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    शिया समुदाय की उत्पत्ति व इतिहास (2)

    शिया समुदाय की उत्पत्ति व इतिहास (2)
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    रसूले अकरम (स.) के देहांत के बाद जब आपकी ख़िलाफ़त और उत्तराधिकार का मुद्दा सामने आया तो जो महोदय रसूले इस्लाम (स.) के युग में आपके प्रति सबसे अधिक निष्ठावान थे और आपके शिया समझे जाते थे उन्होंने इमामत के बारे में मौजूद नुसूस और हज़रत अली (अ.) के व्यक्तित्व की महानता के आधार पर आपकी बिला फ़स्ल ख़िलाफ़त और इमामत का समर्थन किया और यह लोग दूसरों के शासन व ख़िलाफ़त को अवैध समझते थे, …….

     

     

    शिया समुदाय की उत्पत्ति व इतिहास (2)अंतिम तथ्य इतिहास की स्वीकृत और निश्चित वास्तविकताओं में से है अतः उसके लिए किसी इतिहासिक प्रमाणपत्र और किताब के हवाले की आवश्यकता नहीं है। चौथे तथ्य के प्रमाण इससे पहले वर्णन किए जा चुके हैं, आरम्भिक तीनों तथ्यों के कुछ प्रमाण का उल्लेख पहले भी हो चुका है परन्तु अधिक स्पष्टीकरण के लिए कुछ और प्रमाण प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

     

    1. पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली (अ.) की इमामत

     

    हज़रत अली (अ.) की इमामत के तर्क क़ुरआन व सुन्नत आदि में बहुत अधिक हैं, इस स्थान पर उन्हें विस्तार के साथ प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है, आगामी पृष्ठों में उचित स्थान पर हम इस संदर्भ में चर्चा करेंगे। इस स्थान पर हम विभिन्न तर्कों के बीच से केवल एक प्रमाण हदीस यौमुद्दार के स्पष्टीकरण पर ही संतोष कर रहे हैं जो पहला प्रमाण भी है।

     

    हदीसों के विशेषज्ञों, इतिहासकारों और भाष्यकारों के अनुसार जब रसूले इस्लाम पर आयत

     

    و انذر عشيرتك الاقربين

     

    अवतरित हुई तो आपने अपने सम्बंधियों को जनाबे अबू तालिब (अ.) के घर में जमा किया जिनकी संख्या प्रायः चालीस थी, जब वह लोग खाना खा चुके तो पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने उन लोगों तक अपना संदेश पहुंचाया और फ़रमाया:

     

    ऐ अब्दुल मुत्तलिब की संतानों! ईश्वर की सौगंध अरब वासियों के मध्य मैं ऐसे किसी जवान को नहीं पहचानता हूँ जो अपनी क़ौम के लिए इससे उत्तम चीज़ लाया हो जो कुछ मैं तुम्हारे लिए लाया हूँ। मैं तुम्हारे लिए ऐसी चीज़ लाया हूँ जिसमें तुम्हारे संसार व परलोक दोनों की भलाई है, ईश्वर ने मुझे यह आदेश दिया है कि तुम्हें एकेश्वरवाद का निमंत्रण दूँ, तुम लोगों में से जो व्यक्ति भी इस बारे में मेरी सहायता करेगा वह मेरा भाई, स्थानापन्न और उत्तराधिकारी होगा।

     

    पैग़म्बरे इस्लाम की वार्ता समाप्त हो गई, सब लोग ख़ामोश रहे, अचानक हज़रत अली (अ.) उठे और फ़रमाया: ऐ अल्लाह के रसूल इस बारे में आपकी सहायता मैं करूँगा। पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली (अ.) के काँधे पर हाथ रख कर फ़रमायाः यह तुम्हारे मध्य मेरा भाई, स्थानापन्न और उत्तराधिकारी है, इसकी बात सुनो और इसका अनुसरण करो। यह सुन कर वह लोग खड़े हो गए और मज़ाक़ उड़ाते हुए जनाबे अबू तालिब (अ.) से कहने लगे: यह तुमको आदेश दे रहे हैं कि अपने बेटे का अनुसरण करो।

     

    कुछ लोगों ने इस हदीस के प्रमाणीकरण पर आपत्ति जताते हुए कहा है किः उल्लिखित रिवायत अब्दुल ग़फ़्फ़ार बिन क़स्साम (अबू मरयम) के द्वारा वर्णन हुई है और अहले सुन्नत के विद्धानों की दृष्टि में यह व्यक्ति विश्वसनीय नहीं हैं बल्कि उसकी हदीसों को अस्वीकृत समझा जाता है।

     

    यह एक निराधार आपत्ति है क्यूँकि यह हदीस विभिन्न स्रोंतों से वर्णन हुई है और केवल अब्दुल ग़फ़्फ़ार बिन क़स्साम (अबू मरयम) द्वारा ही बयान नहीं हुई है जैसा कि शेख़ सलीम बशरी मिस्री ने उल्लिखित आपत्ति और इस बारे में इमाम शरफ़ुद्दीन का उत्तर वर्णन करने के बाद कहा है कि यह हदीस विभिन्न स्रोंतों से वर्णन हुई है। वह कहते हैं कि इस हदीस के सिलसिले में मैंने और मैंने मुसनद अहमद भाग 1 पृष्ठ 111 को देखा और उसके उल्लेखकर्ताओं के बारे में अनुसंधान किया तो ज्ञात हुआ कि वह सभी विश्वसनीय हैं फिर इस हदीस के दूसरे स्रोतों के बारे में अनुसंधान किया तो यही परिणाम निकला कि यह हदीस विभिन्न स्रोतों से बयान हुई है जिनमें हर एक दूसरे की पुष्टि करता है और अनंततः मैंने इस हदीस के सही होने पर विश्वास कर लिया।

     

    हदीसे यौमुद्दार पर दूसरी आपत्ति यह की गई है कि इस हदीस को बुख़ारी, मुस्लिम और अहले सुन्नत की सही किताबों (सेहाहे सित्ता) के दूसरे लेख़कों ने भी वर्णन नहीं किया है।

     

    इसका उत्तर यह है कि अगर कोई हदीस विभिन्न विश्वासपात्र स्रोतों से वर्णन हुई हो और उसे सेहाह के लेखकों ने वर्णन न किया हो तो उसे हदीस के अमान्य होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता है बल्कि इससे तो वास्तविकता के जिज्ञासु पाठकों के मनों में यह प्रश्न उठता है कि सेहाह के लेखकों ने इतनी विश्वासपात्र हदीस को क्यों वर्णन नहीं किया। अतः इमाम शरफ़ुद्दीन ने कहा है कि सेहाह के लेखकों ने केवल इस आधार पर इस हदीस से विमुखता का प्रदर्शन किया है कि यह हदीस ख़िलाफ़त व इमामत से सम्बंधित उनके विश्वास व मत के अनुसार नहीं थी अतः उन्होंने इसको वर्णन नहीं किया ताकि कहीं उसके द्वारा शियों के हाथों में उनके असत्य होने का प्रमाण न पहुँच जाए परन्तु जिन महोदयों ने इस सिलसिले में पक्षपात से काम नहीं लिया है उन लोगों ने उसे अपनी किताबों में लिखा है।

     

    जी हाँ अत्याधिक धार्मिक पक्षपात हज़रत अली (अ.) की इमामत व ख़िलाफ़त से सम्बंधित वास्तविकता को छुपाने का एक मौलिक कारण है, यह पक्षपात केवल इमामत से सम्बंधित अहादीस को वर्णन न करने में ही दिखाई नहीं देता बल्कि यह पक्षपात रिवायतों को वर्णन करने की शैली में भी उत्तम रूप से झलकता है। जैसा कि कुछ महोदयों ने वर्णित हदीस में केवल अख़ी शब्द अर्थात मेरा भाई वर्णन किया है और जानशीनी व ख़लीफ़ती अर्थात मेरा उत्तराधिकारी, जेसे शब्दों के उल्लेख से बचे हैं।

     

    इब्ने कसीर ने इस हदीस को जहाँ तफ़सीरे तबरी से लिया है वहाँ यह कहा है: पैग़म्बरे इस्लाम ने अबू तालिब (अ.) के घर में मौजूद लोगों से सम्बोधित होकर कहाः

     

    فأيّكم يوازرني على هذا الامر على أن يكون اخي و كذا و كذا

     

    जबकि तारीख़े तबरी में यूँ लिखा हैः

     

    فأيّكم يوازرني على هذا الامر على ان يكون اخي و وصييّ و خليفتي

     

    मुहम्मद हुसैन हैकल ने भी अपनी किताब हयाते मुहम्मद के पहले एडीशन में यह हदीस संपूर्ण रूप से लिखी है परन्तु बाद के एडीशनों में (व जानशीनी व ख़लीफ़ती मिन बअदी अर्थात मेरे बाद मेरा स्थानापन्न और उत्तराधिकारी होगा।) को मिटा दिया गया।

     

    हमारी उल्लिखित चर्चा का परिणाम यह है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने आरम्भ में ही एकेश्वरवाद और इस्लाम धर्म की ओर लोगों को निमंत्रण के साथ हज़रत अली (अ.) की ख़िलाफ़त व इमामत का उल्लेख भी कर दिया था, इस आधार पर शिया समुदाय की उत्पत्ति इस्लाम के आरम्भ के साथ जुड़ी हुई है। अमीरुल मोमिनीन (अ.) की इमामत के नुसूस (प्रमाण) बहुत अधिक हैं जिनका स्पष्टीकरण हम इमामत के अध्याय प्रस्तुत करेंगे।

     

    पैग़म्बरे इस्लाम और अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली से प्यार

     

    हमने शिया के पारिभाषिक अर्थ की व्याख्या के संदर्भ में बयान किया था कि शिया के एक अर्थ पैग़म्बरे इस्लाम के परिवार और विशेष रूप से हज़रत अली से मित्रता और उनसे प्यार करना भी हैं।

     

    अहलेबैत (अ.) के प्यार और उनकी मित्रता पर बल देने वाली आयतों व रिवायतों के अतिरिक्त पैग़म्बरे इस्लाम से अत्याधिक ऐसी हदीसें प्रसारित हुई हैं जिनमें हज़रत अली (अ.) के प्यार को अनिवार्य बताया गया है यहाँ तक कि आपके प्यार को ईमान का आधार और आपकी शत्रुता को कपटाचार का लक्षण बताया गया है।

     

    सिव्ती ने इस आयत (و لتعرفنّهم فى لحن القولतुम कपटाचारियों को उनकी वार्ता की शैली से पहचान लेते हो ) की व्याख्या के संदर्भ में इब्ने मुर्दवैह और इब्ने असाकिर के हवाले से अबू सईद ख़दरी से यह रिवायत की है कि उन्होंने कहा कि लहनुल क़ौल (لحن القول) से मुराद हज़रत अली (अ.) की शत्रुता है।

     

    दूसरी रिवायत में जिसे इब्ने मुर्दवैह ने अब्दुल्लाह बिन मसऊद से नक़्ल किया है यूँ वर्णन हुआ है

     

    ما كنّا نعرف المنافقين على عهد رسول اللّه صلى الله عليه و آله الا ببغضهم علي بن ابيطالب عليه السلام

     

    रसूले अकरम (स.) के युग में हम (मुनाफ़िक़ों) कपटाचारियों को केवल उनकी अली (अ.) से शत्रुता के आधार पर ही पहचानते थे।

     

    नेसाई ने अपनी किताब ख़साएसे अमीरुल मोमिनीन में (الفرق بين المؤمن و المنافق) मोमिन अर्थात आस्तिक और मुनाफ़िक़ अर्थात कपटाचारी के शीर्षक के अंतर्गत एक अलग अध्याय में रसूले इस्लाम से तीन हदीसें प्रस्तुत की हैं कि हज़रत ने फ़रमाया है: अमीरुल मोमिनीन से मोमिन अर्थात आस्तिक के अतिरिक्त कोई प्यार नहीं करेगा और मुनाफ़िक़ अर्थात कपटाचारी के अतिरिक्त आपका कोई शत्रु नहीं होगा।

     

    ख़तीबे ख़्वारज़मी ने भी अपनी किताब अल-मनाक़िब के छटे अध्याय को हज़रत अली (अ.) और अहलेबैत (अ.) से प्यार के बारे में मौजूद रिवायतों से विशिष्ठ किया है और इस बारे में प्रायः तीस रिवायतें वर्णन की हैं।

     

    उनमें से कुछ रिवायतें इस प्रकार हैं।

     

    1. अली इब्ने अबी तालिब (अ.) से प्यार समस्त लोगों पर अनिवार्य है।

     

    انّي افترضت محبّة علىّ بن ابى طالب على خلقي عامّة

     

    2. अगर समस्त मनुष्य अली इब्ने अबी तालिब (अ.) के प्यार पर सहमत हो जाते तो ईश्वर नरक का निर्माण न करता।

     

    لو اجتمع الناس علي حبّ على بن ابيطالب لما خلق اللّه النّار

     

    3. अगर कोई व्यक्ति इतने दिनों तक उपासना करे जितने दिन जनाबे नूह अपनी क़ौम के बीच रहे थे और ओहद के पहाड़ के बराबर ईश्वरीय कार्यों में सोना दान दे, हज़ार बार पैदल हज करने जाए और सफ़ा व मरवः के मध्य इबादत की अवस्था में क़त्ल भी कर दिया जाए परन्तु वह हज़रत अली (अ.) से प्यार न करता हो तो उसके घ्राणेंद्रिय में स्वर्ग की सुगन्ध भी नहीं पहुँच सकती है और वह कदापि स्वर्ग में नहीं जाएगा।

     

    4. जो व्यक्ति अली (अ.) से प्यार करे उसने पैग़म्बरे इस्लाम से प्यार किया है और जो व्यक्ति उनसे शत्रुता रखे वह पैग़म्बरे इस्लाम का शत्रु है।

     

    من احبّ عليّا فقد احبّنى و من ابغض عليا فقد أبغضنى

     

    5. मलकुल मौत अर्थात यमराज जिस प्रकार ईश्वरीय दूतों पर दया करता है इसी प्रकार हज़रत अली (अ.) के चाहने वालों के साथ भी मृदुस्वभाव से व्यवहार करता है।

     

    ان ملك الموت يترحّم على محبّي على بن ابيطالب كما يترحّم على الانبياء

     

    6. जो व्यक्ति यह ख़्याल करे कि वह पैग़म्बरे इस्लाम और जो कुछ आप ईश्वर की ओर से ले کदृष्टिकोण हैं इन सब पर ईमान रखता हैपरन्तु हज़रत अली इब्ने अबी तालिब(अ.) का शत्रु है तो वह झूठा है और मोमिन अर्थात आस्तिक नहीं है।

     

    من زعم انه امن بي و بما جئت به و هو يبغض عليا عليه السلام فهو كاذب ليس بمؤمن

     

    शबलंजी शाफ़ेई ने निम्नलिखित दो हदीसों को सही मुस्लिम और तिरमिज़ी के हवाले से लिखा है।

     

    1. मुस्लिम ने रिवायत की है कि हज़रत अली (अ.) ने फ़रमाया हैः

     

    والذى فلق الحبّة و برأ النسمة انّه لعهد النبي الاميّ بأنّه لا يحبّني الاّ مؤمن و لا يبغضني الاّ منافق

     

    2. तिरमिज़ी ने अबू सईद ख़दरी से यह रिवायत नक़्ल की है उन्होंने कहा हैः

     

    كنّا نعرف المنافقين ببغضهم عليّاً

     

    हम मुनाफ़िक़ों को अली (अ.) की शत्रुता के आधार पर पहचानते थे।

     

    हज़रत अली (अ.) के प्यार के अनिवार्य होने के बारे में रसूले इस्लाम (स.) से प्रसारित हदीसें बहुत अधिक हैं जिनको इस स्थान पर प्रस्तुत करना सम्भव नहीं है। अतः हम इन्हीं दो हदीसों पर संतोष कर रहे हैं।

     

    उल्लिखित रिवायतों के आधार पर सच्चे मुसलमान हज़रत अली (अ.) के प्यार को अपने ऊपर अनिवार्य समझते थे परन्तु जो लोग संसार के दास और काम-वासना के पुजारी थे यद्धपि वह दिखावे में अपने को मुसलमान कहते थे और मुसलमानों के मध्य रहते थे मगर उनके दिल में हज़रत अली (अ.) के प्रति घृणा मौजूद थी जिसे वह कभी कभी प्रकट भी करते रहते थे इसी लिए हज़रत अली (अ.) से प्यार और शत्रुता ईमान और कपटाचार की पहचान बन गई।

     

    रसूले इस्लाम (स.) के सखागणों के मध्य कुछ लोग दूसरों के मुक़ाबिले में हज़रत अली (अ.) से अधिक प्यार अभिव्यक्ति करते थे क्यूँकि आपके बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने सबसे अधिक आग्रह किया था और आप ही हर प्रकार से उन सबसे अधिक योग्यता के स्वामी थे और क्यूँकि आपके व्यवहार व चरित्र पर रसूले इस्लाम (स.) के समर्थित हस्ताक्षर थे, इसलिए उन्होंने आपको अपना आदर्श बना रखा था इसीलिए उन्हें अली (अ.) का शिया कहा जाता है।

     

    पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली (अ.) की श्रेष्ठता

     

    पिछली हदीसों से अमीरुल मोमिनीन (अ.) की श्रेष्ठता उत्तम रूप से स्पष्ट हो जाती है क्यूँकि हज़रत अली (अ.) ही पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की दृष्टि में सबसे अधिक प्रिय थे। रसूले अकरम (स.) के प्यार या घृणा का कारण काम-इच्छा या सामयिक भावनाएं नहीं हो सकती हैं बल्कि उसका मौलिक आधार आपके ज्ञान व कूटनीति पर आधारित है इसलिए आपके निकट हज़रत अली (अ.) की सबसे अधिक लोकप्रियता का भी केवल यही कारण है, उसके अतिरिक्त बहुत अधिक ऐसी हदीसें भी मौजूद हैं जो आपकी श्रेष्ठता को सिद्ध करती हैं जैसा कि खुद आयते मुबाहेला से भी यही सिद्ध होता है क्यूँकि उसमें मौलाए काएनात अर्थात ब्रह्माण्ड के स्वामी हज़रत अली (अ.) को पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की आत्मा बताया गया है। चूँकि पैग़म्बरे इस्लाम (स.) समस्त मनुष्यों के मध्य सबसे सर्वोत्तम व सर्वश्रेष्ठ हैं अतः जो आपकी आत्मा होगा उसके अंदर भी यह विशेषता अवश्य पाई जाएगी।

     

    उम्मुल मोमिनीन आएशा से प्रश्न किया गया: रसूले इस्लाम (स.) के अस्हाब में सबसे सर्वोत्तम व सर्वश्रेष्ठ कौन है? उन्होंने कहाः अबू बक्र, उमर, उस्मान، तलहा व ज़ुबैर तो उनसे प्रश्न किया गया तो फिर अली (अ.) का क्या स्थान है? उन्होंने ने उत्तर दिया तुमने मुझसे पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के अस्हाब के बारे में प्रश्न किया था न कि उसके बारे में कि जो नफ़्से पैग़म्बर अर्थात पैग़म्बर की आत्मा के समान है फिर उन्होंने आयते मुबाहेला पढ़ी और अंत में कहा: पैग़म्बर (स.) के अस्हाब उसके समान कैसे हो सकते हैं कि जो मानो नफ़्से पैग़म्बर अर्थात पैग़म्बर की आत्मा है।

     

    अहमद बिन हम्बल के बेटे अब्दुल्लाह ने उनसे पूछाः खुलफ़ा की श्रेष्ठता के बारे में आपका क्या ख़्याल है? तो उन्होंने ने कहा: अबू बक्र, उमर, उस्मान, क्रमानुसार एक दूसरे से उच्चतर हैं तो अब्दुल्लाह ने कहा कि फिर अली इब्ने अबी तालिब (अ.) कहाँ हैं?

     

    इमाम हम्बल ने उत्तर दिया: ऐ मेरे बेटे, अली इब्ने अबी तालिब (अ.) उस परिवार से सम्बंध रखते हैं जिससे किसी की तुलना नहीं की जा सकती।

     

    पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने जनाब फ़ातिमा ज़हरा (अ.) से फ़रमाया:तुम्हारा पति मेरी उम्मत में सबसे उत्तम है दूसरों से पहले इस्लाम लाया और उसके ज्ञान व सहनशीलता को दूसरों पर श्रेष्ठता प्राप्त है।

     

    انّ زوجك خير امّتي اقدمهم اسلاما و اكثرهم علما و افضلهم حلما

     

    जब रसूले इस्लाम (स.) की सेवा में एक भुना हुआ मुर्ग़ उपहार के रूप में प्रस्तुत किया गया तो आपने ईश्वर से यह प्रार्थना की कि अपने सबसे प्रिय बंदे को मेरे पास भेज दे ताकि वह इसे मेरे साथ खा सके। उसी समय हज़रत अली (अ.) आपकी सेवा में पहुँचे।

     

    जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी से रिवायत है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने हज़रत अली (अ.) के बारे में आपसे यह कहाः

     

    انّه اوّلكم ايمانا معي، و اوفاكم بعهد اللّه تعالى و اقومكم بامراللّه و اعدلكم في الرعية و اقسمكم بالسويّة و اعظمكم عنداللّه مزية

     

    अली (अ.) तुम लोगों में सबसे पहले मुझ पर ईमान लाने वाले, सबसे अधिक ईश्वरीय वचन के प्रति प्रतिज्ञापूर्ति करने वाले, ईश्वरीय कार्यों के कार्यान्वयन में सबसे अधिक सुदृढ़, जनता के मध्य न्याय एंव निष्पक्षता से काम लेने वाले और इस्लामी कोषागार में बराबर से विभाजन करने वाले हैं और उनका स्थान व मरतबा ईश्वर के निकट तुम सबसे उच्च व सर्वश्रेष्ठ है।

     

    जाबिर उसकेबाद कहते हैं कि यह आयतः

     

    انّ الذين آمنوا و عملوا الصالحات اولئك هم خير البريّة

     

    हज़रत अली (अ.) के बारे में अवतरित हुई है, इसी प्रकार वह कहते हैं: जब कभी भी हज़रत अली (अ.) आते थे तो लोग कहते थे ख़ैरुल बरीयः आ गए।

     

    इस बारे में बहुत रिवायतें मौजूद हैं जिनको इस स्थान पर नक़्ल करने की गुंजाईश नहीं है, उल्लिखित बातों के दृष्टिगत यह कहा जा सकता है कि शिया समुदाय की नींव इस्लाम के सूर्योदय व आविर्भाव के साथ ही पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के शुभ हाथों से रखी गई थी अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम ने तौहीद अर्थात एकेश्वरवाद व नुबूव्वत अर्थात ईशदौत्य की घोषणा के साथ इमामत को भी प्रस्तुत कर दिया था और दूसरी ओर अपने व्यवहार से हज़रत अली (अ.) के व्यक्तित्व की महानता को सबकी निगाहों में इस प्रकार स्पष्ट कर दिया था कि उस युग के कुछ मुसलमान आपकी प्रमुखता व श्रेष्ठता के अनुरागी हो गए थे। ऐसे लोग मुसलमानों के मध्य हज़रत अली (अ.) के शियों के रूप में पहचाने जाते थे।

     

    इस रूचि में इसलिए भी वृद्धि हो रही थी कि रसूले इस्लाम (स.) खुलेआम हज़रत अली (अ.) के शियों की सराहना करते थे और उन्हें परलोक में सफल होने वालों में बताते थे।

     

    रसूले अकरम (स.) के देहांत के बाद जब आपकी ख़िलाफ़त और उत्तराधिकार का मुद्दा सामने आया तो जो महोदय रसूले इस्लाम (स.) के युग में आपके प्रति सबसे अधिक निष्ठावान थे और आपके शिया समझे जाते थे उन्होंने इमामत के बारे में मौजूद नुसूस और हज़रत अली (अ.) के व्यक्तित्व की महानता के आधार पर आपकी बिला फ़स्ल ख़िलाफ़त और इमामत का समर्थन किया और यह लोग दूसरों के शासन व ख़िलाफ़त को अवैध समझते थे, यद्धपि उन्होंने अपने स्वामी के आज्ञापालन और इस्लाम व मुसलमानों के हितों के अंतर्गत संतोष व सहनशीलता से काम लिया और सहिष्णुता का रास्ता अपनाया और तार्किक शैली से विवेचन के अतिरिक्त और कोई काम अंजाम नहीं दिया बल्कि जहाँ तक मुसलमानों और इस्लाम के हितों की बात थी वह खुलफ़ा का सहयोग भी करते थे।