islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. शुक्रिया

    शुक्रिया

    शुक्रिया
    Rate this post

    “शुक्रिया”—-एक बहुत ही जाना पहचाना लफ़्ज़ है जिसका इस्तेमाल सभी ज़बानों और मज़हबों में होता है। कहने में इतना हलका मगर इतना वज़नी कि इसके आगे दुनिया की हर चीज़ छोटी और हलकी है।

    अगर किसी इंसान की नेकी और एहसान के बदले में उसका शुक्रिया अदा कर दिया जाए तो वह मज़दूरी से ज़्यादा क़ीमती होता है। इंसान चाहे किसी भी मज़हब का हो, शुक्रिया अदा करना उसकी अख़्लाक़ी ज़िम्मेदारी है। लेकिन मोमिनीन के लिए शुक्रिया अदा करना उनका फ़र्ज़ है। इंसानों के साथ-साथ अल्लाह का शुक्रिया अदा करना भी वाजिब है। सूरए नहल की आयत न. 78 में है कि, “और उसी ने तुम्हारे लिए कान, आंख और दिल बनाए हैं कि शायद तुम शुक्रगुज़ार बन जाओ।”
    हर वह चीज़ जो इंसान की इंसानियत में इज़ाफ़ा करदे अल्लाह के नज़दीक इबादत है। ख़ुदा चाहता है कि उसका बंदा शुक्रगुज़ार बन जाए। इसी तरह जब इंसान, किसी दूसरे इंसान का शुक्रिया अदा करता है तो उसकी अख़्लाक़ी value बढ़ जाती है।
    और यही इंसान जब अपने ख़ुदा का शुक्रिया अदा करता है जिसकी नेमतें अनगिनत हैं, जिसका करम अपने बन्दों पर उस वक़्त से है जब उसने उसका एक सज्दा भी नहीं किया था, जिसकी नेमतों और एहसानों को गिना ही नहीं जा सकता तो चाह कर भी अपने रब की तमाम नेमतों का शुक्रिया अदा नहीं कर सकता। अगर हर साँस के आसानी से आने और जाने पर भी शुक्रिया अदा करें तो सिर्फ़ इस एक काम पर ज़िन्दगी ख़त्म हो जाएगी और शुक्र का हक़ अदा नहीं हो सकेगा। मगर जैसी वह ज़ात उसका वैसा ही करम है। ख़ुदा क़ुरआन में इर्शाद फ़रमाता हैः- “अगर तुम हमारा शुक्रिया अदा करोगे तो हम नेमतों में इज़ाफ़ा कर देंगे।” (सूरए इब्राहीम, आयत, 7)
    रसूल अल्लाह (स.) फ़रमाते हैं किः- “अगर तुम चाहते हो कि तुम्हारी नेमतें हमेशा तुम पर बाक़ी रहें तो अल्लाह का ज़्यादा शुक्र अदा किया करो।”
    इमाम सादिक़ (अ.) फ़रमाते हैं किः- “उस लम्हे की क़द्र करो जब बेसाख़्ता अल्लाह की नेमतों पर शक्र के लिए सज्दे में सर रख दो।” इमाम अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं किः- किसी बन्दे में इतनी ताक़त है ही नहीं कि ख़ुदा की मुकम्मल यानी तमाम नेमतों का शुक्र अदा कर सके, मगर ख़ुदा ने कहा है कि अगर मेरा बन्दा एक बार ज़बान से “अल-हमदु लिल्लाह” कहता है तो मैं पचास साल का शुक्रिया क़बूल कर लेता हूँ।
    मगर ख़ुदा उस बन्दे का शुक्रिया क़बूल नहीं करता जो अपने माँ-बाप का शुक्रिया अदा न करे यानी अपने शुक्र को वाजिब किया और माँ-बाप के शुक्र को ज़रूरी कर दिया। बेशक जिस तरह अल्लाह का शुक्र करना नामुमकिन है उसी तरह माँ-बाप के एहसानों का पूरी तरह शुक्रिया अदा करना भी औलाद के लिए नामुमकिन है।
    रसूले ख़ुदा (स.) के ज़माने में एक शख़्स था जो अपनी माँ से बहुत मुहब्बत करता था। एक रात उसकी माँ ने उसको आवाज़ दी और पानी मांगा। जब वह शख़्स पानी ले कर माँ के पास आया तो वह सो चुकी थी। उसने उसे जगाना मुनासिब नहीं समझा और पानी हाथ में लिए ख़ड़ा रहा इस इन्तेज़ार में कि जब माँ जागेगी तो पानी देदूंगा। यहाँ तक कि सारी रात गुज़र गई और सुब्ह हो गई। वह माँ के जागने के इन्तेज़ार में ख़ड़ा रहा। सुब्ह रसूले ख़ुदा (स.) के पास आया और कहने लगा कि या रसूल अल्लाह (स.) क्या मैंने अपनी माँ का हक़ अदा कर दिया। आप ने फ़रमाया सिर्फ़ उस एक रात का जब तुम रो रहे थे और तुम्हारी माँ ने तुम्हें पूरी रात गोद में लेकर टहल-टहल के गुज़ार दी थी। ऐसी कितनी रातें उसने तुम्हारी परवरिश में गुज़ारी हैं जिसका शुक्रिया तुम पूरी ज़िन्दगी भी अदा नहीं कर सकते। बस माँ-बाप के साथ नेकी करते रहे और उन का शुक्रिया अदा करते रहो।
    जब इंसान, इंसान का शुक्रिया अदा करता है तो उसकी इज़्ज़त बढ़ती है। और जब इंसान ख़ुदा का शुक्रिया अदा करता है तो उसकी नेमतों में इज़ाफ़ा होता है। बंदगी के दर्जे बुलन्द होते हैं और इबादत का सवाब मिलता है। अल्लाह के नज़दीक शुक्र बेहतरीन इबादत है। शुक्र अदा करने की तौफ़ीक़ भी अल्लाह की तरफ़ से ही मिलती है। शुक्र ख़ुदा की मारेफ़त के मिलने और बंदगी के एहसास का नाम है। यह वह इबादत है जिसके लिए कोई वक़्त तैय नहीं है, बन्दा जब चाहे, जहाँ चाहे इस इबादत को अदा कर सकता है।
    कभी-कभी अकेले में अपने बिस्तर पर लेटे-लेटे जब दिल ख़ुदा को याद करता है और उसकी नेमतों पर ग़ौर करता है, तो दिल में आवाज़ आती है कि परवरदिगार! मुझे अपनी नेकियों पर नाज़ नहीं मगर तेरी अता पर नाज़ है कि तूने इतना अच्छा नफ़्स दिया जो गुनाहों से बेज़ार है, इसे और बेहतर बनादे जैस तू चाहता है।
    नमाज़ अल्लाह की याद है

    अल्लाह ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से फ़रमाया कि मेरी याद के लिए नमाज़ क़ाइम करो।
    एक मख़सूस तरीक़े से अल्लाह की याद जिसमे इंसान के बदन के सर से पैर तक के तमाम हिस्से शामिल होते हैं।वज़ू के वक़्त सर का भी मसाह करते हैं और पैरों का भी, सजदे मे पेशानी भी ज़मीन पर रखी जाती है और पैरों के अंगूठे भी। नमाज़ मे ज़बान भी हरकत करती है और दिल भी उसकी याद मे मशग़ूल रहता है। नमाज़ मे आँखे सजदह गाह की तरफ़ रहती हैं तो रुकू की हालत मे कमर भी झूकी रहती है। अल्लाहो अकबर कहते वक़्त दोनों हाथ ऊपर की तरफ़ उठ ही जाते हैं। इस तरह से बदन के तमाम हिस्से किसी न किसी हालत मे अल्लाह की याद मे मशग़ूल रहते हैं।
    नमाज़ और अल्लाह का शुक्र
    नमाज़ के राज़ो मे से एक राज़ अल्लाह की नेअमतों का शुक्रिया अदा करना भी है। जैसे कि क़ुरआन मे ज़िक्र हुआ है कि उस अल्लाह की इबादत करो जिसने तुमको और तुम्हारे बाप दादा को पैदा किया। अल्लाह की नेअमतों का शुक्रिया अदा करना बड़ी अहमियत रखता है। सूरए कौसर मे इरशाद होता है कि हमने तुम को कौसर अता किया लिहाज़ा अपने रब की नमाज़ पढ़ा करो। यानी हमने जो नेअमत तुमको दी है तुम उसके शुक्राने के तौर पर नमाज़ पढ़ा करो। नमाज़ शुक्र अदा करने का एक अच्छा तरीक़ा है। यह एक ऐसा तरीक़ा है जिसका हुक्म खुद अल्लाह ने दिया है। तमाम नबियों और वलीयों ने इस तरीक़े पर अमल किया है। नमाज़ शुक्रिये का एक ऐसा तरीक़ा है जिस मे ज़बान और अमल दोनो के ज़रिया शुक्रिया अदा किया जाता है।
    ऐ ख़ुदा! तूने इतना दिया कि तेरा शुक्र अदा नहीं किया जा सकता।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र है कि तूने हमें वह अक़्ल दी जो दुनिया व आख़िरत का फ़ाएदा और नुक़सान जानती है।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें समझ दी।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें इल्म की दौलत से नवाज़ा।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें हलाल रिज़्क़ दिया और हमें हलाल रोज़ी कमाने और हराम से बचने की ताकीद की।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें इज़्ज़त वाला बनाया हमें बेइज़्ज़ती से दूर रखा।
    ऐ ख़ुदा! तूझे मुहम्मद वा आले मुहम्मद (स.) का सदक़ा हम पर यह तमाम तेमतें बाक़ी रखना।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें रहने के लिए घर दिया क्यों कि हम देखते हैं कि जिन के पास घर नहीं है उनका सर ठकने के लिए कोई राज़ी नहीं है।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें सेहत मंद जिस्म अता फ़रमाया कि जिस के अंदर कोई कमी नहीं है सर से लेकर पेर तक तूने हमें सही व सालिम जिस्म देकर इस दुनिया में भेजा।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें मेहनत करने वाले हाथ दिये, वह हाथ दिये जिन में हुनर मौजूद है।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने वह हाथ दिए जो देते हैं, किसी के आगे फैलते नहीं और किसी को तकलीप़ नहीं देते। तूने वह हाथ दिए जो हमेशा ग़रीबों की मदद के लिए और यतीमों की सरपरस्ती के लिए उठते हैं।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें रौशन आँखें दी जो मेरे वुजूद की ज़ीनत और नेमत हैं। जिस के ज़रिए मैं हर अच्छे बूरे रास्ते की पहचान करता हूँ। अगर तू मुझे यह आँखें न देता तो मेरी ज़िन्दगी में हमेशा अंधेरा ही रहता। ऐ मेरे मालिक इन आँखों को ऐसा बना दे कि यह आँखें जब भी देखें हक़ को देखें कभी बातिल का साथ न दें।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें सालिम दिल दिया जो रहम से भरा हुआ है इस को हमेशा इसी हालत पर बाक़ी रखना। और तेरा शुक्र कि तूने इस दिल को मुहब्बते, मुहम्मद व आले मुहम्मद से रौशनी अता की।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें वह दिल दिया जिस दिल में हर लम्हा तेरी याद, शुक्र आर ख़ौफ़ के साथ रहती है। यह तेरी अता है वरना बन्दा इस दुनिया की रंगीनियों में ख़ुदा के ख़ौफ़ को भूल जाता है।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें वह दिल दिया जो हमेशा नेकियों की तरफ़ आगे बढ़ता है और गुनाहों से दूर रहता है। बारे इलाहा अपने इस करम को हमेशा बाक़ी रखना। और तेरा शुक्र कि तूने हमें ऐसा दिल दिया जो क़िनाअत पसंद है। जितना तूने अता किया है बस उसी पर तेरा शुक्र अदा करता है और ज़्यादा की चाहत नहीं रखता।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें ऐसा दिल दिया जिस में हसद और लालच नहीं है। ख़ुदाया तेरा शुक्र कि तूने हमें वह दिल दिया जिस दिल में बुग़ज़ और कीना नहीं है क्यों कि हसद, लालच और बुग़्ज़ और कीना तमाम बुराईयों की जड़ हैं।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें वह दिल दिया कि जिस में किसी भी तरह की किसी से भी दुश्मनी नहीं है।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें वह दिल दिया जिस में बुराई का बदला बुराई से लेने की तमन्ना नहीं है। सिर्फ़ मेरा दिल इतना चाहता है कि ऐ मेरे ख़ुदा उन के इरादों को नेकी से बदल दे जो मेरे लिए बुरा इरादा रखते हैं, उन्हें अक़्ले सालिम अता कर।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें वह दिल दिया जो बहुत जल्दी साफ़ हो जाता है किसी की बुराई को अपने अंदर मेहफ़ूज़ नहीं करता जितनी जिलदी हो सकता है उस को दूर कर देता है।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें वह दिल दिया जो हर शख़्स से मुहब्बत करने वाला है किसी की नफ़रत को अपने अंदर नहीं समाता।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें वह दिल दिया जो आले मुहम्मद का दीवाना है। और उन से बेपनाह मुहब्बत करता है ख़ुदाया! हमारी नस्लों में यह मुहब्बत और किरदार की यह तहारत हमेशा बाक़ी रख। और अपने और उन के बताए हुए रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ अता कर फ़रमा।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें वह ज़बान दी जो झूठ से खाली है। और ऐसी ज़बान अता की जो हमेशा नेक मशवरे देने वाली है हमेशा दूसरों की भलाई के लिए ही चलती है।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें वह ज़बान दी जो हमेशा हक़ पर चलती है कभी बातिल के सामने हमारे सर को झुकने नहीं देती। और तेरा लाख लाख शुक्र कि तूने हमें वह ज़बान दी है जो हमेशा अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर पर अमल करने वाली है।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें वह ज़बान अता की जो शीरीं है यानी जब भी बोलती है मीठा बोलती है कभी भी इस ज़बान से कड़वाहट ज़ाहिर नहीं होती।
    ऐ ख़ुदा! तेरा शुक्र कि तूने हमें वह ज़बान अती की है जो तेरी हम्द व सना और रसूले ख़ुदा (स.) का ज़िक्र करने वाली है।
    परवर्दिगार! तेरी नेमतों को गिना ही नहीं जा सकता और ऐसी कोई ज़बान है कि नहीं जो तेरी तमाम नेमतों का शुक्र अदा कर सके।
    परवर्दिगार! हमें आख़िरी वक़्त तक शुक्र बजा लाने वाला रखना और हमें मुहम्मद व आले मुहम्मद के सदक़े में हमेशा नेक अमल अंजाम देने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। ऐ ख़ुदा! हमें ऐसा बना दे कि कभी किसी को हम से कोई तकलीफ़ न हो हम जिस के साथ जो भी करें उस के भले के लिए करें हमारे हाथ जब भी उठें तेरी मख़लूक़ की मदद के लिए उठें। इन हाथों से जब भी तू काम लेने नेक काम लेना। ऐ ख़ुदा इन हाथों से कभी किसी पर ज़ुल्म न हो। हमारी ज़िन्दगी को ऐसा बनादे कि लोग हम से राज़ी और ख़ुशहाल रहें। क्यों कि जब तेरी मख़लूक़ हस से राज़ी रहेगी तो तू भी हम से राज़ी रहेगा ……आमीन।