islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सवेरे-सवेरे-८

    सवेरे-सवेरे-८

    Rate this post

    आप से हम एक बात पूछना चाहते हैं, क्या आप उत्तर देने के लिए तैयार हैं? यदि तैयार हैं तो बताइए कि आप आशीर्वाद और दुआ में कितना विश्वास रखते हैं? अधिक, कम या बिल्कुल नहीं। अच्छा तो यह बताइये कि आप दूसरों की सहायता करते हैं या नहीं? इस कार्य में आप विशवास रखते हैं या नहीं? थोड़ा सोचिए और फिर उत्तर दीजिए। देखिए अनेक लोगों का यह मानना है कि जब आप किसी की सहायता करते हैं तो उस व्यक्ति विशेष के चेहरे पर उत्पन्न होने वाला संतोष आपको आनंद प्रदान करता है। एसे में आप प्रसन्नता का आभास करते हैं। अब यदि वह व्यक्ति आपको दुआ देता है तो आप और भी प्रसन्न हो जाते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अधिकतर लोग आशीर्वाद और दुआ मे विश्वास रखते हैं और उसे अपने जीवन में प्रभावी मानते हैं। दुआ यदि माता-पिता या घर के दूसरे बड़े-बूढ़ों के मुंह से निकले तो वह और अधिक प्रभावशाली होती है। इसके अतिरिक्त यदि आप कोई अच्छा काम या बड़े-बूढ़ों की सेवा करके उन्हें प्रसन्न कर दें और वे मुंह से तो कुछ भी न कहें बल्कि चेहरे के हावभाव से भी अपनी प्रसन्नता न दिखाएं तब भी उनकी हार्दिक प्रसन्नता आपके जीवन की मिठास और आपकी सफलता की ज़मानत बन जाती है क्योंकि बूढ़ों और कमज़ोर लोगों के अनकहे शब्द भी ईश्वर तक तुरंत पहुंचते हैं और प्रभावी सिद्ध होते हैं। संभवतः इसीलिए कहा जाता है कि घर के बड़ों-बूढ़ों और बीमारों पर विशेष ध्यान दो क्योंकि वे तुम्हारे घर में ईश्वरीय कृपा और विभूतियों के उतरने का कारण होते हैं। यही नहीं मुहल्ले में या अपने पड़ोस में यदि कोई वृद्ध है तो समझ लें कि उसका असतित्व आसपास के लोगों के लिए ईश्वर की कृपा का कारण बनता है। आप उसकी जितनी सहायता और जितना सम्मान करेंगे ईश्वर उतना ही आप पर कृपा दृष्टि डालेगा। यह कार्य एक ओर आपके मन को शांति प्रदान करता है, साथ ही मानवाधिकारों के सम्मान के कारण लोगों में आपका सम्मान बढ़ता है और फिर आपके बच्चे आपके स्वभाव से यह सीखते हैं कि बढ़े- बूढ़ों का सम्मान करना आवश्यक ही नहीं बल्कि उनका दायित्व भी है। इस प्रकार आपको अपने बुढ़ाने की ओर से भी चिंता नहीं रह जाएगी। तो फिर आइए हम दृढ़ संकल्प करें कि अपने माता-पिता और बड़े-बूढ़ों के सम्मान को अपना कर्तव्य समझेंगे और उस कर्तव्य को पूरा करने का पूरी शक्ति के साथ प्रयास करेंगे।

    अब हम बात करने जा रहे हैं एसे बच्चों के प्रशिक्षण की जो माता-पिता का ध्यान निरंतर अपनी ओर केन्द्रित रखना चाहते हैं। अधिकतर बच्चों में इसका कारण यह होता है कि माता-पिता में से कोई एक, बच्चे पर अधिक ध्यान नहीं दे पाता। दूसरा कारण यह होता है कि बच्चा, माता-पिता दोनों या कम से कम एक पर बहुत अधिक निर्भर होता है परन्तु सबसे अधिक महत्वपूर्ण कारण यह होता है कि माता-पिता, बच्चे के आदेशापालन के लिए तत्पर रहते हैं और बच्चा जो कुछ चाहता है उनसे करवा लेता है। अच्छे माता और पिता वे होते हैं जो बुद्धि से काम लेते हुए बच्चे की इच्छाओं की पूर्ति में संतुलन बनाए रखते हैं। बच्चे की इच्छापूर्ति जहां भी उनके लिए लाभदायक होती है उसे बड़े प्रेम के साथ पूरा करते हैं और जहां पर उसकी इच्छा हानिकारक होती है वहां पर बहुत ही ठोस और दृढ़ रूप में उससे इन्कार कर देते हैं जैसे कड़ी दृष्टि से उसको देखना या उसकी बातों को अनदेखा करना आदि। कुछ माता-पिता अन्जाने में बच्चों के हित को ध्यान में रखे बिना बस उसे प्रसन्न रखने को और उसकी इच्छापूर्ति को अपना लक्ष्य बना लेते हैं। एसे माता और पिता, व्यवहारिक रूप से स्वयं को बच्चे का आज्ञाकारी दास बना लेते हैं। एसा बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है वह अधिक स्वार्थी बनता जाता है। आज्ञाकारी दास रूपी माता-पिता अपने ही बच्चों के सौभाग्य की जड़ों को काट देते हैं और अपने अनियंत्रित प्रेम के कारण बच्चे को दुर्भाग्य की ओर ढ़केल देते हैं। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि सीमा से अधिक प्रेम, बच्चों पर कड़ाई करने तथा उनपर ध्यान न देने से अधिक ख़तरनाक होता है। बच्चा जितना बड़ा होता जाता है, माता-पिता को प्रेम के साथ उसे यह समझाते रहना चाहिए कि यह प्रेम और उसपर ध्यान दिया जाना सदैव जारी नहीं रहेगा और उसे आत्मनिर्भर होना चाहिए। हमारे बच्चों का व्यक्तित्व उस समय स्वस्थ्य माना जाता है जब उसमें दो विशेषताएं मौजूद हों। पहली विशेषता, वास्तविकताओं और सीमित्ताओं को पहचानना और उन्हें स्वीकार करना है और दूसरी विशेषता उसकी सोच से संबन्धित है इस अर्थ में कि उसे यह ध्यान में रखना चाहिए कि हर बात उसकी इच्छानुसार नहीं होगी। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे को यदि यह अंदाज़ा हो जाता है कि वह किसी न किसी प्रकार आपसे अपनी बात मनवा लेगा तो फिर वह आपके “नहीं” कहने पर ध्यान ही नहीं देगा चाहे आप सौ बार “नहीं” कहते रहें। वह इतना रोएगा और इतनी ज़िद करेगा कि अंत में आपको हां कहना ही पड़ जाए। बच्चे को आपके व्यवहार से यह ज्ञात हो जाना चाहिए कि अब जबकि आपने नहीं कह दिया है तो उसे हां में बदला नहीं जा सकता। आप स्पष्ट रूप से बता दीजिए कि जो बात वह मनवाना चाहता है उसे आप नहीं करेंगे या आवश्यकता पड़ने पर बाद में करेंगे। इसी के साथ जब बच्चा आपके इन्कार को मान ले तो उसकी प्रशंसा अवश्य करें ताकि उसका यह सकारात्मक व्यवहार सुदृढ़ हो सके।

    अब कुछ बातें हो जाएं विटमिनों के ख़ज़ाने के बारे में। जी हां। ख़रबूज़ा एसे ही ख़ज़ानों में से एक है। ख़रबूज़ें में विटमिन-ए और विटमिन-सी प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। इसके अतिरिक्त इसमें पोटेशियम, मैगनीशियम और विटमिन-बी भी मौजूद होता है। इस फल को खाने से हृदय रोग, कैंसर और पक्षाघात का ख़तरा बहुत कम हो जाता है या फिर नहीं रहता है। विटमिन-बी गुट के विटामिनों की उपस्थिति के कारण ख़रबूज़ा, शरीर में चर्बी को गलाकर ऊर्जा उत्पन्न करने का काम करता है। इसी प्रकार से ख़रबूज़े के प्रयोग से भूख बढ़ती है और शरीर की त्वचा में तरावट और निखार आता है। इसके अतिरिक्त ख़रबूज़ा खाने से ख़ून की कमी भी दूर होती है। यहां पर ध्यान योग्य बात यह है कि मधुमेह के रोगियों को इसके प्रयोग में सावधानी बरतनी चाहिए। उचित यह है कि या तो ख़रबूज़े का प्रयोग न करे और यदि प्रयोग करना हो तो चिकित्सक से परामर्श अवश्य कर ले।