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    सच्चाई

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    सच्चाई और ईमानदारी से ही एक इंसान, इंसान बनता है। असल में यह दोनों एक ही हैं क्यों कि सच्चाई बातचीत के बीच अमानतदारी के अलावा और कुछ नहीं है। इसी तरह अमानतदारी काम में सच्चाई बरतने ही का दूसरा नाम है। और इन दोनों के समाजी ऐतबार से असरात भी क़रीब-क़रीब एक ही जैसे होते हैं। शायद यही वजह है कि रिवायत व अहादीस में सच्चाई और अमानतदारी का ज़िक्र साथ-साथ हुआ है।

    सच्चाई की अहमियत
    ऊपर बयान किया जा चुका है कि सच्चाई इंसान की शख़्सियत, की ख़ुली निशानी है। सच बोलने वाले लोग आम तौर पर बहादुर, मुख़लिस, बेझिझक होने के साथ तास्सुब, मुहब्बत और नफ़रत में ज़्यादती से परहेज़ करने वाले होते हैं। क्यों कि सच्चाई इन चीज़ों के बिना पाई ही नहीं जा सकती है। इस के उलट झूट बोलने वाले लोग आप तौर पर डरपोक, मक्कार, लालची, मुतास्सिब और मुहब्बत व नफ़रत में ज़्यादती करने वाले होते हैं।
    सच बोलने वाले लोग अपनी ज़िन्दगी में हमेशा कुछ उसूलों के पाबंद होते हैं। ऐसा बहुत कम होता है कि यह लोग वक़्त के साथ बदलने वाले, हालात के तहेत मिज़ाज बदलने वाले या मुनाफ़िक़ हों क्यों कि सच इन में से किसी एक के साथ भी जमा नहीं हो सकता। और झूठ की बुनियाद यही चीज़ें होती हैं।
    सच्चाई को किसी शख़्स के बातिन और उसकी शख़्सियत के अलग-अलग पहलुओं को समझने का बेहतरीन ज़रिया समझा जा सकता है। इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं किः- “किसी शख़्स के लम्बे-लम्बे रुकू व सज्दों की तरफ़ मत देखो क्यों कि हो सकता है कि वह अपनी आदत की वजह से ऐसा कर रहा हो कि अगर उन्हें छोड़ देगा तो उसे परेशानी होगी बल्कि अगर देखना है तो उसकी सच्चाई और अमानत को देखो।”
    इस बारे में क़ुरआने मदीज इर्शाद फ़रमाता है किः- “और उनकी बात चीत के अंदाज़ से तो बहेरहाल पहचान ही लेंगे।”
    सच्चाई का असर और फ़ायदे
    समाजी एतेबार से सच्चाई व अमानत का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि इसके ज़रिए समाज में इत्मिनान और भरोसा पैदा होता है। हम जानते हैं कि आज जितनी भी सांइटिफ़िक या इंडस्ट्रियल और फ़ाइनेंशल तरक़्क़ी हो रही है उस का सेहरा इसी समाजी ज़िन्दगी के सर बंधता है जिसमें लोग एक दूसरे पर पूरी तरह इत्मिनान और भरोसा करते हों और अगर ऐसा नहीं होगा तो समाजी ज़िन्दगी का ख़ात्मा आपसी झगड़ों, लड़ाईयों, नसली इख़्तिलाफ़, और अलग-अलग तरह की कशमकशों पर होगा। इस सूरत में समाजी ज़िन्दगी से फ़ायदे के बजाए नुक़सान ही हासिल होंगे। बल्कि साफ़ है कि इत्मिनान और भरोसे के पैदा होने का अहम तरीन और असरदार ज़रिया यही सच्चाई और अमानतदारी है जबकि इसके उलट इसका सब से ख़तरनाक दुश्मन झूठ का रिवाज है।
    अगर कोई फ़ैक्ट्री या कम्पनी अपनी किसी नई ईजाद या प्रोडेक्ट के बारे में पब्लिक के साथ ग़लत बयानी से काम ले तो पब्लिक उस कम्पनी के दूसरे बेहतरीन और मशहूर प्रोडेक्ट के बारे में ग़लत नज़रिए बना लेती है। अगर कोई हुकूमत झूठ बोले तो पब्लिक उसके वादों, ऐलानों और किसी भी क़िस्म के ख़तरे के बारे में वार्निंग को संजीदगी से नहीं सुनेगी और इस तरह ऐसी हुकूमत पब्लिक से दूर हो जाएगी।
    अगर इल्मी माहौल और सोसाइटी में झूठ रिवाज पा जाए तो टीचर और स्टूडेंट एक दूसरे की बातों, इंवेंट्रस, तन्क़ीदों और रिसर्च पर बिल्कुल भरोसा नहीं करेंगे। और ऐसे में यह होगा कि हर शख़्स को अपनी किसी रिसर्च से जुड़कर तमाम ज़ेहमतें ख़ुद ही बर्दाशत करनी पड़ेंगी और वह पिछले लोगों की हज़ारों सालों की रिसर्च से भी कोई फ़ायदा नहीं उठा पाएंगा। इस तरह का इल्मी झूठ बदतरीन और ख़तरनाक तरीन झूठ शुमार किया जाएगा।
    झूठः बहुत से गुनाहों की जड़
    रिवायतों में नक़्ल हुआ है कि सच्चाई और अमानत, अमल की पाकीज़गी और झूठ गुनाहों का सोर्स है। हो सकता है कि कुछ लोगों के लिए इस बात का समझना मुश्किल हो कि सच और झूठ दूसरे इंसानीं कैरेक्टर और कामों पर भी अपना असर छोड़ सकते हैं।
    हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं किः- “सच्चाई नेकी की तरफ़ हिदायत करती है और नेकी जन्नत की तरफ़।” (मिश्कात, 157)
    इमामे जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम इर्शाद फ़रमाते हैं किः- “जब कोई बन्दा सच बोलता है तो ख़ुदा वन्दे आलम फ़रमाता है कि उसने सच कहा और नेक काम किया और अगर वह झूठ बोलता है तो फ़रमाता है कि उसने झूठ कहा और बुरा काम किया।” (मिश्कात, 156)
    इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम इर्शाद फ़रमाते हैं किः- “सारी बुराईयाँ एक कमरे में जमा कर दी गई हैं जिन्की कुन्जी (जाबी) झूठ है।”
    इस हदीस से भी साफ़ हो जाता है कि झूठ तमाम बुराईयों और गुनाहों की जड़ है।