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    सवेरे सवेरे-15

    सवेरे सवेरे-15
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    इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम का कहना है कि ईश्वर में पूर्ण विश्वास रखने वाला व्यक्ति, ज्ञान तथा विनम्रता को एक-दूसरे से मिश्रित रखता है। इस कथन के अनुसार वास्तविक ज्ञानी वह होता है जो विनम्र हो। ज्ञानी की विनम्रता बताती है कि वह ज्ञान की किस सीढ़ी पर है क्योंकि नया-नया ज्ञान प्राप्त करने वाले स्वयं को बुद्धिमान और अन्य सभी लोगों को अज्ञानी समझता है। उसकी चाल-ढाल, बातचीत और अन्य बातों से पता चलता है कि वह लोगों को बताना चाहता है कि सबसे अधिक शिक्षित है। इस प्रकार वह घमण्ड के रोग में ग्रस्त हो जाता है। ज्ञान की दूसरी-तीसरी सीढ़ी पर पहुंचकर उसे लगता है कि कुछ दूसरे लोग भी हैं जिन्हें थोड़ा बहुत ज्ञान है। इसी प्रकार अगली सीढ़ियों पर पहुंचते-पहुंचते उसका भ्रम कम होने लगता है।

    यह व्यक्ति जब ज्ञान की कुछ ऊंचाई तक पहुंच जाता है तब उसे लगता है कि दूसरे लोग मुझसे अधिक ज्ञान रखते हैं और तब उसका घमण्ड टूट जाता है। यह व्यक्ति जब ज्ञान के शिखर के निकट पहुंचता है तो उसे एसा लगता है कि ईश्वर ने असीम ज्ञान इस ब्रहमांड में बिखेर रखा है और तब वह स्वयं को पूर्ण अज्ञानी पाता है। यह स्थिति घमण्ड को दूर करके उसे विनम्र बना देती है। अब वह समझता है कि जब संसार में मौजूद ज्ञान इतना अधिक है तो ज्ञान के स्रोत अर्थात ईश्वर का ज्ञान कितना होगा?
    यही सोच उसे ईश्वर का प्रेमी बना देती है और वह अपने ज्ञानदाता के समक्ष, सिर झुकाने पर विवश हो जाता है। इसी विशुद्ध विचारधारा के स्वामी और प्रेम भावना रचने वाले व्यक्ति को मोमिन कहते हैं क्योंकि उसे ज्ञान भी होता है ईश्वर के समक्ष स्वयं को तुच्छ समझने की भावना भी।
    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के सुपुत्र इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम लोगों को गुरू के अधिकारों से अवगत कराते हुए कहते हैं कि आपके गुरू का आप लोगों पर यह अधिकार है कि उनका आदर करें, उसकी बातों को ध्यानपूर्वक सुनें, उसके सामने अपनी आवाज़ ऊंची न करें। यदि कोई उससे प्रश्न पूछे तो आप उसका उत्तर न देने लगें। गुरू की उपस्थिति में किसी अन्य से बातचीत न करें, उनके समक्ष किसी की बुराई न करें, यदि कोई उनकी बुराई करता है तो आप गुरू का समर्थन करें, उनकी बुराइयों को छिपाएं और उनकी अच्छी बातों का उल्लेख करें। गुरू के शत्रुओं के साथ उठना-बैठना न रखें और उसके मित्र से शत्रुता न करें। आपने यदि इस प्रकार का व्यवहार किया तो ईश्वर के फ़रिश्ते गवाही देंगे कि आप ईश्वर के लिए उस गुरू की सेवा में गए थे और उससे ज्ञान प्राप्त किया था न कि लोगों के दिखावे के लिए।
    कहानीः- एक बूढ़ी महिला ने अपने घर में पुताई करने के लिए एक मज़दूर बुलाया। मज़दूर जब महिला के घर में प्रविष्ट हुआ तो उसने देखा कि उस घर में एक वृद्ध पुरूष भी है जो नेत्रहीन है। यह स्थिति देखकर उसे उन दोनों पर बहुत दया आई। आठ-दस दिनों तक वह उन बूढ़े पति-पत्नी के घर में काम करता रहा। इस अवधि में वह काम करते हुए बूढ़े व्यक्ति से बातचीत भी करता था। इस प्रकार दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई। मज़दूर ने देखा कि बुढ़ापे और नेत्रहीन होने के बावजूद वह बूढ़ा व्यक्ति बहुत ही आशावान और प्रसन्नचित रहता है। घर की पुताई का काम समाप्त करने के पश्चात मज़दूर ने जब अपना बिल उस बूढ़ी महिला को दिया तो वह उसे देखकर आशचर्यचकित रह गई। बिल में लिखी हुई राशि, उस राशि से बहुत कम थी जिसपर आरंभ में समझौता हुआ था। बूढ़ी महिला ने मज़दूर से कहा कि तुमने इतना परिश्रम किया, कई दिनों का समय लगाया तो फिर इतने कम पैसे क्यों ले रहे हो? मज़ूदर ने उत्तर दिया कि आपके घर में काम करते हुए मैं आपके पति से भी बातचीत करता था और उनकी बातें मुझको बहुत प्रसन्न करती थीं और आशावान बनाती थीं। जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण और उनकी सोच को देखकर मैंने अनुमान लगाया कि मेरी स्थिति, उतनी बुरी नहीं है जितनी मैं समझता था और जीवन उतना कठिन भी नहीं है जितना मैं सोचता था। सोच के इसी परिवर्तन के कारण मैंने आप लोगों से कम पैसे लिए ताकि इस प्रकार मैं आपके पति का आभार प्रकट करूं। बूढ़ी स्त्री मज़दूर, के इस व्यवहार से बहुत प्रभावित हुई और रोने लगी क्योंकि वह देख रही थी कि मज़दूर का बस एक ही हाथ है।
    भाइयों और बहनों आप बताइये कि क्या आप जीवन का दुखड़ा रोते रहने वालों में से हैं या दूसरों को आशावान बनाने वालों में। आज से जीवन को सकारात्मक दृष्टि से देखना आरंभ करें। यदि एसा नहीं किया है तो अबसे एसा करें और देखें कि आपका मन कितना स्वस्थ होता है और लोग आपको कितना पसंद करने लगते हैं।
    हिपैटाइटिस क्या है?

    हिपैटाइटिस वास्तव में वाइरस से फैलने वाली एक वाइरल बीमारी है जो यकृत या लिवर पर आक्रमण करती है। विभिन्न प्रकार के वाइरस हिपैटाइटिस-ए, हिपैटाइटिस-बी, हिपैटाइटिस-सी एवं हिपैटाइटिस-डी का कारण बनते हैं। हिपैटाइटिस-बी और सी में यकृत काम करना छोड़ देता है इसलिए उसपर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। रक्त या ख़ून के किसी तत्व व भाग के एक शरीर के दूसरे में स्थानांतरण से, या एक ही सिरिंज के कई लोगों द्वारा प्रयोग किये जाने या फिर क़ैंची, अस्तूरे को बिना स्ट्रैलाइज़ किये विभिन्न लोगों के लिए प्रयोग करना आदि हिपैटाइटिस के फैलने का कारण बन सकता है।
    यह बीमारी घातक रूप में या फिर नज़्ले, ज़ुकाम, जाड़ा-बुख़ार, पेशाब के गहरे रंग एवं आंखों की पीलाहट के रूप में सामने आती है और कुछ सप्ताहों के पश्चात स्वयं ठीक हो जाती है। कुछ वाइरल बीमारियां, विशेष संकेतों और पहचानों के साथ नहीं होतीं। हिपैटाइटिस में ग्रस्त रोगी की ओर से यदि लापरवाही बरती जाए तो लंबी अवधि में हो सकता है कि हिपैटाइटिस, साइरोसिस या यकृत के कैंसर में परिवर्तित हो जाए।
    इस रोग से बचाव के लिए परिवार के सभी लोगों को हिपैटाइटिस का टीका लगवाना चाहिए। यदि गर्भवती महिला इस रोग में ग्रस्त हो तो बच्चे के जन्म के समय टीका लगवा लेने से यह रोग बच्चे में स्थानांतरित नहीं होता।

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