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    शीराज़-2

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    शीराज़ नगर प्राचीन काल से ज्ञान का केन्द्र रहा है। इस लेख में हम ज्ञान व साहित्य के क्षेत्र की कुछ महान हस्तियों का परिचय दे रहे हैं। सादिया के नाम से प्रसिद्ध सादी का मक़बरा शीराज़ नगर के पूर्वोत्तर में चार किलोमीटर की दूरी पर पर्वातांचल में स्थित है। अलबत्ता यह मक़बरा वर्तमान समय में नगर के विस्तार की योजना के अंतर्गत नगर के क्षेत्र में आ गया है। यह मक़बरा आरंभ में सादी का आश्रम था जिसमें उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष व्यतीत किए और मृत्यु के बाद उन्हें वहीं दफ़न कर दिया गया। सातवी शताब्दी में पहली बार सादी की क़ब्र पर भव्य मक़बरे का निर्माण हुआ। वर्ष 998 हिजरी क़मरी में फ़ार्स के शासक याक़ूब ज़ुलक़द्र के आदेश पर शैख़ सादी के आश्रम को उजाड़ दिया गया किन्तु वर्ष 1187 हिजरी क़मरी में करीम ख़ान ज़ंद के आदेश पर चूने और ईट से सादी के मज़ार पर सुंदर इमारत का निर्माण किया गया। वर्ष 1950 में अली असग़र हिकमत और ईरान के राष्ट्रीय धरोहर संघ के प्रयासों से प्राचीन इमारत के स्थान पर वर्तमान भव्य मक़बरे का निर्माण किया गया। मक़बरे का प्रवेश द्वार ही इमारत का मुख्य प्रवेश द्वार है और इसके वास्तुकार फ़्रांस के ANDERE GODAR हैं। इमारत ईरानी वास्तुकला शैली में बनी हुई है और भूरे रंग के आठ स्तंभ मक़बरे के सामने स्थित हैं। मुख्य इमारत को सफ़ेद रंग के पत्थरों और टाईलों के कार्य से सुसज्जित किया गया है। मक़बरे की इमारत बाहर से चौकोर है किन्तु भीतर से अष्टफलकीय हैं जिसकी दीवारें संगे मरमर से बनी हुई हैं और इसके गुंबद का रंग नीला है। उक्त इमारत दालान के माध्यम से ईरान के प्रसिद्ध शायर शूरीदे शीराज़ी के मक़बरे से मिली हुई है। सादी के मक़बरे की नयी इमारत का क्षेत्रफल 10400 वर्ग मीटर है और लगभग 260 वर्ग मीटर में मुख्य इमारत बनी हुई है। मक़बरे की मुख्य इमारत एक के ऊपर दो बरामदे हैं और जहॉ पर यह बरामदे एक दूसरे से मिलते हैं वहीं पर शैख़ सादी की क़ब्र है। आठ कोनों वाली इमारत के मध्य क़ब्र का पत्थर है और इसकी छत फ़ीरोज़ी रंग की टाईलों से सजाई गयी है। इमारत के सात कोने पर सात शिलालेख हैं जिनपर सादी के विभिन्न पद्य संकलनों से चुने हुए शेर लिखे हुए है। ईरान के इस महान शायर के मक़बरे के इर्द गिर्द बहुत सी प्रसिद्ध हस्तियों और बुद्धिजीवियों की क़ब्रे हैं जिनहें उनकी वसीयत के अनुसार वहां दफ़न किया गया। सुन्दर बाग़ों से संपन्नता के कारण शीराज़ नगर, ईरानी बाग़बानी कला में विशेष स्थान और ख्याति रखता है। प्राचीन काल से ही यह नगर हरे भरे सुन्दर और बड़े व धने बाग़ों के लिए प्रसिद्ध रहा है। इतना प्रसिद्ध कि विदेशी पर्यटकों के यात्रा वृतांतों में इस बाग़ की प्रशंसा की गयी है। आठवीं हिजरी शताब्दी में शीराज़ नगर की यात्रा करने वाले मोरक्को के प्रसिद्ध पर्यटक इबने बतूता ने इस बाग़ को देखा और इसकी प्रशंसा में इस प्रकार कहते हैं कि पूरब में कोई भी नगर सुन्दर बाज़ारों, बाग़ों, जल और लोगों की दृष्टि से दमिश्क़ के स्तर तक नहीं पहुंच सकता किन्तु शीराज़, यह नगर समतल धरती पर स्थित है जिसके चारो ओर हरे भरे व सुन्दर बाग़ ही बाग़ हैं। स्पष्ट है कि उचित भोगोलिक स्थिति और संतुलित जलवायु, इस बाग़ के अस्तित्व में आने का कारण बने हैं। वर्तमान समय में 12वीं और 13वीं शताब्दी के कुछ बाग़ अब भी शीराज़ में मौजूद हैं जिसमें बाग़े इरम, बाग़े दिलगुशा, बाग़े जहांनुमा, बाग़े नज़र और बाग़े नारंजिस्ताने क़ेवाम का नाम लिया जा सकता है। आज के कार्यक्रम को बाग़े इरम के परिचय से विशेष करने जा रहे हैं। कृपया हमारे साथ रहिए। ईरान के इतिहास में बाग़े इरम सबसे प्राचीन और सबसे प्रसिद्ध बाग़ों में से एक है। यह बाग़ ईरान की असली व पारंपरिक वास्तुकला का सुन्दर नमूना है और यह बाग़ सुन्दर व मनोहर दृश्यों और लंबे लंबे सनौवर के वृक्षों के सुसज्जित होने के कारण शीराज़ नगर के आकर्षक व मनोहर दृश्यों को प्रस्तुत करता है। बाग़े इरम की आरंभिक इमारत का निर्माण इलख़ानी शासन काल में किया गया और उसके बाद शीराज़ नगर के दो दक्ष व निपुण वास्तुविदों के हाथों इसकी मरम्मत हुई। लगभग सौ वर्ष पूर्व इस बाग़ में तीन मंज़िला एक इमारत बनाई गयी जिसकी वास्तुकला, पत्थरों पर बनी नक़्क़ाशी, चित्रकलाएं, प्लास्टर और टाईलों के कार्य, 19वीं शताब्दी हिजरी में क़ाजारी शासन काल की श्रेष्ठ कला कृतियों में से हैं। बाग़े इरम की इमारत की पही मंजिल को को पत्थर के शिलालेखों से सजाया गया है और ईरान के दो प्रसिद्ध शायर सादी व शूरीदे के शेर दीवारों पर लिखे गये हैं।जो चीज़ शीराज़ के बाग़े इरम को विश्व के अन्य बाग़ों से विशिष्टता प्रदान करती है, वह टाईलों की सुन्दर सजावट से ईश्वरीय दूत हज़रत सुलैमान, की कहानी और मेहमानों की बैठकों का चित्रता तथा ईरान के प्रसिद्ध शायर निज़ामी की कथाओं की कुछ झलकियां हैं जिन्हें बहुत ही कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। बाग़े इरम की दीवारों पर हुई टाइलों से सुन्दर सजावट और पेन्टिंग, ईरान की प्राचीन पारंपरिक संस्कृति और जनता की रूचि व सौंदर्यबोध की सूचक हैं। दीवारों पर टाइलों की सुदर सजावट और पेन्टिंग दारा पवित्र क़ुरआन और फ़िरदौसी के शाहनामें की कहानियां चित्रित की गयीं हैं। बाग़े इरम की डिज़ाइनिंग में, उत्तरी कोने पर बनी को इस प्रकार बनाया गया है कि यह उत्तरी कोने से जारी होकर बाग़े इरम की निचली मंज़िल में प्रविष्ट होती है और इससे इमारत का भीतरी भाग ठंडा रहता है। इस नाजी पर टाइलों का काम हुआ है। वह हाल जिसमें पानी से भरी घुमावदार नालियां है वह हौज़ ख़ाने के नाम से प्रसिद्ध है। इमारत के ठीक सामने टाइलों से बना एक हौज़ है जिस पर प्रकृति के सुन्दर दृश्य, इमारत व दीवारों की चित्रकलाओं और बाग़े इरम के प्रसिद्ध सनौवर के वृक्षों का प्रतिबिंबन हर देखने वाले को अपनी ओर सम्मोहित कर लेता है। इस बाग़ में सनौवर के बहुत ही पुराने ऊंचे ऊंचे और सुन्दर वृक्ष मौजूद हैं और इन्हीं सनौवर के वृक्षों के कारण इस बाग़ को विश्व ख्याति प्राप्त हुई है। बाग़े इरम के सनौवर के वृक्षों में सनौवर का ऐसा प्रसिद्ध वृक्ष लगा हुआ है जो 250 वर्ष पुराना है और यह लंबाई 36 मीटर लंबा होने के कारण विश्व विख्यात है । उक्त सनौवर का वृक्ष टाईल के हौज़ के दक्षिणी किनारे पर इमारत के ठीक सामने स्थित है। वर्तमान समय में बोटैनिकल गार्डन के रूप में बाग़े इरम शीराज़ विश्वविद्यालय के नियंत्रण में है और प्रत्येक वर्ष बहुत से छात्र, विदेशी व स्वदेशी पर्यटक और देश के शोधकर्ता इसका निरिक्षण करते हैं। बाग़े इरम के प्रांगड़ में पांच सौ प्रकार की अमूल्य जड़ी बूटियां उगाई गयी हैं जिनमें से कुछ ऐसी हैं जो बहुत ही विरल हैं। बाग़े नारंजिस्ताने क़ेवाम शीराज़ नगर के प्राचीन और प्रसिद्ध बाग़ों में से एक है। यह बाग़ और इसकी इमारत, क़ाजारी शासन काल की मूल्यवान चीज़ों में है और नारंगी के भरे हुए वृक्षों के कारण यह बाग़ नारंजिस्तान के नाम से प्रसिद्ध है। फ़ारसी भाषा में नारंगी को नारंजी करते हैं। यह बाग़ और इससे जुड़ी हुई इमारतों के निर्माण का कार्य मुहम्मद अली ख़ान क़ेवामुलमुल्क के आदेश पर आरंभ हुआ और वर्ष 1300 हिजरी क़मरी में उनके पुत्र मुहम्मद रज़ा क़ेवामुलमुल्क के हाथों पूरा हुआ। बाग़ का मुख्य द्वार दक्षिण की ओर है और प्रेवश द्वार पर लाल संगे मरमर की शिलालेखें लगी हुई जिसमें क़ुरआन की विभिन्न आयतें लिखी हुई हैं और इस पर ईटों से सजावट की गयी है और सागवान की लकड़ी से तक्षणतला का सुंदर काम किया गया है और यह द्वार हश्ती नामक आठ कोण वाले दालान में खुलता है और दो मार्गों के माध्यम से बाग़ से जुड़ा हुआ है।बाग़े नारंजिस्तान के उत्तरी, दक्षिणी और पूर्वी भागों में इमारतें बनी हुई हैं और उत्तरी भाग में स्थित दो स्तंभों वाले बरामदे वाली मुख्य इमारत ज़ंदिया काल की वास्तुकला शैली से संपन्न है। मुख्य इमारत दो मंज़िला है और इसमें एक तहख़ाना है। बड़े बरामदे के दोनों ओर बाग़ के समस्त भागों में जाने के लिए दो मार्ग बनाए गये हैं जो फ़र्श से दो मीटर ऊंचे हैं। बड़े बरामदे के स्तंभ संगे मरमर के एक ही बड़े टुकड़े से बना हुआ बेलनाकार है। नारंजिस्तान बाग़ की इमारत का क्षेत्रफल लगभग 940 वर्गमीटर है और इस बाग का क्षेत्रफल 3500 वर्गमीटर है और यह इमारत उत्तरी और दक्षिणी दो सिरे पर बनी हुई है। वर्ष 1974 में इस बाग़ को ईरान की राष्ट्रीय धरोहर की सूची में पंजीकृत किया गया। बाग़ की इमारत पर की गयी आइनाकारी, शीशाकारी, पेन्टिंग, तक्षणकला, पत्थरों के काम, चूने के काम और सीढ़ी की भांति एक के ऊपर एक बने हुए ताक़ों वाली सजावट कला की दृष्टि से शीराज़ में क़ाजारी शासन काल की सुन्दर इमारतों में से है। वर्ष 1966 में इस बाग़ को शीराज़ विश्वविद्यालय के हवाले कर दिया गया और वर्ष 1969 से 1979 के वर्षों तक प्रसिद्ध ईरानोलोजिस्ट प्रोफ़सर ARTHUR UPHAM POPE की निगरानी में एशिया संस्था के अधिकार में था और वर्ष 1999 में इसे शीराज़ विश्वविद्यालय की कला और वास्तुकला संकाय के हवाले कर दिया गया।