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    शावाना की पश्चाताप

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    पुस्तक का नामः पश्चाताप दया की आलंग्न

    लेखकः आयतुल्ला हुसैन अंसारियान

     

    स्वर्गीय मुल्ला अहमद नराक़ी अपनी मैराजुस्सआदत नामी अख़लाक़ी महान पुस्तक मे वास्तविक पश्चाताप के संदर्भ मे एक विचित्र घटना का वर्णन करते हुए कहते हैः

    शावाना एक जवान डांसर महिला थी, जिसकी आवाज अत्यधिक सुरीली थी, किन्तु वह वैध एंव अवैध पर ध्यान केंद्रित नही करती थी, बसरा के धनि लोगो के यहा भ्रष्टाचार एंव अनैतिकता की कोई महफ़िल ऐसी नही थी जिसमे शावाना ना बुलाई जाती हो, शावाना इन महफ़िलो मे नाच गाना किया करती थी, और उसके साथ कुच्छ किशोरिया और महिलाएं भी होती थी।

    एक दिन वह अपनी सहेलीयो के साथ इसी प्रकार की महफ़िलो मे जाने के लिए एक गलि से जा रही थी अचानक एक घर से रोने की आवाज़ सुनि, उसने आश्चर्य के साथ प्रश्न कियाः यह किस प्रकार का शोर है? और अपनी एक सहेली को परस्थितियो का पता करने के लिए भेजा, परन्तु बहुत देर प्रतिक्षा करने के पश्चात भी वह नही पलटी, उसने दूसरी सहेली को भेजा, वह भी वापस नही आई, तीसरी सहेली को भेजा और शीघ्र लौटने का एलटीमेटम दिया, वह जाने के थोडे समय पश्चात लौटकर आई तो उसने बताया कि ये रोने की आवाज़े अचरित्र एंव पापी लोगो की है।

    शावाना ने कहाः मै स्वयं जाकर देखती हूँ क्या हो रहा है?

    जैसी ही वह वहा पहुंची और देखा कि एक वक्ता लोगो को सम्बोधित कर रहा है, तथा क़ुरआन के इस पवित्र छंद को पढ़ रहा हैः

     

    إِذَا رَأَتْهُم مِن مَكَان بَعِيد سَمِعُوا لَهَا تَغَيُّظاً وَزَفِيراً * وَإِذَا أُلْقُوا مِنْهَا مَكَاناً ضَيِّقاً مُقَرَّنِينَ دَعَوْا هُنَالِكَ ثُبُوراً

     

    “ऐज़ा राअतहुम मिन मकानिन बईदिन समेऊ लहा तग़य्योज़न व ज़फ़ीरा * व ऐज़ा उलक़ू मिनहा मकानन ज़य्येक़न मोक़र्रानीना दऔ होनालेका सोबूरा”[1]

    जब नर्क की आग उन लोगो को दूर से देखेगी तो ये लोग उसके दहकते हुए शोलो की आवाज़े सुनेंगे। और जब उन्हे जंज़ीरो मे जकड कर किसी तंग स्थान मे डाल दिया जाएगा तो वहा पर मृत्यु की गुहार लगाएंगे।

    जैसे ही शावाना ने इस छंद को सुना और उसके अर्थ पर ध्यान दिया, वह भी चिल्लाई और कहने लगीः हे वक्ता मै भी पापी हूँ, मेरा कर्मपात्र काला है, मै भी शर्मिंदा एंव पशेमान हूँ, यदि मै पश्चाताप कर लूँ तो क्या मेरी पश्चाताप भगवान के दरबार मे स्वीकार हो सकती है?

    वक्ता ने उत्तर दियाः हा, तेरे पाप भी क्षमा योग्य है, चाहे शावाना के पापो के समान ही क्यो ना हो?

    उसने उत्तर दियाः वाय हो मुझ पर, अरे मै ही तो शावाना हूँ, मै पापो मे कितनी लिप्त हूँ कि लोगो ने मुझे पापी का उदाहरण बना दिया है!!

    ऐ वक्ताः मै पश्चाताप करती हूँ और इसके बाद कोई पाप नही करुँगी, और स्वयं को पापो से बचाऊँगी और पापीयो की महफ़ीलो मे नही जाऊँगी।

    वक्ता ने उत्तर दियाः ईश्वर तेरे प्रति भी  अर्हमुर्राहेमीन (दयालु, कृपालु) है।

    शावाना ने वास्तव मे पश्चाताप कर ली, इबादत और आज्ञाकारिता मे लिप्त हो गई, पापो से बने हुए मांस को पिघला दिया, हृदय से आहो बुका करती थी, हाय यह मेरी दुनिया है, तो आख़ेरत का क्या आलम होगा? परन्तु उसने अपने हृदय मे एक आवाज़ का एहसास कियाः ईश्वर की अर्चना मे लिप्त रह, तब देखना प्रलय मे क्या होता है?


    [1] सुरअ फ़ुरक़ान 25, छंद 12-13