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    शीराज़-3

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    शीराज़ नगर का ऐतिहासिक अतीत हख़ामनशी काल से संबंधित है किन्तु इसकी ख्याति और इसकी विश्वसनीयता इस्लामी काल से संबंधित है। इस काल में शीराज़ विस्तृत हुआ यहां तक कि चार शासन श्रखलाओं कालों में यह नगर राजधानी के रूप में चुना गया। ईरान के अन्य नगरों की भांति शीराज़ नगर ने भी बहुत उतार चढ़ाव वाले दिन देखे हैं। जब भी किसी शासक द्वारा यह नगर राजधानी या शासन केन्द्र के रूप में प्रयोग किया गया तो इसका पुनर्निमाण हुआ जब भी यह नगर किसी शासक के क्रोध का केन्द्र बना तो इस नगर को बड़ी-2 कठिनाईयों का सामना हुआ। चूंकि इस नगर में हर काल में उसी काल के वातावरण से प्रभावित शैलियों से इमारते बनायी गयीं अतः ईरान के अतीत के उतार चढ़ाव को शीराज़ में बनी इमारतों की वास्तुकला में देखा जा सकता है। इस नगर में ईलख़ानो, मंगोलों, सफ़वियों, क़ाजारियों और ज़ंदिया कालों की बहुत ही मूल्यवान और महत्त्वपूर्ण इमारतों या उनके अवशेषों को देखा जा सकता है। इसी के साथ ज़ंदिया शासन काल से संबंधित इमारतों और अवशेषों को विशेष महत्त्व प्राप्त है और उनकी संख्या भी बहुत अधिक है। वकीलुर्रिआया के नाम से प्रसिद्ध करीम ख़ान ज़ंद ईरान में वर्ष 1163 से 1193 तक चली ज़ंदिया शासन श्रंखला के संस्थापक थे। उन्होंने शीराज़ को अपनी राजधानी बनाया और इस नगर में मूल्यवान और महत्त्वपूर्ण इमारतों के निर्माण का आदेश दिया। करीम ख़ान दुर्ग, मस्जिदे वकील, बाग़े नज़र, हमामे वकील, दीवान ख़ाने की इमारत और बहुत सी इमारतें, उन महत्त्वपूर्ण धरोहरों में से हैं जो पर्यटकों को अपनी ओर बहुत आकर्षित करती हैं।शीराज़ नगर की ऐतिहासिक इमारतों के परिचय से पूर्व यह आवश्यक है कि पहले हम ज़ंदिया काल की वास्तुकला की विशेषताओं के बारे में चर्चा करें। ज़ंदिया काल की वास्तुकला में सफ़वी काल की वास्तुकला को जारी रखा गया है किन्तु बहुत ही साधारण और बहुत की नये तरीक़े से। ज़दिया काल में बनी इमारतों की विशेषताओं में से एक तो यह है कि यह इमारतें बहुत ही मज़बूत और शीराज़ नगर के जलवायु के अनुरूप होती हैं जिसने ईरान की वास्तुकला को बिल्कुल नयी, अनोखी और आकर्षक शैली प्रदान की है। इसी प्रकार इस वास्तुकला की विशेषताओं में यह भी है कि इन इमारतों के भीतरी भाग पर उनके बाहरी या ऊपरी भाग से अधिक ध्यान दिया गया है और इन इमारतों को भीतर से सजाने व सुन्दर बनाने के लिए प्लास्टर आफ़ पेरिस, चित्रकला और टाईलों के काम जैसी विभिन्न कलाओं का प्रयोग किया गया है। ज़ंदिया काल की इमारतों को इस प्रकार से सुदृढ़ बनाया गया है कि भीषण भूकंप भी इसको कुछ हानि नहीं पहुंचा सके हैं। दो स्तंभो वाले बहुत ही सुन्दर और उचित बरामदे या दालान जिनका हर स्तंभ पत्थर के एक ही बड़े टुकड़े से बना हुआ है कभी यह स्तंभ बिल्कुल सादे होते हैं और कभी इन के पत्थर पर उकेर कर घुमावदार डिज़ाइनें बनी होती है, यह भी ज़ंदिया काल की वास्तुकला की एक अन्य विशेषता है।बेहतर होगा है कि हम ज़ंदिया काल की इमारतों से अधिक परिचित होने के लिए करीम ख़ानी दुर्ग देखने चलें। करीम ख़ानी दुर्ग, करीम ख़ान का राजमहल व ज़नान ख़ाना था जो वर्ष 1180 हिजरी क़मरी में उनके आदेश से बनाया गया और वर्तमान समय में पूर्वोत्तरी शीराज़ में स्थित है। ऊंचा करीम ख़ानी दुर्ग, अद्वितीय रचनात्मकता, सुदृढ़ता, सूक्ष्मता और सादगी का उदाहरण है। इस आयाताकार दुर्ग का क्षेत्रफल चार हज़ार वर्ग मीटर है और इसके हर कोने पर पक्की ईटों से 15 मीटर ऊंचा एक मीनार बनाया गया है। इसके उत्तरी, दक्षिणी और पश्चिमी कोनों के मध्य एक हाल और दो बड़े कमरों वाला एक बरामदा बना हुआ है। टावर और मीनारों पर ईटों से बनी सुंदर चित्रकलाओं ने इस इमारत की सुंदरता और वैभवता में चार चांद लगा दिए हैं। दुर्ग के कमरों और भीतरी वातावरण को सुन्दर चित्रकलाओं से सुसज्जित किया गया है और छोटे छोटे उद्यानों और वृक्षों ने हरा भरा मनमोहक दृश्य उत्पन्न कर दिया है। क़जारियों के शासन काल में ज़ंदियों से काजारियों की शत्रुता के कारण ज़ंदियों की चित्रकलाओं और टाईलों पर बने कार्यों को मिटा दिया गया और उनके स्थान पर क़ाजारियों के काल से संबंधित सुंदर चित्रकलाओं का निर्माण किया गया। इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद इमारतों के मूल प्रारूप को सुरक्षित रखते हुए उनके पुनर्निमाण के लिए व्यापक प्रयास किए गये और दीवारों पर प्लास्टर आफ़ पेरिस की अद्वितीय और आकर्षक चित्रकलाएं बनायी गयी। ज़ंदिया काल की प्रसिद्ध इमारतों में से एक बाज़ारे वकील है जिसे वर्ष 1936 में ईरान के इस्लामी धरोहरों की सूची में पंजीकृत किया गया। बाज़ारे वकील, वास्तुकला की दृष्टि से बहुत ही आकर्षक व ध्यान योग्य है। बाज़ारे वकील की वास्तुकला यद्यपि ईरान की प्राचीन वास्तुकला की परिधि से बाहर नहीं है और कहा यह जाता है कि शाह अब्बास सफ़वी के काल की धरोहर लार के प्राचीन बाज़ार से प्रेरणा लेकर इस बाज़ार का निर्माण किया गया है किन्तु यह स्वयं भी अन्य बाज़ारों के लिए प्रेरणादायक है जिसे बाद में ज़ंदिया शासन ने निर्माण कराया था। बाज़ार की वास्तुकला में रोशनदान, जालियों और ऊंची ऊंची छतों का प्रयोग किया गया है जिससे प्रकाश और गर्मी को नियंत्रित करने की संभावना उत्पन्न होती है। इस प्रकार से कि गर्मी में बाज़ार ठंडा और ठंडक में गर्म रहता है। अपनी अनेक कारवां सरायों के कारण शीराज़ का वकील बाज़ार, सदैव नगर की अर्थव्यवस्था का हृदय और वस्तुओं के वितरण का बहुत बड़ा केन्द्र रहा है। वर्तमान समय में भी इस पारंपरिक बाज़ार में बहुत चहल पहल रहती है। इसी प्रकार इस बाज़ार में विभिन्न प्रकार की हस्त उद्योग की चीज़े, कपड़े और अन्य उत्पादन मिलते हैं। मस्जिदे वकील या जामे वकील भी ज़ंदिया काल की महत्त्वपूर्ण धरोहर है। इस मस्जिद का क्षेत्रफल 11 हज़ार वर्ग मीटर है और 9600 वर्ग मीटर में मस्जिद का निर्माण किया गया है। मस्जिद के पूरे आंगन में पत्थरों का फ़र्श है। मस्जिद के आंगन के बीचो बीच पत्थरे के एक ही बड़े टुकड़े को काटकर एक आयताकार तालाब बनाया गया है। मस्जिद में बरामदे और गर्मी और सर्दी के लिए विशेष हाल भी शामिल हैं। क़ुरआनी आयतें जो बहुत ही सुन्दर हस्तलिपि में प्रवेश द्वार और बरामदे के हाशिए पर लगे हुए विभिन्न शिलालेखों पर मौजूद हैं,इस पूरे वातावरण को पवित्र व पावन बनाए हुए हैं। मस्जिदे वकील से थोड़ी ही दूरी पर हमामे वकील अर्थात वकील स्नानगृह स्थित है जिसका कई आयामों से कोई समकक्ष नहीं है। हमामे वकील, ईरान के ऐतिहासिक स्नानगृहों में सबसे बड़ा और सबसे महत्त्वपूर्ण है। यह स्नान घर एक दूसरे से जुड़े चार भागों से मिलकर बना है। हमाम में प्रविष्ट होने के बाद हम आठ कोनो वाले उस स्थान को देखते हैं जिसकी छत को प्लास्टर आफ़ पेरिस से बहुत ही आकर्षक ढंग से सुसज्जित किया गया है। प्रागड़ के मध्य एक बड़ा सा हौज़ है और उसके इर्द गिर्द बने छोटे छोटे हौज़ बहुत ही मनोहर लगते हैं। प्लास्टर आफ़ पेरिस से छत पर बनी हुई चित्रकलाएं, मेराजे रसूल अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम (स) के आकाश पर जाने की कथा और ईरान की कुछ प्राचीन कथाओं की याद दिलाती हैं। हमामे वकील अपने समय की सबसे विकसित वास्तुकला सिद्धांत से संपन्न है जो स्नान घर के भीतरी वातावरण को गर्म रखने और ठंडी हवा के स्नानगृह में प्रविष्ट होने से रोकने में सहायता करती है। वर्तमान समय में इस स्नानगृह को पारंपरिक कलाओं की स्थाई प्रदर्शनी का केन्द्र बना दिया गया है और इस स्थान की मरम्मत और पुनर्निमाण किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त ज़ंदिया काल के प्रसिद्ध धरोहरों में से एक पार्स संग्राहलय है। प्राचीन समय में पार्स संग्राहलय के वर्तमान स्थल पर बाग़े नज़र के नाम से प्रसिद्ध एक बड़ा बाग़ था जिसमें पार्स संग्राहलय और करीम ख़ान दुर्ग मौजूद है। सुंदर बाग़ के मध्य कुलाहे फ़रहंगी के नाम से प्रसिद्ध आठ कोनों वाली सुंदर इमारत को बाग़े नज़र के नाम से बनाया गया है। करीम ख़ान के समय में यह भव्य इमारत मेहमानों और विदेशी राजदूतों का स्वागत करने और विभिन्न समारोहों के आयोजन का केन्द्र थी। करीम ख़ान ज़ंद की वसीयत के अनुसार, उनको इमारत के पूर्व में स्थित शाह नशीन अर्थात मुख्य दालान में दफ़्न किया गया और उसे वकील के मकबरे का नाम दिया गया। उक्त इमारत के आठ कोने हैं जिनपर पत्थर के एक ही बड़े टुकड़े पर विभिन्न घुमावदार डिज़ाइनों से जिसे इस्लीमी चित्रकला कहा जाता है टाईलों पर बनी सुन्दर डिज़ाइनें, फूल व पक्षियों के चित्र, शिकारगाह के दृश्य और ईरान की प्राचीन कथाओं से प्रेरित चित्रकलाएं बनी हुई हैं। इमारत की भीतरी छतों में विभिन्न प्रकार के छोटे बड़े ताक़ों का निर्माण किया गया है और इन ताक़ों को और इमारत की छतों को सीढ़ीयों की शक्ल में छोटे छोटे ताक़ों से बहुत ही सुंदर ढंग से सजाया गया है जिसे स्थानीय भाषा में मुक़रनस कारी कहते हैं। इमारत के भीतर बनी समस्त चित्रकलाओं में इस्लीमी चित्रकला व फूल और पक्षियों वाली डिज़ाइनें सम्मलित हैं और हाल के बीचो बीच संगे मरमर के से बना एक हौज़ है। यह इमारत वर्ष 1936 में संग्राहलय में परिवर्तित की गयी और उसे पार्स का नाम दिया गया। इस संग्राहलय में मौजूद चीज़ों में इतिहास से पूर्व, ऐतिहासिक और इस्लामी काल की चीज़ों की ओर संकेत किया जा सकता है। इन धरोहरों में मिट्टी और पीतल के बर्तनों, शिलालेखों, हस्तलिखित पुस्तकें, चित्र कलाओं के नमूने और विभिन्न कालों से संबंधित काग़ज़ को गला कर उनसे बनाई गयी विभिन्न वस्तुओं का नाम लिया जा सकता है।ज़ंदिया काल की धरोहरें जितनी हमने बतायी है उतने तक ही सीमित नहीं हैं। बाग़े जहांनुमा, दीवान ख़ाने की इमारत, तकिया-ए- चेहल तनान, शाह शुजाअ का मक़बरा और विभिन्न अन्य स्थान, शीराज़ में ज़ंदिया काल के वैभव की याद दिलाते हैं।