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    सवेरे-सवेरे-20

    सवेरे-सवेरे-20
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    रमज़ान के पवित्र महीने में प्रतिदिन कुछ विशेष दुआएं पढ़ी जाती हैं। इन्हीं दुआओं में से एक का अनुवाद इस प्रकार हैः “हे ईश्वर! आज के दिन मुझको चेतान व ज्ञान प्रदान कर और इस दिन मुझे बुद्धिहीनता और असत्य से दूर कर दे।  हर भलाई जो आज के दिन तू उतारे उसमें मेरा हिस्सा भी लगा दे।  तुझे तेरी कृपा की सौगंध।  हे कृपा करने वालों में सबसे अधिक कृपा करने वाले।

    इस प्रार्थना में हम ईश्वर से यह इच्छा व्यक्त करते हैं कि हमें चेतना और ज्ञान प्रदान करे तथा अज्ञानता से दूर कर दे।  इस्लामी शिक्षाओं में अज्ञान लोगों की अनेक विशेषताएं बताई गई हैं जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं।  पूरा प्रश्न सुने बिना ही उत्तर देना, वास्तविकता जाने बिना बहस और झगड़ा करना, जिस विषय के बारे में पर्याप्त ज्ञान न हो उसके बारे में फैसला करना, व्यवहार में संतुलन न रखना, अपनी इच्छाओं और मनगढ़ंत बातों पर भरोसा करके काम करना आदि।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि अज्ञानता हर बुराई की जड़ है और कम बुद्ध रखने वाला व्यक्ति, संकीर्ण विचारों वाला होता है।  एक अन्य स्थान पर हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि अज्ञानी वह है जो, जिन चीज़ों को नहीं जानता उनके बारे में भी स्वयं को ज्ञानी मानता है और अपने विचारों को ही पर्याप्त समझता है।  एसे व्यक्ति का यदि कोई विरोध करता है तो वह उसे ग़लती पर मानता है।  यह व्यक्ति जिस बात को नहीं जानता उसे रद्द कर देता है, वास्तविकता को नकारता है और हठधर्मिता करता है।  वह ज्ञान प्राप्त करने में घमण्ड करता है।

     

     

    सातवीं हिजरी शम्सी के विश्वविख्यायत कवि मौलाना रोम अपनी किताब मसनवी में लखते हैं कि एक दिन हज़रत ईसा मसीह बहुत तेज़ी से दौड़ रहे थे।  मार्ग में किसी ने उन्हें देखा तो पूछा कि आप इतनी तेज़ी से क्यों दौड़ रहे हैं? उत्तर में उन्होंने कहा कि मैं मूर्ख लोगों से दूर होने के लिए दौड़ रहा हूं।  उस व्यक्ति ने कहा कि क्या आप वही मसीह नहीं हैं जो अंधों और बहरों को ठीक करते हैं, अनदेखी बातें जानते हैं और ईश्वर का नाम लेकर मुर्दों को जीवित करते हैं।  आप मिट्टी से जीवित पक्षी बनाते हैं?  फिर आप मूर्ख लोगों से इस प्रकार क्यों भाग रहे हैं? हज़रत ईसा ने उत्तर दिया कि मैंने जो कुछ किया है वह ईश्वर के नाम और उसकी अनुमति से किया है।  उन्होंने कहा कि अपनी समस्त कृपा के साथ मैंने अज्ञानी व मूर्ख व्यक्तियों के लिए हज़ारों बार दुआ की परन्तु उनका उपचार नहीं हो सका।

    वह व्यक्ति कभी भी ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता जो कुछ नहीं जानता और यह भी नहीं जानता कि वह नहीं जानता है।  एसे व्यक्ति को महा अज्ञानी कहते हैं।

    आइए अब हम अपना निरीक्षण करें।  दूसरों की बातों को ध्यान से सुनें और फिर यह देखें कि हमको क्या नहीं आता? बहुत सी बातें एसी होती हैं जिनका हमें ज्ञान नहीं होता।  एसी बातों को पूछना कोई बुरी बात नहीं है।  आप पूछें और अपने ज्ञान में वृद्धि करें।

    अब प्रस्तुत है एक लघुकथाः शीत ऋतु थी।  पहाड़ बर्फ़ से ढंके हुए थे और पहाड़ी नदियों के उफान ने गावं को दूसरे क्षेत्रों से जोड़ने वाली सड़क को भी तोड-फोड़ कर तबाह कर दिया था।  एसे में जब गांव में खाद्य सामग्री के अभाव का आभास किया गया तो अब इसके अतिरिक्त कोई अन्य साधन ही नहीं था कि गांव वाले, रोटी और गेहूं को बचा-बचा कर ख़र्च करें।  इस काम के लिए एक बड़े गोदाम का प्रबंध किया गया और गांव का सारा गेहूं उस गोदाम में सुरक्षित कर दिया गया।  साथ ही एक व्यक्ति को गोदाम का रखवाला और लोगों के बीच गेहूं बांटने का ज़िम्मेदार बना दिया गया।  थोड़ी ही देर में यह समाचार पूरे गावं में फैल गया।  गांव के स्कूल के मास्टर ने गांव के मुखिया से पूछा अमुक व्यक्ति को नियुक्त करते समय आपने क्या विशेषताएं दृष्टिगत रखीं? मुखिया ने उत्तर दिया कि बाढ़ के कारण उसका घरबार नष्ट हो चुका है, परिवार के लोग मर गए हैं।  उसके जीवन में निराशा ही निराशा भर गई है।  एसे में हमने यह सोचा कि उसे यह काम सौंप दें क्योंकि एसी स्थिति के साथ वह और कुछ तो कर नहीं सकता।  स्कूल के शिक्षक ने कुछ सोचते हुए अपना सिर हिलाया और धीमे स्वर में कहा कि यह नियुक्ति सही नहीं है।  वह व्यक्ति निराश और हताश है उसके लिए जीवन अर्थहीन होकर रह गया है।  जब उसे अपनी चिंता नहीं है तो स्पष्ट है कि दूसरों के प्रति उसके भीतर अच्छी भावना और चिंता कैसे हो सकती है? अतः वह गोदाम की रक्षा कैसे कर पाएगा? आपने यह कार्य उसे देकर पूरे गांव में निराशा बांटने का प्रबंध कर दिया है।  उन्होंने कहा कि भविष्य का भय हर गेहूं की बोरी के साथ लोगों के घरों में जाएगा।  उस व्यक्ति की सहायता करना चाहते हैं तो कुछ एसा करें कि वह अपने दुख भुला सके, उसके लिए घर और खाने-पीने का प्रबंध किया जाए।  लेकिन उससे गोदाम की ज़िम्मेदारी ले ली जाए और किसी आशावान व्यक्ति को वहां नियुक्त किया जाए ताकि इन कठिन परिस्थितियों में वह गेहूं के साथ मुस्कान और भविष्य के प्रति आशाएं बांट सकें।

     

     

    आधुनिक अनुसंधानों से पता चलता है कि नकारात्मक भावनाओं विशेषकर मन में द्वेष और घृणा रखने से पूरे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है विशेषकर हृदय पर।  क्रोध और शत्रुता की भावना डाइबिटीज़ और हाई ब्लडप्रेशर के लिए भूमि प्रशस्त करती है।  शोध से यह भी ज्ञात होता है कि क्रोधी प्रवृत्ति वाले लोगों को यह ख़तरा अधिक होता है और यही कारण है कि एसे लोगों का हृदय, अपने प्राकृतिक क्रियाकलापों की शक्ति खोने लगता है।  अधिक क्रोध, द्वेष व घृणा रखने वाले लोग, न केवल यह कि बड़ी जल्दी हतोत्साहित हो जाते हैं बल्कि अपने शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को भी कमज़ोर कर देती है।  इस प्रकार वे अपने शरीर को विभिन्न प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त कर लेते हैं।

    रोज़े का महत्वः पारंपरिक चिकित्सा शैली में रोज़ा रखने को बहुत महत्व दिया गया है।  वास्तव में कहा जा सकता है कि रोज़ा रखने से शर्करा और वसा को, जो स्वास्थ्य के मुख्य शत्रु हैं, नियंत्रित किया जा सकता है क्योंकि फ़िज़ियोलाजी की दृष्टि से मानव शरीर में खाद्य पदार्थों को जलाने का काम, भोजन करने के आधा घण्टे के बाद आरंभ हो जाता है।  होता यह है कि शरीर में मौजूद शर्करा, जो यकृत तथा मांसपेशियों में एकत्रित हो जाती है और ऊर्जा का वास्तविक स्रोत होती है, भूखे रहने की अवधि सात-आठ घंटे से अधिक हो जाने के बाद समाप्त हो जाती है।  इसके बाद से शरीर, चर्बी या वसा से ऊर्जा प्राप्त करने लगता है जो ऊर्जा का दूसरा मुख्य स्रोत है।

    भूखा रहने की अवधि यदि घंटों से बढ़कर दिनों और सप्ताहों तक फैल जाती है तो उस स्थिति में मांसपेशियों में मौजूद प्रोटीन को ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाने लगता है जो ख़तरनाक होता है।  रमज़ान के महीने में इस स्थिति से बचने के लिए रोज़ा खोलते समय और सहरी के समय उचित आहार का सेवन करना चाहिए।  इस स्थिति में रोज़ा रखने के सैद्धांतिक व उचित परिणाम सामने आते हैं और डाइबिटीज़ एवं ब्लडप्रेशन जैसे रोगों से बचने की भूमिका प्रशस्त होती है।  रोज़ा रखने के दूसरे सकारात्मक प्रभाव भी होते हैं।  फ़िज़ियोलाजी की दृष्टि से यह वास्तविकता सामने आती है कि रोज़े की स्थिति में एन्ड्रोफ़ीन नामक हारमोन का रिसाव होता है जिसे शरीर के भीतर उत्पन्न होने वाले मारफ़ीन की संज्ञा भी दी जाती है।  एन्ड्रोफ़ीन की मात्रा जब रक्त में बढ़ने लगती है तो व्यक्ति को शान्ति का आभास होता है।  इस प्रकार रोज़ा न केवल शरीर के लिए स्वास्थ्यदायक होता है बल्कि मन को भी शांति प्रदान करता है।  रोज़े की मुख्य शर्त यह है कि इफ़तार और सहर में उचित मात्रा में और सादे व स्वस्थ खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाए।

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