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    शन्ज़बे

    शन्ज़बे
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    शन्ज़बे नामक गाय अपने कारवां से बिछड़ कर एक हरे भरे कछार पर पहुंच गयी और वहीं रहने लगी। शन्ज़बे को दिमने नामक एक गीदड़ ने जो बहुत ही बुद्धिमान व महत्वकांक्षी था, शेर से शन्ज़बे का परिचय कराया और यह परिचय उन दोनों के बीच गहरी मित्रता का आधार बनी यहां तक कि शेर ने शन्ज़बे को अपने सहायक के रूप में नियुक्त कर लिया और हर काम में उससे परामर्श लेने लगा। दिमने जो शेर के साथ शन्ज़बे के परिचय का कारण बना था, शन्ज़बे से ईर्ष्या करने लगा क्योंकि शन्ज़बे की उपस्थिति में वह शेर का भरोसेमंद सलाहकार नहीं बन सकता था। इस प्रकार दिमने ने एक चली और शेर के मन में शन्ज़बे की ओर से द्वेष भर दिया। शेर को विश्वास हो गया और दिमने ने उसे शन्ज़बे को मारने के लिए उकसाया। उसके बाद दिमने शन्ज़बे के पास गया और उससे कहा कि शेर तुम्हें मारना चाहता है और फिर उसे आवश्यक सावधानियां बरतने के लिए कहा। दिमने को जब विश्वास हो गया कि गाय ने उसकी बात मान ली है कि तो वह उससे विदा होकर अपने मित्र केलीले के पास गया।

    केलीले दिमने को देख कर प्रसन्न हो गया क्योंकि एक दो दिन से उसे दिमने का कोई समाचार नहीं मिला था। केलीले ने दिमने को देखते ही पूछाः कहां हो? तुम्हारी ओर से चिंतित था। दिमने ज़ोर से हंसते हुए कहाः अंततः मैं अपने लक्ष्य तक पहुंच गया। आज बहुत अच्छा दिन है। शायद गाय अब तक मारी जा चुकी हो। केलीले, दिमने की बात सुनकर अप्रसन्न हो गया और पूछाः क्या घटना घटी है? दिमने ने सारे षड्यंत्र से केलीले को अवगत करा दिया। केलीले समझ गया कि निर्दोष शन्ज़बे के प्राण ख़तरे में है। उस समय दिमने को डाट फटकार लगाने का कोई परिणाम नहीं निकलेगा। समय रहते शन्ज़बे को बचाना चाहिए यह सोचकर केलीले शेर के भवन की ओर दौड़ा और उसके पीछे पीछे दिमने भी था।

    अब शन्ज़बे की स्थिति के बारे में सुनिए। दिमने से विदा होने के पश्चात शन्ज़बे शेर से मिलने गयी। भयभीत थी किन्तु उसे जाना ही था ताकि शरे से अचानक इस शत्रुता का कारण पूछ सके। यद्यपि उसे दिमने की बात स्वीकार कर ली थी किन्तु अभी भी उसे विश्वास नहीं हो पा रहा था। दूर से उसने शेर को देखा जो क्रोध की दृष्टि से उसे घूर रहा था। शेर अपने दोनों पैर आगे की ओर करके बैठा हुआ था और बार बार अपनी दुम हिला रहा था। शन्ज़बे ने स्वयं से कहाः दिमने सही कह रहा था, यह तो वही चिन्ह है जिसके बारे में उसने सावधान किया था। वह मुझे मारना चाहता है अब बात करने का समय नहीं बचा है मुझे स्वयं को लड़ने के लिए तय्यार करना चाहिए उसके बाद शन्ज़बे ने अपने दाएं और बाएं देखा और पैरों को ज़मीन पर पटख़ा। शेर को जो पूरे ध्यान से शन्ज़बे के व्यवहार को देख रहा था, दिमने की बात याद आयी। उसने स्वयं से कहाः दिमने सही कह रहा था। वह कोई चाल चलना चाहती है। उसे ऐसा करने का अवसर नहीं दूंगा। उसके बाद अगले ही क्षण वह शन्ज़बे की ओर दौड़ा और बिना कुछ कहे उसकी गर्दन पकड़ ली और ज़मीन पर गिरा दिया। शन्ज़बे हाथ पैर पटख़ रही थी कि किसी प्रकार स्वयं को शेर के चंगुल से बचा ले किन्तु निरर्थक था। धीरे धीरे शन्ज़बे के हाथ पाव ठंडे पड़ गए और वह फिर वह संघर्ष नहीं कर सकी। जब तक केलीले और दिमने भवन पहुंचते शन्ज़बे का काम ख़त्म हो चुका है। शन्ज़बे ज़मीन पर निर्जीव पड़ी हुयी थी और शेर उसके सिरहाने बैठा उसे देख रहा था। मानो अब उसे अपनी ग़लती का आभास हो रहा हो। पछतावा उसकी आंखो से प्रकट था। केलीले ने दिमने को संबोधित करते हुए बहुत ही दुख भरे स्वर में कहाः अपने षड्यंत्र का परिणाम देखो। वह निर्दोष गाय तुम्हारे अहं के कारण मारी गयी। दिमने अत्यंत कठोर स्वर में कहाः वह मेरी शत्रु थी। वह मेरी इच्छाओं के पूरा होने के मार्ग में रुकावट बन गयी थी। प्रसन्न हो जाओ कि आज मेरी सफलता का दिन है। केलीले चुप हो गया। दिमने ने कनखियों से शेर को देखा। शेर शांत दिखाई दे रहा था। अब पश्चाताप ने क्रोध का स्थान ले लिया था। दिमने भयभीत था कि कहीं शेर पश्चाताप की स्थिति में कुछ कर न बैठे। दिमने शेर की ओर बढ़ा और कहाः ईश्वर का सौ बार आभार व्यक्त करता हूं कि श्रीमान शेर का शत्रु अपने अंजाम को पहुंच गया इसलिए मैं प्रसन्न हूं किन्तु आप कुछ अप्रसन्न दिख रहे हैं। शेर ने कपकपाती आवाज़ में कहाः बहुत पछता रहा हूं। मुझे शन्ज़बे की याद आ रही है। काश उसे मारने से पहले उससे बात तो कर लेता। शायद मेरा दृष्टिकोण बदल जाता और उसे न मारता। दिमने ने चापलूसी भरे स्वर में कहाः उसके कारण स्वयं को अप्रसन्न मत करे। वह पापी थी उसे मारा ही जाना चाहिए था। यदि आप यह न करते तो वह अपने षड्यंत्र को व्यवहारिक बना लेती तो, मेरे मुंह में ख़ाक, आप मारे जाते। दिमने में इससे आगे कुछ कहने का साहस नहीं था। शेर को उसकी बातों को कुछ संतोष मिला और उठ कर वहां से चला गया। वह रात बहुत शांत रात थी। शेर का उस्ताद तेंदुआ, भवन से निकल कर अपने घर की ओर जा रहा था कि केलीले और दिमने के घर के निकट पहुंच गया। उन दोनों की परछाई को खिड़की से देखा। जब उनके घर के बग़ल से गुज़र रहा था कि बातचीत की आवाज़ सुनी। बातचीत की आवाज़ यह थी कि बेचारा शन्ज़बे निर्दोष मारी गयी तुम्हें फटकार लगनी चाहिए। तेन्दुआ बोलने वाले की आवाज़ को पहचान गया कि यह आवाज़ केलीले की थी। तेंदुए की जिज्ञासा बढ़ गयी और एक क्षण के लिए वहीं रुक गया। तेंदुआ जानता था कि यह काम ग़लत है किन्तु स्वयं को नहीं रोक सका। वे गाय की बेगुनाही के बारे में बात कर रहे थे। केलीले की आवाज़ फिर सुनाई दी जो कह रहा थाः अभी तक मेरा मन यह कह रहा है कि तुमने बहुत ग़लत किया। तुमने झूठी बुराई करके शेर और शन्ज़बे के बीच मित्रता को शत्रुता के बदल दिया और निर्दोष गाय मारी गयी। शेर अपने कर्म से पछता रहा है किन्तु अब पछतावे का कोई लाभ नहीं है। तुम्हारी शामत आ जाएगी अगर शेर को तुम्हारे षड्यंत्र की भनक भी लग गयी। तेदुआ समझ गया कि दिमने ने शन्ज़बे की हत्या का षड्यंत्र रचा था। जैसे ही एक क्षण के लिए खिड़की ओर साया बढ़ा तेंदुआ तुरंत पीछे हट गया ताकि कोई उसकी उपस्थिति को न भाप सके। अब वह दिमने की बात सुनने लगा जो कह रहा थाः मुझे दिमने कहते है। मैं शेर को अपने षड्यंत्र की भनक भी नहीं लगने दूंगा। तुम कितने सीधे हो। संतुष्ट रहो अगले कुछ दिनों में शेर का पछतावा समाप्त हो जाएगा। उस समय मैं ऐसा काम करुंगा कि शन्ज़बे का स्थान मुझे मिल जाएगा। अब तुम देखना मैं शेर का निकटवर्ती सलाहकार बन जाउंगा।

    तेंदुए के लिए यह बात दिन की भांति स्पष्ट हो गयी थी कि बेचारी शन्ज़बे निर्दोष थी और वह शेर को मारने की इच्छा नहीं रखती थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। किसे वास्तविकता से अवगत कराए। उसे अचानक शेर की माँ का मन में ख़्याल आया। वह ताज़ा ताज़ा यात्रा से लौटी थी और शन्ज़बे की मृत्यु से दुखी थी। तेंदुए ने शेर की माँ के पास जाकर इस रहस्य से उसे अवगत कराने का निर्णय किया।

    अगले दिन प्रातः तेंदुआ शेर की मां के पास गया और जो कुछ उसने पिछली रात सुना था उसे सब बता दिया। शेर की मां इस बात को सुनकर दुखी व क्रोधित हो गयी। वह दिमने की मक्कारी पर क्रोधित और शन्ज़बे की बेगुनाही पर दुखी थी। जैसे ही उसने चाहा कि शेर के पास जाए तेंदुए ने उससे अनुरोध किया वह शेर को किसी का नाम न बताए। शेर की मां ने वचन दिया और शेर की ओर चल पड़ी। जब अपने बेटे शेर के पास पहुंची तो उसे एक कोने में दुखी बैठा पाया। उससे कहाः मेरे बेटे क्यों इतना दुखी हो?

    क्यों दुखी न हूं। मैंने शन्ज़बे को कुछ बोलने का भी अवसर नहीं दिया। शायद वह भवन में इसलिए आयी थी कि अपनी बेगुनाही को सिद्ध कर सके। यही बात मुझे मारे डाल रही है। नहीं जानता कि क्या वह वास्तव में दोषी थी या नहीं। मैं दिमने की बातों में आ गया और बिना सोचे उसे मार डाला। धिक्कार हो मुझ पर।

    शेर की माँ आगे बढ़ी और अपना हाथ उसने शेर के सिर पर रखते हुए कहाः यदि तुम्हारा मन शन्ज़बे को मार कार बोझिल न होता तो वह दोषी थी किन्तु अब जबकि तुम्हारा मन इतना बोझिल है तो इसका कारण यह है कि शन्ज़बे निर्दोष थी। शेर ने मां को देखा। उसका मन कर रहा था कि वह बचपन की भांति अपना सर मां के ज़ानू पर रख दे और वह उसके सिर पर हाथ फेरे। वह स्वयं को संसार का सबसे अकेला व दुर्भाग्यशाली शेर समझ रहा था। उसका रोने का मन कर रहा था किन्तु वह अपनी मां के सामने नहीं रो सकता था। उसके बाद शेर ने कहाः अभी तक मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि शन्ज़बे दोषी थीं जैसे जैसे दिन बीत रहा है मेरा संदेह बढ़ता जा रहा है। जब उसके बारे में सोचता हूं तो उसकी बातें व व्यवहार याद आते हैं कि वह कितनी बेगुनाह थी तो उस समय मुझे अपने आप से घृणा होने लगती है। मन नहीं करता कि कोई मुझे देखे। शेर की मां ने जो अपने बच्चे की प्रवृत्ति को भलिभांति पहचानती थी और वह यह समझ रही थी कि शेर वास्तव में पछता रहा है, कहाः मैं यहां आयी हूं ताकि इस घटना के संबंध में कुछ तुमसे बात करूं।