः अभी तक मुझे विश्वास नहीं होता कि शन्ज़बे ग़लत थी। जैसे जैसे दिन बीत रहा है मेरा संदेह बढ़ता जा रहा है। जब उसके बारे में सोचता हूं तो उसकी बातें व व्यवहार याद आता है कि वह कितनी पवित्र व निर्दोष थी। उस समय मुझे स्वयं से घृणा लगती है और मन नहीं करता किसी को देखूं। शेर की मां ने जो अपने बेटे को भलिभांति पहचानती थी और समझ गयी थी कि वह वास्तव में पछता रहा है कहाः मैं यहां एक विषय पर तुमसे बात करने आयी हूं। मुझे एक विश्वस्त व्यक्ति ने बताया कि शन्ज़बे निर्दोष थी। और फिर सारी बात उसे बतायी। वास्तविकता को सुन कर शेर में पश्चाताप और बढ़ गया और उसने कहाः दिमने को मारना मेरे लिए सरल काम है। अभी इसी समय उसे मारने का आदेश दे सकता हूं किन्तु अब में जल्दबाज़ी में कोई निर्णय नहीं लेना चाहता। मुझे उस पर मुक़द्दमा चलाना चाहिए। शेर ने कुछ पशुओं को दिमने के पीछे भेजा कि उसे महल में लाएं। वे सब गए और थोड़ी ही देर में दिमने को लेकर पलटे। दिमने सारी बातों से अज्ञान बड़े प्रसन्न मन से महल में प्रविष्ट हुआ और यह सोच रहा था कि शेर उसे भवन में रहने के लिए कहेगा और अपना सलाहकार बनाएगा किन्तु शेर बहुत क्रोधित था इसलिए वह डर गया। सोचने लगा कि लगता है शेर को वास्तविकता का पता चल गया है किन्तु यह कैसे हो सकता है? जितना सोचता किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता। वहां शेर के सभी सलाहकारों को उपस्थित देख आश्चर्य में पड़ गया। इसी स्थिति में उसने शेर को सलाम करते हुए कहाः कछार के शासक शेर पर सलाम हो। शेर की मां ने क्रोध में उत्तर दिया। चापलूसी मत करो! शेर को सब पता चल गया है मक्कार धोखेबाज़! दिमने बौखलाया हुआ शेर की ओर बढ़ा और कहाः मेरे स्वामी क्या समस्या पेश आयी है? मुझे तुच्छ से क्या ग़लती हो गयी? इस बार भी शेर की मां ने शेर के बजाए उत्तर दियाः सबके सामने यह स्पष्ट हो गया है कि शन्ज़बे निर्दोष थी और जो कुछ तुमने उसके बारे में कहा था वह उससे तुम्हारे द्वेष के कारण था। तुम इस चाल द्वारा उसे अपने मार्ग से हटाना चाहते थे ताकि अपने लक्ष्य तक पहुंच सको। शेर ने ज़मीन पर अपनी दुम पटकते हुए अंगरक्षकों से कहाः अभी उसे यहां से ले जाओ यहां तक कि उसका दोष सिद्ध हो जाए। दिमने ने शेर को फिर धोखा देने का प्रयास किया। उसने शेर को संबोधित करते हुए कहाः मेरे स्वामी मेरे सामने मेरी निर्दोषिता सिद्ध है और जो कुछ मैंने आपसे कहा था वह निरी वास्तविकता थी यदि इस बारे में आप जांच करें तो मैं प्रसन्न हूंगा। दिमने ने सोचा कि इस बार भी वह अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से शेर को पट्टी पढ़ा देगा किन्तु शेर की मां बीच में बोल पड़ीः अब तुम्हारी बातों का मेरे बेटे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उसके बाद शेर को संबोधित करते हुए कहाः यदि आज पापी दिमने को छोड़ दिया तो कल हर व्यक्ति अपराध का दुस्साहस करेगा क्योंकि उसे पता होगा कि तुम सरलता से उसे छोड़ दोगे। शेर ने दिमने को जेल में डालने का आदेश दिया। जिस समय अंगरक्षक दिमने को ले गए तो शेर की मां ने कहाः मैंने उसकी मक्कारी के बारे में सुना था मगर अब विश्वास हो गया कि वह बड़ा मक्कार है। काश मैं यात्रा पर न जाती। शायद इस घटना को रोक देती। दिमने को यथाशीघ्र उसके किए का दंड मिलना चाहिए। शेर ने सिर हिलाते हुए कहाः मां आप सही कह रही हैं महल के बहुत से लोग इस बात पर राज़ी हैं कि दिमने को जान से मार दिया जाए किन्तु इस बार मैं जल्दबाज़ी नहीं करना चाहता। उसका दोष सिद्ध हो जाने पर उसे जान से मारने का आदेश जारी करुंगा। दिमने को जेल भेज दिया गया। केलीले को जब यह समाचार मिला तो बहुत चिंतित हुआ और उससे मिलने गया। जिस समय उसने दिमने को जेल में देखा रोने लगा। शांत होने पर कहाः जेल में तुम्हें देख कर मैं सुकून से जीवन नहीं बिता सकता। तुमको कितना समझाया था मगर तुमने मेरी बात न मानी। तुम्हें नसीहत सबसे बुरी लगती थी। मैं स्वयं को दोषी समझता हूं। उसी समय यदि तुम्हें शेर से सारी बात बताने की धमकी दी होती तो शायद तुम इस कृत्य से पीछे हट जाते। मुझसे तुम्हारी अप्रसन्नता किसी निर्दोष की हत्या तथा तुम्हारे जेल में बंद होने से बेहतर होती। दिमने ने जेल की सलाख़ों से उसे देखा जानता था कि वह सही कह रहा है। रुंधी हुयी आवाज़ में दिमने ने केलीले से कहाः तुमने मित्रता का हक़ अदा कर दिया किन्तु मेरे मन में द्वेष तथा उच्च अधिकार की प्राप्ति की इच्छा ने मेरी आंखें अंधी कर दी और मैं तुम्हारी बात पर ध्यान नहीं दे सका। तुम स्वयं को बुरा भला मत कहो जो व्यक्ति जो बोता है वही काटता है। केलीले ने कहाः यदि कहो तो शेर के पास जाउं और वास्तविकता उसे बता कर तुम्हारे लिए क्षमा का निवेदन करूं। दिमने ने तुरंत कहाः यह न करो वह बहुत क्रोधित है। उसे चाल से शांत किया जा सकता है। केलीले ने कहाः कम से कम तुम अपने दोष को तो स्वीकार करो। शायद इस प्रकार तुम्हारा दंड कम हो जाए वरना तुम्हें मार डालेंगे। दिमने ने कहाः सदैव की भांति तुम्हारी बात सही है इस बारे में विचार करुंगा। केलीले इस बात से अनभिज्ञ कि दिमने की कोठरी के बग़ल वाली कोठरी में मौजूद पशु उनकी बात सुन रहा था, रोते हुए वहां से चला गया। अगले दिन सुबह को शेर ने बड़े न्यायधीश को बुलाया और जांच का काम उसके हवाले कर दिया। बड़े न्यायधीश ने सभी पशुओं को इकट्ठा किया। जब सब इकट्ठा हो गए तो ऊंची आवाज़ में कहाः क्या तुम्हारे बीच कोई ऐसा है जो शन्ज़बे और दिमने की घटना की वास्तविकता से अवगत है और शन्ज़बे की निर्दोषिता को सिद्ध कर सके। सब चुप थे। किसी को घटना की वास्तविकता का ज्ञान नहीं था। केलीले भी वहां मौजूद था किन्तु चुप रहा। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहे। दूसरी ओर निर्दोष का ख़ून बहने से दुखी था। दिमने उसका मित्र था इसलिए वास्तविकता उल्लेख कर उसके विरुद्ध गवाही नहीं देना चाहता था। बेहतर विकल्प की खोज में था। दिमने सभा पर छाए मौन से लाभ उठाते हुए कहाः न्यायमूर्ति यदि मैं निर्दोष होता तो पशुओं के मौन पर प्रसन्न होता किन्तु चूंकि स्वयं को निर्दोष जानता हूं इसलिए इस मामले के अच्छे अंजाम की ओर से संतुष्ट हूं। उस दिन न्यायधीश किसी परिणाम तक नहीं पहुंच सके और दिमने को पुनः जेल भेज दिया गया।

    अगले दिन केलीले का मित्र जिसका नाम रूज़बे था, जेल आया और दुखी मन से उसने दिमने को केलीले की मृत्यु का समाचार दिया। दिमने को विश्वास नहीं हो रहा था। उसे बहुत पछतावा हो रहा था। हतप्रभ स्थिति में उसने कहाः धिक्कार हो मुझ पर कि सबसे अच्छे मित्र को खो दिया। उसे महत्व नहीं दिया। उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। मेरा दुख सहन न कर पाने से मर गया। न मेरे जेल में बंद होने को सहन कर पा रहा था और नहीं वास्तविकता की अनदेखी कर सकता था। अपराध बोध ने उसकी जान ले ली। रूज़बे चला गया और दिमने एक बार फिर तन्हाई की दुनिया में चला गया। कुछ दिन के बाद बड़े न्यायधीश ने पशुओं को इकट्ठा किया। दिमने को भी जेल बाहर लाया गया। न्यायधीश ने फिर उसी प्रश्न को दोहराया। फिर वहीं मौन छाया रहा। न्यायधीश ने दिमने को संबोधित करते हुए कहाः यह बात सच है कि पशुओं में किसी को घटना की सही वास्तविकता का ज्ञान नहीं है किन्तु सभी अपने मन में इस बात मानते हैं कि शन्ज़बे निर्दोष थी और तुम्हारा छल उसके मारे जाने का कारण बना। तुम किस प्रकार ऐसे लोगों के बीच जीवन बिता सकते है जिनका तुम्हारे बारे में ये विचार हैं। बेहतर होगा तुम अपने अपराध को स्वयं मान लो, शायद तुम्हारे दंड में कुछ कमी करवा सकूं। दिमने को केलीले की अंतिम इच्छा याद आयी और एक क्षण को उसने सोचा कि अपने अपराध को स्वीकार कर ले किन्तु फिर विचार आया कि केलीले तो अब मर चुका है और कोई भी घटना की वास्तविकता से अवगत नहीं है। मैं क्यों स्वयं को कठिनाइयों में फसाउं। उसने बड़े न्यायधीश से कहाः मैंने कोई अपराध नहीं किया है। न्यायधीश के पास कोई साक्ष्य नहीं था। उसे निर्दोषमुक्त करने पर विवश था। न्यायधीश ने एक रिपोर्ट लिखी और शेर के पास भेज दिया और उससे अंतिम निर्णय लेने के लिए कहा। जिस समय शेर को पत्र मिला। उसकी मां उसी के पास उपस्थित थी। पत्र पढ़ कर वह क्रोधित हो गयी। इस संदर्भ में कुछ क़दम उठना अपना कर्तव्य समझते हुए उसने शेर से कहाः मेरे बेटे! वह अपराधी है उसकी स्वतंत्रता का आदेश जारी मत करो। शेर ने कहाः मां मेरे पास ऐसा कोई दस्तावेज़ होना चाहिए जिससे उसका दोष सिद्ध हो सके। यदि आपको विश्वास है कि वह अपराधी है तो मुझे बताइये कि यह बात आपसे किसने कही। मेरी सहायता कीजिए ताकि इस बार न्यायपूर्ण व तर्कपूर्ण व्यवहार करूं। शेर की मां ने कुछ सोच कर कहाः यूं बताना मेरे लिए कठिन है मुझे उससे अनुमति लेनी होगी। उसके बाद शेर की मां महल से बाहर आयी और बाघ के घर गयी। उसने दिमने को अपमानित करने और उसे उसके कृत्य का दंड दिलाने का संकल्प ले लिया था। जब बाघ के घर पहुंची तो उससे कहाः वर्षों से तुम शेर की सेवा में हो। आज तुम उसकी मोहब्बत का बदला उतारो। मेरे साथ चलो और जो कुछ उस रात सुना था शेर को बता दो। बाघ ने कहा कि मैं गवाही दूंगा। दोनों महल पहुंचे। बाघ ने जो कुछ सुना था सब शेर को बता दिया। जब बाघ की बात सबने सुन ली तो दिमने की कोठरी के बग़ल वाली कोठरी में जिस पशु ने केलीले और दिमने की बातचीत सुनी थी, पहरेदार को आवाज़ दी और कहा कि शेर से कहो कि मैं भी गवाही दूंगा। शरे ने उसे महल में लाने का आदेश दिया और उसने जो कुछ जेल में सुना था सब शुरु से अंत तक बता दिया। शेर ने उससे पूछाः तुमले पहले क्यों नहीं बताया। उसने कहा कि मुझे इस बात का डर था कि मैं अकेला इस बात को जानता हूं कहीं मेरी गवाही बेकार न चली जाए। जब मुझे पता चला की बाघ ने आपके सामने गवाही दी है तो मुझे लगा कि अब मेरी गवाही देने का समय आ पहुंचा है। शेर अब पूरी घटना से अवगत हो चुका था दिमने पर दाना पानी बंद करने का आदेश दिया। दिमने इतने दिनों तक जेल में बग़ैद खाने पानी के रहा कि भूख और प्यास से मर गया और उसे उसके करतूत की सज़ा मिल गयी।