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    सवेरे-सवेरे-३

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    प्रातःकाल अर्थात जीवन का आरंभ। अतः इसे ईश्वर की याद से आरंभ होना चाहिए। आप कहेंगे कि ईश्वर की याद तो हमने सूर्योदय से पहले ही कर ली है। बहुत अच्छा किया है आपने। लेकिन हमारे मन मे इस समय जो बात ईश्वर के संबन्ध में है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। आइए पढ़ते हैं।

    आयतुल्लाह बहजत बहुत ही महान आध्यात्मिक व्यक्तित्व के स्वामी, बड़े पवित्र और ज्ञानी व्यक्ति थे। उनका स्वर्गवास अभी तीन-चार वर्ष पूर्व ही हुआ है। वे बताते हैं कि एक दिन वे अपने घर में अध्ययन आदि समाप्त करके किसी काम से बाहरी कमरे में गए तो वहां से बाहर गली मे बच्चों के खेलने की आवाज़ आ रही थी। इसी बीच किसी भिखारी की आवाज़ सुनाई दी जो एक छोटे बच्चे से कह रहा था कि मुझे अपने घर से कुछ लाकर देदो। बच्चे ने उत्तर में कहा कि तुम अपनी मां से मांगो वे देंगी। भिखारी की आवाज़ आई कि मेरी मां नहीं हैं तुम अपनी मां जी से मांग कर ले आओ। आयतुल्लाह बहजत कहते हैं कि बच्चे के अत्यंत भोलेपन से कहे गए शब्दों को सुनकर मैं इस सोच में पड़ गया कि बच्चे को मां पर कितना भरोसा होता है। वह सोचता है कि मां से जो भी मांगा जाए और जो भी अपनी मां से मांगे उसे अवश्य मिलेगा। यदि यही भावना और भरोसा हमें ईश्वर पर हो तो हमारा जीवन कितना सरल हो जाए और कठिनाइयों का भय हमारे मन से बिल्कुल निकल जाए।

    मित्रों, यदि आप कल सवेरे जब नींद से जागें और देखें कि अचानक आपका भार बीस किलो बढ़ गया है तो क्या होगा? निश्चित ही आप चिन्तित हो जाएंगे और तुरंत अस्पताल को फोन करेंगे। हेलो, मेरी सहायता करें मैं अचानक मोटा हो गया हूं। परन्तु यही घटना यदि धीरे-धीरे घटे। एक किलो इस महीने में, एक किलो अगले महीने में, एक किलो उसके बाद वाले महीने में तो फिर क्या आपकी प्रतिक्रिया यहीं होगी? स्पष्ट है कि नहीं। आप बिना किसी चिंता के समय बिताते रहेंगे। जो लोग दीवालिया हो जाते हैं, बहुत मोटे हो जाते हैं, वैवाहिक जीवन के बाद बात तलाक़ तक पहुंच जाती है, परीक्षा में फेल हो जाते हैं तो इस प्रकार की बातें एकदम से नहीं होतीं। ज़रा सा आज। ज़रा सा कल और फिर अचानक ज़ोरदार धामका विस्फोट और तब हम पूछते हैं कि एसा क्यों हुआ? देखिये जीवन में विभिन्न बातें, घटनाएं और आदतें एक के ऊपर एक, इकट्ठा हो जाती हैं और हमें इस बात का पता भी नहीं चल पाता। इसलिए हमकों चाहिए कि हर रोज़ अपने सामने यह प्रश्न रखें कि हम कहां जा रहे हैं? क्या पिछले साल, या पिछले महीने या पिछले सप्ताह की तुलना में हमारा जीवन अधिक स्वस्थ्य, अधिक व्यवस्थित और अधिक सफल है या नहीं? यदि उत्तर नकारात्मक है तो हमको तुरंत अपनी जीवनचर्या पर पुनर्विचार करना होगा। आइए अब आपको हज़रत यूनुस पैग़म्बर की कथा सुनाते हैं। इस प्रकार की सच्ची कहानियों में पूरी मानवता के लिए पाठ होता है इसलिए हम इस प्रकार की कहानियों से अपने कार्यक्रम को सुसज्जित करते हैं।

    दजला नामक नदी के तट पर नैनवा नामक एक नगर में आशूरी लोग रहा करते थे जिनकी संख्या लगभग एक लाख थी। यहां के लोगों का व्यवसाय कृषि और पशुपालन था। उसी नगर में हज़रत यूनुस का जन्म हुआ। जब वे बड़े हुए तो उनकी पवित्रता को देखकर ईश्वर ने उन्हें अपना प्रतिनिधि या दूसरे शब्दों में पैग़म्बर नियुक्त किया। हज़रत यूनुस, एकमात्र व अनन्य ईश्वर पर विश्वास रखते थे और इस बात से बहुत दुखी रहा करते थे कि उनके समाज में लोग ईश्वर के स्थान पर पत्थर की मूर्तियों की पूजा करते हैं और उनसे अपने जीवन में सहायता मांगते हैं। जबकि वास्तविकता तो यह है कि यह पत्थर न तो उनकी सहायता ही कर सकते हैं और न ही उन्हें कोई क्षति पहुंचा सकते हैं। एक दिन ईश्वर ने हज़रत यूनुस को आदेश दिया कि वे अपनी जाति वालों के पास जाएं और उन्हें अनन्य ईश्वर की उपासना का उपदेश दें। नैनवा के लोग बड़े सीधे-सादे थे। अपनी अज्ञानता के कारण वे प्राचीन काल से ही अनन्य ईश्वर के स्थान पर मूर्तियों की पूजा करते आ रहे थे इसलिए उनके लिए हज़रत यूनुस की बताई हुई बातों को समझना कठिन था। समय बीतता रहा। हज़रत यूनुस, अन्य ईश्वरीय पैग़म्बरों की ही भांति लोगों को अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में लाने के प्रयास करते रहे परन्तु अधिकतर लोगों ने हठधर्मी बरती और हज़रत यूनुस की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। यहां तक कि हज़रत यूनुस ने उन्हें ईश्वरीय प्रकोप से डराने का प्रयास किया और कहा कि यदि तुम अपनी हठ पर अड़े रहोगे तो मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि वह तुमको अपने प्रकोप का पात्र बनाए। लोगों ने जब उनकी धमकी को भी कोई महत्व नहीं दिया तो काफ़ी समय तक सयंम बरतने के पश्चात वे ईश्वर से जनता पर प्रकोप की प्रार्थना करके नगर से निकल गए। वे भूमध्य सागर की ओर चल पड़े। हज़रत यूनुस को निरंतर इस बात की आशा लगी हुई थी कि नैनवा नगर के अनेकेश्वर वादी अबतक ईश्वर के क्रोध का पात्र बन चुके होंगे। उन्हें अपने मार्ग में नैनवा की ओर से गुज़रकर आने वाला जो भी यात्री मिलता उससे वे नैनवा की स्थिति के बारे में अवश्य पूछते और उनको पता चलता कि वहां के लोग बिल्कुल कुशल हैं। यह सुनकर वे आश्चर्यचकित हो जाते और सोचने लगते कि उन लोगों पर से ईश्वर का प्रकोप क्यों टल गया? यही सब सोचते हुए वह भूमध्य सागर की ओर बढ़ते गए।

    दूसरी ओर नैनवा में हज़रत यूनुस के जाने के बाद क्या हुआ यह भी सुनिए। जब हज़रत यूनुस ने दुखी और क्रोधित होकर नैनवा नगर को छोड़ दिया और एक या दो दिन बीत गए तो लोगों ने भयंकर संकेतों और निशानियों का आभास किया। उन्होंने देखा कि आकाश पर काले धुएं जैसे भयानक बादल छाने लगे और स्थिति एसी होने लगी जैसे ईश्वरीय प्रकोप, नगर का विनाश करने वाला है। उन लोगों के बीच मौजूद एक पवित्र व्यक्ति ने लोगों को चेतित किया और उनसे कहा कि हे लोगो तुम जानते हो कि यूनुस भले मनुष्य और ईश्वर के दूत हैं। वे कभी झूठ नहीं बोलते। वे सदा ही तुम्हारा भला चाहते हैं। तुम उनका कहना मानो। अपने बच्चों और परिवार पर दया करो। अनन्य ईश्वर की प्रार्थना करो और विभिन्न वस्तुओं की पूजा करना छोड़ दो। नहीं तो ईश्वरीय प्रकोप तुमको घेर लेगा और इसके संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहे हैं।

    नैनवा के लोग यह बातें सुनकर तथा ईश्वर के प्रकोप के स्पष्ट रूप से संकेत देखकर पछताने लगे और हज़रत यूनुस को ढूंढने लगे ताकि उनके समक्ष अनन्य ईश्वर पर अपने ईमान और विश्वास की घोषणा कर सकें साथ ही अपने ग़लत कर्मों पर पश्चाताप करें। परन्तु हज़रत यूनुस का कहीं पता नहीं था।

    नैनवा में मौजूद उस पवित्र व्यक्ति ने लोगों से कहा कि अब जबकि हज़रत यूनुस तुम्हारी ओर से निराश होकर इस नगर से चले गए हैं तो सब लोग इस नगर के बड़े मैदान में एकत्रित होकर अनन्य ईश्वर पर अपने ईमान की घोषणा करो। अपने ग़लत कर्मों पर रो-रो कर तौबा और प्रायश्चित करो। शिशुओं को माताओं से अलग कर दो ताकि वे भी रोएं और इस प्रकार ईश्वर की कृपा को अपनी ओर उन्मुख करो क्योंकि ईश्वर अपनी रचनाओं से अत्याधिक प्रेम करता है और अपने भले बंदों को विनाश से बचाता है। लोगों ने वैसा ही किया जैसा उस भले व्यक्ति ने उनसे कहा था। थोड़ी ही देर में धुएं जैसे भयानक बादल छंटने लगे और ईश्वरीय क्रोध के चिन्ह मिटने लगे। आकाश नीला हो गया। चारों ओर प्रकाश फैल गया और लोगों में संतोष व्याप्त होने लगा। अब दोबारा सबको हज़रत यूनुस की याद आने लगी। परन्तु यह कोई नहीं जानता था कि वे कहां हैं? इसके बाद हज़रत यूनुस ने क्या किया, वे अपनी जाति की ओर लौटे या नहीं आदि यह सब जानने के लिए आप अलगा कार्यक्रम अवश्य पढ़ें।

    विलियम शैक्सपियर आपसे क्या कहते हैं? वे कहते हैं कि मैं सदैव प्रसन्न रहता हूं। जानते हैं क्यों? क्योंकि मैं किसी से कोई आशा व अपेक्षा नहीं रखता। दूसरों से आशा लगाने से मन को दुख पहुंचता है, जीवन की अवधि कम होती है अतः जीवन से प्रेम करो, प्रसन्न रहो और मुस्कुराओ। बात करने से पहले बात सुनो। लिखने से पूर्व सोचो। ख़र्च करने से पूर्व आय की व्यवस्था करो। घृणा से पहले प्रेम व स्नेह करो। जीवन यही है। उसका आभास करो। जिओ और जीवन का आनंद उठाओ।