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    सवेरे-सवेरे-२

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    क्या आपके पास नाश्ते का समय है? यदि है तो हम चाहते हैं कि आपको स्वस्थ्य बनाने वाले और बहुत ही ऊर्जा प्रदान करने वाले फल खजूर के बारे में कुछ बताएं। ताज़ा खजूर में विटामिनों, कैल्शियम, पोटेशियम, गंधक और लौह जैसे खनिज पदार्थों का भण्डार मौजूद होता है। नाशते में आप यदि एक खजूर खाने की आदत बना लें तो यह एसा है जैसे आपने अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए एक सेना अपने शरीर में प्रविष्ट कर दी हो। और अब स्वास्थ्य से ही संबन्धित एक अन्य बात।

    पैदल चलना एक एसे व्यक्ति के लिए जिसे किसी प्रकार के शारीरिक परिश्रम की आदत न हो, एक अच्छी शुरूआत है। परन्तु होता यह है कि टहलने या पैदल चलने को अधिक गंभीरता से नहीं लिया जाता। कहने का अर्थ यह है कि पैदल चलने के अपने नियम और सिद्धांत होते हैं। यदि उनका ध्यान न रखा जाए तो उसका सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आता। तो पैदल चलते समय आपको कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। जैसे जब टहलने जाएं तो अपनी गति एसी रखें कि पसीना आ जाए। कम से कम दस मिनट तक तेज़ चलें। एसे जूते पहनकर चलें जो पैदल चलने के लिए उचित हों। चलते समय पीठ को सीधा रखें और हाथों को एक-दूसरे के विपरीत दिशा में आगे पीछे करते रहें। आरंभ में पाचं से दस मिनट तक तेज़ चलें फिर धीरे-धीरे छह हफ़्ते में उसे तीस मिनट पर ले आएं। टहलने का समय यदि निर्धारित कर लिया जाए तो उसके बहुत अधिक सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं।

    कर्तव्य परायणता के संबन्ध में एक विशेष घटना

    इस्लामी गणतंत्र ईरान पर इराक़ द्वारा थोपे गए आठ वर्षीय लंबे युद्ध में ईरान की विजय ने पूरे विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया था क्योंकि विश्व की सभी पश्चिमी व पूर्वी शक्तियां, सारे पड़ोसी देश, सबके सब इराक़ के सद्दाम शासन का साथ दे रहे थे जबकि ईरान अपनी नई-नई इस्लामी क्रांति के साथ बिल्कुल अकेला था। इसका कारण ईश्वर की कृपा के साथ ही साथ ईरानी जनता की ईश्वर पर आस्था, इस्लामी क्रांति के प्रति निष्ठा और देश के लिए बलिदान की प्रबल भावना थी। आइए इस भावना का एक उदाहरण हम आपकी सेवा में प्रस्तुत करते हैं। वलफ़ज्र नामक सैनिक कार्यवाही के दौरान ईरान के स्वयंसेवी सिपाहियों को एक एसे क्षेत्र से गुज़रना था जहां पर इराक़ियों ने बारूदी सुरंगें बिछा रखी थीं। इन बारूदी सुरंगों या माइन्स को बड़ी तेज़ी से साफ़ करने की आवश्यकता थी। इस कार्य के लिए कई स्वयंसेवी स्वेच्छा से जाना चाह रहे थे। स्थिति यह थी कि सिपाही को उस क्षेत्र में इस प्रकार गुज़रना था कि उसके क़दमों के निशान दूसरों को सुरक्षित मार्ग का पता दें और यदि बारूदी सुरंग हो तो पैर पड़ते ही विस्फ़ोटित हो जाएगी और मार्ग दिखाने वाला शहीद हो जाएगा। शहादत को गले लगाने की भावना इतनी प्रबल थी कि हर सिपाही, मार्ग साफ़ करने के लिए अपना नाम दे रहा था और इस बात पर ज़िद कर रहा था कि उसको ही भेजा जाए। यह देखकर कमांडर ने सिपाहियों में से एक से कहा कि तुम, सबके नाम की पर्ची लिखो। जिसका नाम निकल आएगा उसी को भेजा जाएगा। सिपाही ने तेज़ी से परचियां बनाईं और नाम लिख डाले। लाटरी निकाली गई तो संयोग से लिखने वाले का ही नाम निकल आया। वह बड़ी प्रसन्नता से अपने साथियों के आगे बढ़ने के लिए सुरक्षित मार्ग प्रशस्त करने चल पड़ा और थोड़ी देर में ही वह शहीद हो गया। दुख में डूबे सिपाहियों ने उसके हाथ से लिखे नामों को देखने के लिए परचियां खोलीं तो यह देखकर सब चकित रह गए कि हर परची पर शहीद होने वाले ने अपना ही नाम लिखा था।

    अब हज़रत मरियम की कथा का दूसरा भाग

    हज़रत मरियम ईश्वर की शक्ति का महान उदाहरण थीं क्योंकि उनकी पवित्र माता “हन्ना” बांझ थीं और पिता हज़रत इमरान बहुत बूढ़े थे जब ईश्वर ने संतान की उनकी तीव्र इच्छा को देखकर उन्हें एक पवित्र और महान संतान प्रदान की। परन्तु हज़रत मरियम के जन्म से पूर्व ही उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। माता ने गर्भवती होते ही ईश्वर का आभार प्रकट करने के लिए यह वचन दिया था कि अपने बच्चे को ईश्वर की उपासना के महान स्थल की सेवा के लिए विशेष कर देंगी। हज़रत हन्ना ने जब पुत्री को जन्म दिया तो वह चिंतित हो उठीं कि उसे बैतुल मुक़द्दस में कैसे भेज सकेंगी। उस समय ईश्वर ने सुपुत्री के महान भविष्य से उन्हें अवगत करके हज़रत हन्ना को शान्ति प्रदान की। फिर हज़रत मरियम उस आयु तक पहुंच गयीं जब उन्हें बैतुल मुक़द्दस की सेविका बनना था। इस अवसर पर उनकी अभिभावक्ता हज़रत ज़करिया को प्राप्त हुई जो हज़रत हन्ना के बहनोई और उस काल के महान पैग़म्बर थे। हज़रत मरियम, बैतुल मुक़द्दस अर्थात पवित्र घर के ऊपरी भाग में रहते हुए हर समय ईश्वर की उपासना में लीन रहती थीं। हज़रत ज़करिया जब भी उनसे मिलने जाते तो उनके पास गर्मी में जाड़े के और जाड़े में गर्मी के ताज़ा फल देखकर आश्चर्य चकित रह जाते और साथ ही ईश्वर की महाशक्ति पर उनकी आस्था और सुदृढ़ हो जाती कि वह जिसे चाहता है असीम रोज़ी प्रदान करता है। उस समय के यहूदी बड़े ही कठोर हृदय वाले थे। वे जिन चीज़ों को अपनी आंखों से देखने केवल उनपर ही विश्वास करते थे। उन यहूदियों में बहुत से जादू-टोने में लिप्त रहते थे और कुछ लोग सोना-चांदी बनाने में जुटे हुए थे। सबके सब यहूदी धन-दौलत को हर वस्तु से अधिक महत्व देते थे। वे दिन प्रतिदिन हज़रत मूसा की शिक्षाओं से दूर होते जा रहे थे। यही कारण था कि ईश्वर ने उन्हें उनकी अचेतना से जगाने के लिए हज़रत इमरान और हज़रत हन्ना को बुढ़ापे में एक महान पुत्री प्रदान की और इसी प्रकार हज़रत ज़करिया को भी बुढ़ापे में एक पुत्र प्रदान किया। ईश्वर ने हज़रत मरियम को अत्यंत पवित्र बनाया था और उनको एसी निशानियां दी थीं जो भटके हुए लोगों की आंखें खोलने के लिए पर्याप्त थीं। हज़रत मरियम एकांत में उपासना में लीन थीं। उनका प्रकाशमई चेहरा चमक रहा था। आत्मा आकाशों और धरती के पालनहार के समक्ष नतमस्तक थी कि अचानक उनका कमरा एक अनोखे प्रकाश से जगमगा उठा। प्रकाश के घेरे में उन्होंने एक युवक को देखा। यह देखकर हज़रत मरियम भयभीत हो गईं और कहने लगीं। हे युवक, यदि तुम पवित्र हो तो मैं तुम्हारी बुराई से ईश्वर की शरण लेती हूं। उस युवक ने उत्तर दिया कि हे मरियम! मैं आपके पालनहार की ओर से आया हूं ताकि आपको एक पवित्र बेटा प्रदान करूं। हज़रत मरियम ने लज्जा भरे स्वर में कहा कि मुझे कैसे संतान हो सकती है जबकि मैंने किसी से विवाह नहीं किया है। फ़रिश्ते ने उत्तर दिया कि है मरियम मुख्य विषय यही है। आपके पालनहार ने कहा है कि यह कार्य मेरे लिए सरल है। मैं उसे लोगों के लिए तर्क और निशानी बनाऊंगा और वह मेरी ओर से कृपा है। यह कहकर फ़रिश्ता हज़रत मरियम के निकट आया। उसने उनके कुर्ते में फूंक मारी और दृष्टि से ओझल हो गया। हज़रत मरियम ने आभास किया कि एक महान आत्मा उनके पावन अस्तित्व में समा गई है। अब तक वह स्वंय ईश्वर का अदभुत चमत्कार थीं किंतु अब वे एक अन्य चमत्कार को जन्म देने वाली थीं जबकि वे स्वयं कुंवारी थीं। पवित्र क़ुरआन ने उनकी पवित्रता को यह कहकर सिद्ध किया है कि जिस ईश्वर ने हज़रत आदम व हव्वा को बिना माता-पिता के अस्तित्व प्रदान किया वह हज़रत ईसा को यदि बिना पिता के अस्तित्व प्रदान करता है तो इसमे अचंभे की क्या बात है? कथा का अगला भाग अगले कार्यक्रम में।