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    सफल महिलाएं-1

    सफल महिलाएं-1
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    इतिहास इस बात का साक्षी है कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सदैव भलाई और अच्छाई के प्रतीक होते हैं जबकि दूसरे कुछ लोग सदैव बुराई के प्रतीक होते हैं। पवित्र क़ुरआन ने लोगों को इन जैसे लोगों से पाठ सीखने का निमंत्रण दिया है। पवित्र क़ुरआन में कुछ ऐसी महिलाओं का भी उल्लेख है जो अपनी सर्वोच्च विशेषताओं के दृष्टिगत लोगों के लिए एक आदर्श हैं। इस्लामी इतिहास में भी ऐसी बहुत सी श्रेष्ठ महिलाएं मिलती हैं जिन्होंने स्वयं, समाज और परिवार के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं।

     

    हालिया कुछ दशकों में राजनैतिक व सामाजिक हल्क़ों में जो महत्त्वपूर्ण विषय प्रस्तुत किए जा रहे हैं उनमें से एक महिला, उनकी पहचान और उनके स्थान का विषय है। अतीत की कुछ विचारधाराएं एक अतिवादी व्यवहार के अंतर्गत दूसरी श्रेणी की वस्तु और व तुच्छ प्राणी समझते थे और वे उन्हें मनुष्य मानने को तैयार ही नहीं थे। उदाहरण स्वरूप अरस्तु महिला को अपूर्ण प्राणी मानते थे और उनका कहना था कि महिलाओं को पुरुष की भांति मानव गरिमा प्राप्त नहीं है और समस्त चरणों में पुरुष ही श्रेष्ठ और प्रभावी भूमिका निभाता है। इस विचारधारा के आधार पर पुरुष विशेष अधिकारों का स्वामी होता है और महिलाएं मानवीय अधिकारों से वंचित होती हैं। यही नहीं बल्कि महिला, पुरुष की एक वस्तु समझी जाती थी। इस रूढ़ीवादी विचार धारा के चलते महिलाएं परिपूर्णता और अध्यात्म के शिखर तक नहीं पहुंच सकती थीं । यह विचारा धारा अतीत में विश्व के बहुत से क्षेत्रों में प्रचलित थी और अब भी बहुत से लोग इस विचारधारा को थामे हुए हैं।

    पश्चिमी महिलाएं भी बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक अपने बहुत से साधारण व मूल अधिकारों से वंचित रही हैं और बीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही केवल कुछ महिलाओं ने अपने छीने गये अधिकारों की प्राप्ति के लिए प्रयास आरंभ किए। यही कारण था कि महिलाओं को दूसरी श्रेणी और तुच्छ वस्तु मानने वाली विचारधाराओं के मुक़ाबले में नारीवाद जैसी कुछ विचारधाराएं अस्तित्व में आईं जो महिलाओं के अधिकारों और उनके स्थान को लेकर अतिवाद का शिकार हो गयीं। इस विचारधारा के मानने वालों ने महिलाओं की स्वाभाविक व प्राकृतिक विशेषताओं और महिलाओं व पुरुषों के लिंग में पाये जाने वाले आत्मिक व शारीरिक अंतरों की अनदेखी करते हुए इस प्रकार के दृष्टिकोण पेश किए कि महिलाएं और पुरुष पूर्ण रूप से समान हैं, महिलाओं द्वारा विवाह न करना और बच्चे न जनना, सामाजिक गतिविधियों और घर से बाहर महिलाओं का बिना रोकटोक अना जाना और समलैंगिता की ओर रूझहान इत्यादि। पश्चिम में इस प्रकार की विचारधारा के फैलने से समाज में महिला का वास्तविक स्थान गिर गया और पश्चिमी समाज में परिवार में उनकी भूमिका समाप्त होती चली गयी। नारीवाद विचारधारा के स्वामियों का यह मानना था कि इस प्रकार की विचारधारा को पेश करके वह महिलाओं को पुरुषों के बराबर लाकर खड़ा कर सकते हैं किन्तु वे इस बात से निश्चेत थे कि महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके कुछ अधिकारों की पूर्ति के प्रयास में उन्होंने महिलाओं की मानवता की अनदेखी कर दी है। इस प्रकार से इन समाजों में महिलाओं की समस्या का समाधान न हो सका। ईरान के प्रसिद्ध बुद्धिजीवी प्रोफ़सर मुर्तज़ा मुतह्तरी “इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों की व्यवस्था” नामक पुस्तक में यह लिखते हैं कि महिलाओं के वास्तविक अधिकारों की अनदेखी का मुख्य कारण यह है कि यूरोप में नारीवाद आंदोलन बहुत तेज़ी से अस्तित्व में आया। इसलिए इस आंदोलन ने जहां एक ओर महिलाओं के दुर्भाग्य के एक क्रम को दूर किया वहीं उसने मानव समाज और महिला के लिए अन्य समस्याएं खड़ी कर दीं। प्रोफ़ेसर मुर्तज़ा मुतह्हरी आगे लिखते हैं कि अतीत में महिलाओं के मनुष्य होने को भुला दिया गया था और आज उसके महिला होने को।

     

    अज्ञानता और इस्लाम के प्रकट होने के काल से पूर्व अरब प्रायद्वीप में महिलाओं की गिनती पुरुषों में नहीं होती थी और उनका शुमार पुरुषों की संपत्ति व ख़रीदी व बेची जाने वाली वस्तु के रूप में होता था। अज्ञानता के उस काल में हद तो यह हो गयी थी कि कुछ अज्ञानी अरब मूर्खता और अज्ञानता के कारण अपनी बेटियों को जीवित ज़मीन में गाड़ दिया करते थे और अपने इस कृत्य पर गर्व करते थे। अरब के अंधकारमयी वातावरण में जैसे ही इस्लाम धर्म की पहली किरण फूटी उसने इस कार्य को घृणित और इस कार्य के करने वालों को घृणा का पात्र बताया। पवित्र क़ुरआन के सूरए इसरा की आयत क्रमांक 31 में कहा गया है कि सचेत हो जाओ कि भूख के भय से अपनी संतानों की हत्या न करना कि हम उन्हें भी आजीविका देते हैं और तुम्हें भी आजीविका देते हैं, निसंदेह उनकी हत्या करना बहुत बड़ा पाप है। वास्तव में अज्ञानता के काल में महिलाओं को दूसरी श्रेणी का नागरिक समझा जाता था।

     

    अरब के घुटन भरे वातावरण में इस्लाम की किरण फूटते ही महिलाओं के संबंध में बड़ा परिवर्तन हुआ और नई विचारधाराओं ने अस्तित्व पाया जिसमें महिलाओं को बहुत अधिक सम्मान दिया गया। इस्लाम धर्म ने महिलाओं को श्रेष्ठ स्थान प्रदान किया और उसने महिलाओं को पुरुष के अस्तित्व का पूरक बताया। इस्लाम की दृष्टि में पुरुषों की भांति महिलाएं परिपूर्ण मनुष्य हैं और समाज का अटूट अंग समझी जाती हैं। इस्लाम ने महिलाओं को ऐसी विश्वसनीयता प्रदान की है कि एक मनुष्य मानवीय समाज से जिसे प्राप्त कर सकता है। इस आधार पर महिलाओं को उनका अधिकार दिलवाने के संबंध में इस्लाम समस्त विचारधाराओं से आगे और विकसित है। यही कारण है कि इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह हिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई कहते हैं कि महिलाओं के विषय में, विश्व इस्लाम का ऋणि है।

     

    इस्लाम धर्म के प्रकट होने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने मानवीय समाज में महिलाओं के शिखर व श्रेष्ठ स्थान को बयान किया। उन्होंने इसी प्रकार महिलाओं में पायी जाने वाली अपार क्षमताओं और शालीनताओं को भी लोगों के सामने पेश किया जिसे ईश्वर से महिला के अस्तित्व में रखा है। पैग़म्बरे इस्लाम ने पवित्र क़ुरआन की उन आयतों की भी लोगों के सामने तिलावत की जिसमें महिलाओं के उच्च स्थान का वर्णन किया गया है। पैग़म्बरे इस्लाम ने महिला को एक परिपूर्ण मनुष्य, मानवीय प्रतिष्ठा और परिपूर्णता तक पहुंचने, यहां तक कि ईश्वरीय उतराधिकार बनने के योग्य बताया।

     

    हम यह जानते हैं कि प्रत्येक योग्यता, स्वाभाविक व प्राकृतिक क्षमता का चिन्ह है अर्थात जब किसी भी प्राणी में कोई क्षमता पायी जाती हो उसका उपयोग करना आवश्यक है। इस आधार पर किसी महिला को लाभदायक प्रयास से रोकना जिसकी क्षमता उसे ईश्वर ने प्रदान की है, उस पर अत्याचार है क्योंकि वह अपनी व्यक्तिगत क्षमताओं का प्रयोग करके परिपूर्णता के महत्त्वपूर्ण स्थान तक पहुंच सकती है और मानवीय समाज की प्रगति का कारण बन सकती है।

     

    पवित्र क़ुरआन की बहुत सी आयतों में इस बात का बयान किया जाना कि महिलाओं और पुरुषों की रचना किस प्रकार हुई है, इस बात को दर्शाता है कि इस्लाम धर्म मानवता, ईश्वरीय परिपूर्णता और उसके उत्तराधिकार के स्थान तक पहुंचने में मनुष्यों के बीच किसी भी प्रकार के अंतर को नहीं मानता और उसका मानना है कि महिला और पुरुषों की सृष्टि समान है। उदाहरण स्वरूप  मनुष्य के लिए सबसे श्रेष्ठ स्थान ईश्वरीय उत्तराधिकार है इसीलिए पवित्र क़ुरआन में ईश्वर फ़रिश्तों को मनुष्य का सज्दा करने का आदेश देता है। इस विषय में आत्मा के फूंके जाने और मनुष्य को ईश्वरीय नामों को सिखाने के विषय को ध्यान में नहीं रखा गया है, इसमें ईश्वर का उद्देश्य केवल और केवल मनुष्य है कि जिसमें महिला और पुरुष दोनों की शामिल हैं और उनके बीच तनिक भी अंतर नहीं है। इस आधार पर पत्येक विशेषताएं जो ईश्वर ने पुरुष को प्रदान किया है ठीक वहीं विशेषताएं महिलाओं को भी प्रदान की हैं और उसमें तनिक भी अंतर नहीं है।

     

    प्रत्येक दशा में इस्लाम धर्म में मनुष्य के रूप में पुरुषों की भांति महिलाएं भी ईमान, ईश्वरीय भय, ज्ञान और तकनीक को प्राप्त कर सकती हैं और अपनी क्षमताओं और योग्यताओं को बढ़ा सकती हैं। उदाहरण स्वरूप इस्लाम धर्म में ईश्वरीय भय किसी एक लिंग से विशेष नहीं है बल्कि ईश्वरीय भय का वस्त्र धारण करने के लिए सभी महिलाओं और पुरुषों को सलाह दी गयी है। हम यह भी जानते हैं कि ईश्वरीय भय की कई श्रेणियां होती हैं जो ईमान, ज्ञान, शिष्टाचार, लोगों के साथ अच्छे व्यवहार और धैर्य, वीरता और सहिष्णुता जैसी अन्य विशेषताओं के स्तर से संबंधित होता है।  इस्लाम धर्म में चाहे पुरुष हो या महिला जो भी ईश्वरीय भय के उच्च स्थान पर है वह उन लोगों से बेहतर होता है जिनका दर्जा नीचे होता है। इस आधार पर वह महिला जो ईश्वरीय भय में उच्च स्थान पर हो उस पुरुष से बेहतर होती है जो ईश्वरीय भय में निचली श्रेणी में हो। पवित्र क़ुरआन ने पुरुषों की भांति महिलाओं को भी ईश्वरीय भय का वस्त्र धारण करने की सलाह दी है। जैसा कि पवित्र क़ुरआन के सूरए हुजोरात की आयत क्रमांक 13 में हम पढ़ते हैं कि हे मनुष्यो हमने तुमको एक पुरुष और एक महिला से पैदा किया और फिर तुम में शाख़ें और क़बीले बनाए हैं ताकि आपस में एक दूसरे को पहचान सको निसंदेह तुम में से ईश्वर के निकट अधिक सम्मानीय वही है जो अधिक ईश्वरीय भय रखता है और ईश्वर हर वस्तु का जानने वाला और हर बात का ज्ञानी है।

     

    इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह हिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई कहते हैं कि सारे मनुष्य चाहे वह पुरुष हों या महिला, एक मोती से पैदा किए गये हैं और विशिष्टता का मापदंड लिंग नहीं है बल्कि ईश्वरीय भय है। इस्लाम धर्म में पुरुष और महिला में कोई भी अंतर नहीं है। इस्लाम धर्म में पुलिंग या स्त्रीलिंग का कोई विषय नहीं है बल्कि मानवीय परिपूर्णता को पेश किया गया है। चूंकि दोनों की मानवीय अस्तित्व के भाग हैं और मानवीय व ईश्वरीय आयाम की दृष्टि से दोनों में कोई भी अंतर नहीं है। (जारी है)