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    सवेरे-सवेरे-10

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    हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि सबसे अधिक प्रसन्नचित व्यक्ति वह है जिसका आचरण शिष्ट हो।

     

    शिष्ट आचरण तभी होता है जब मनुष्य की मानसिक व हार्दिक स्थिति शांत हो।  यूं तो हर मनुष्य यह चाहता है कि उसका जीवन और जिस स्थान पर वह जीवन व्यतीत कर रहा है उसका वातावरण शांत एवं आनंदमय हो परन्तु कुछ लोगों की मानसिकता एसी होती है जो उनके व्यवहार को प्रभावित करके स्वयं उनके तथा अन्य लोगों के लिए वातावरण को अनुचित बना देती है।

     

    ग़लत मानसिकता और ग़लत सोच उत्पन्न करने वाली एक भावना ईर्ष्या है।  ईर्ष्या, एक एसी मानसिक उथल-पुथल या मानसिक प्रक्रिया का नाम है जो लगभग दो वर्ष की आयु से आरंभ होती है और यह समय के साथ-साथ बढ़ती रहती है।  संभव है कि यह आगे चलकर विभिन्न रूपों में सामने आए।  ईर्ष्या के कारक का संबन्ध, प्रत्येक व्यक्ति में उसकी स्थिति और स्थान, उसके वातावरण तथा सामाजिक संपर्क से होता है।  यही कारण है कि ईर्ष्या के कारक को स्वयं व्यक्ति विशेष के भीतर ही ढूंढा जाए।  कभी-कभी एसा होता है कि एक बच्चा अपने सभी भाई-बहनों से प्रतिस्पर्धा करता है।  यह बात ईर्ष्या के लिए उचित भूमिका तैयार करती है।  जबकि यह भी देखने में आता है कि अनेक परिवारों में माता-पिता, विभिन्न कारकों से जैसे बच्चे के अच्छे व्यवहार, सुन्दरता, पढ़ाई में बहुत अच्छा होना या शारीरिक अपंगता के कारण किसी एक बच्चे पर विशेष ध्यान देते हैं जिससे दूसरे बच्चों में ईर्ष्या उत्पन्न हो जाती है।  ईर्ष्या का एक चिन्ह क्रोध होता है।  ईर्ष्या करने वाला, जिससे ईर्ष्या करता है उसपर क्रोध प्रकट करके ईर्ष्या की भावना को प्रकट करता है।  जैसे अपमान करना, दुख देने वाली बातें कहना आदि।  यह स्थिति बच्चों से अधिक बड़ों में दिखाई देती है।

     

    ईर्ष्या की भावना वास्तव में एक ख़तरनाक बीमारी से कम नहीं होती अतः इसका उपचार आवश्यक होना चाहिए।  यह बीमारी ईर्ष्या करने वाले की शारीरिक और मानसिक दोनो प्रकार की स्थितियों को क्षति पहुंचाती है।

     

    अब हम बात करना चाहते हैं बच्चों के प्रशिक्षण के संबन्ध में।  बच्चों के प्रशिक्षण के संबन्ध में यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण होती है कि उनकी इच्छा और मांगों की पूर्ति कैसे की जाए।  देखने में यह आता है कि विभिन्न परिवारों में बच्चों की मांगों की पूर्ति के लिए तीन शैलियां अपनाई जाती हैं।  पहली शैली तो यह होती है कि बच्चा जो कुछ मांगता और चाहता है उसे माता-पिता बिना कोई प्रश्न पूछ उसे दे देते हैं।  इस प्रकार वे उसे यह सिखाते हैं कि अधिक से अधिक मांगने में उसे पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है।  इस प्रकार के बच्चे घर में चौधराहट करने लगते हैं।  वे कभी यह नहीं सोचते कि दूसरों के विचार या दूसरों की भावनाओं का भी कोई महत्व होता है।  इसके अतिरिक्त बड़े होकर यह बच्चे जब समाज में प्रविष्ट होते हैं और जब उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं या उतनी सरलता से पूरी नहीं होतीं जिसकी उन्हें आदत थी तो वे सामाजिक कार्यों में दूसरों की सहायता नहीं कर पाते।  एसे बच्चे धीरे-धीरे अकेले पड़ जाते हैं।  आजकल देखने में यह आता है कि माता-पिता अपने कार्यों में व्यस्त होने के कारण बच्चे की मानसिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते।  यही कारण है कि इस प्रकार के माता-पिता, विभिन्न वस्तुएं ख़रीदकर यह प्रयास करते हैं कि जैसे भी हो बच्चों को प्रसन्न रखा जाए और उन्हें किसी भी कमी का आभास न होने दिया जाए।  यहां पर ध्यानयोग्य बिंदु यह है कि बच्चे की हर मांग और उसकी हठ के आगे झुक जाने से उसके भीतर अपनी बात को मनवाने और दूसरों की अनदेखी करने की बुरी आदत दृढ़ होती जाती है जिसे बाद में नियंत्रित करना कठिन हो जाता है।

     

    प्रशिक्षण की दूसरी शैली में यह देखा जाता है कि माता-पिता अपने बच्चों की मांगों को कोई महत्व ही नहीं देते और बिना किसी तर्क और कारण के उनकी इच्छाओं को दबा देते हैं।  एसे में बच्चा यह समझने लगता है कि उसे कुछ मांगने का अधिकार ही नहीं है।  इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि इस प्रकार के वातावरण में पलने वाले बच्चे का आत्मविश्वास समाप्त हो जाता है और उसमें यह आदत पड़ जाती है कि उसके बारे में दूसरे लोग नर्णय लें।  एसे बच्चे की रचनात्मकता समाप्त हो जाती है और वह अपनी सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करना तो दूर उन्हें प्रस्तुत भी नहीं कर सकता।

     

    बच्चों के प्रशिक्षण की तीसरी शैली यह है कि माता-पिता की ओर से बच्चे की मांग का उत्तर तर्कपूर्ण और मांग के अनुसार होना चाहिए।  बच्चों की सभी मांगें माता-पिता के लिए स्वीकार्य नहीं होतीं।  उनका व्यवहार एसा होना चाहिए कि बच्चा समझ सके कि हर काम उसकी इच्छानुसार नहीं हो सकता।  उसकी कुछ मांगें तो पूरी हो सकती हैं किंतु वे मांगें भी परिवार के नियमों, सिद्धांतों और स्थिति के अनुरूप हों।  माता-पिता को भी बच्चे की मांग पूरी न होने की स्थिति में उन्हें स्पष्ट शब्दों में उत्तर देना चाहिए।  घुमाफिरा कर बात करने और बहाने बनाने से सदैव दूरी करनी चाहिए।  बच्चे को यह सिखाए की सदैव माता पिता से वे इन्कार का कारण पूछने की कोशिश न करें।

     

     

    अलज़ाइमर पर खाद्य पदार्थों का प्रभाव

    यदि हम इस बात पर ध्यान देने लगें कि हम जो कुछ खाते-पीते हैं उसे केवल स्वाद के लिए नहीं होना चाहिए बल्कि उसमें स्वास्थ्य को दृष्टिगत रखा जाए तो यह चेतना हमें अनेक ख़तरनाक रोगों से बचा सकती है।

     

    आप देखें कि एक अत्यंत दुखदायी रोग है अल्ज़ाइमर।  इस बीमारी में रोगी की अस्थाई स्मरण शक्ति कमज़ोर हो जाती है।  एसे रोगी को पुरानी बातें किसी सीमा तक याद रहती हैं किंतु नई बातें उसे याद नहीं रह पातीं।  एसा व्यक्ति एक बार कोई बात कहकर भूल जाता है और फिर बार-बार उस बात को दोहरता है।  इस प्रकार वह स्वयं से अधिक दूसरों को कष्ट देता है।  धीरे-धीरे एसे रोगी की स्थिति जब अधिक ख़राब हो जाती है तो वह अपना नाम और पता तक भूल जाता है।  यदि कोई व्यक्ति यह चाहता है कि वह इस रोगे मे ग्रस्त न हो और यदि हो भी जाए तो इसकी गति कम करने के लिए उसे कुछ खाद्य पदार्थों की विशेषताओं पर ध्यान देना चाहिए।  जैसे मूंगफली, बादाम, सूरजमुखी के बीज और पिंथल फल या हेज़ेल नट का प्रयोग बहुत लाभ दायक होता है।  इसका कारण यह है कि इसमें विटमिन-ई अधिक मात्रा में पाया जाता है।  जिन खाद्य पदार्थों में विटमिन-ई होता है उनमें एंटी आक्सीडेंट्स होते हैं जो मस्तिष्क एवं स्नायुतंत्र की कोशिकाओं की सक्रियता को बढ़ाते हैं और स्वतंत्र होने वाले रेडिकल्ज़ के ख़तरे से शरीर की कोशिकाओं को बचाते हैं।

     

    विटमिन-सी भी स्नायुतंत्र की कोशिकाओं को शक्ति प्रदान करता है और शरीर की सुरक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।  फल और तरकारियां भी जैसे नीबू, संतरा तथा इसी परिवार के अन्य फल और स्ट्राबेरी, अनार, टमाटर, ब्राकली, गाजर, प्याज़ और सोया में फ़लानोएड बड़ी मात्रा में होता है।  समय से पूर्व बुढ़ापा आने को रोकने और स्मरण शक्ति को बढ़ाने में ये महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

     

    स्मरण शक्ति को बढ़ाने में ओमेगा-३ फैटी एसिड्स की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण होती है।  यह पदार्थ स्नायुतंत्र की कोशिकाओं की ऊपरी सतह की रक्षा करते हैं जिससे मानव मस्तिष्क अपना काम उचित ढंग से करता है।  ओमेगा-३ एसिड का उत्तम स्रोत, सालोमन व सारडीन नामक मछलियां और झींगा जैसे पानी के जीव हैं।  इसके अतिरिक्त सोया, मूंगफली के तेल, ज़ैतून के तेल में भी ओमेगा-३ फैटी एसिड प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

     

    जिन लोगों के शरीर में ख़ून की कमी होती है उनके मस्तिष्क को आक्सीजन उचित मात्रा में नहीं पहुंच पाती।  एसे लोग भी स्मरण शक्ति के कमज़ोर पड़ जाने के कारण अल्ज़ाइमन का शिकार हो सकते हैं।  शरीर में ख़ून की कमी को दूर करने के लिए उसमें लौह तत्वों का पहुंचना आवश्यक है।  पीच या ख़ूबानी, आलूचा, बकरी-भेड़ और गाय आदि का मास, दालें, सोया, कद्दू के बीज आदि में तथा मछली और झींगे आदि में भी लोहा प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।  इन वस्तुओं का सेवन करके ख़ून की कमी को दूर किया जा सकता है।

     

    आपको अपने ख़ानों में भूसी वाले अनाज, सोया, लूबिया, गहरे हरे रंग वाली तथा पीले रंग वाली सब्जियां और तरकारियां, दालें, मांस और पनीर आदि को सम्मिलित करना होगा क्योंकि इनमें जस्ता या ज़िंक होता है जो मस्तिष्क विशेषकर स्मरण शक्ति के लिए बहुत लाभदायक है।  सप्ताह में दो या तीन बार मछली का सेवन करके और इसी प्रकार से पहले बताई गई वस्तुओं के साथ-साथ एवोकेडो नामक फल भुट्टे के दाने और आलू के सेवन एवं अंडे तथा हरी चाय के सेवन से अल्ज़ाइमर को रोकने में बड़ी सहायता मिलती है।