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    सवेरे-सवेरे-9

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    प्रातःकाल अर्थात जीवन का नया आरंभ, अतः इसे ईश्वर की याद से आरंभ होना चाहिए। आप कहेंगे कि ईश्वर की याद तो हमने सूर्योदय से पहले ही कर ली है। बहुत अच्छा किया है आपने, किन्तु हमारे मन में इस समय जो बात ईश्वर के संबंध में है वह भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। आइये ध्यान से पढ़िए।

    आयतुल्लाह बहजत बहुत ही महान आध्यात्मिक व्यक्तित्व के स्वामी, बड़े पवित्र और ज्ञानी व्यक्ति थे। उनका स्वर्गवास अभी तीन चार वर्ष पूर्व ही हुआ है। वह बताते हैं कि एक दिन वह अपने घर में अध्ययन आदि समाप्त करके किसी काम से बाहरी कमरे में गये तो वहां बाहर गली में बच्चों के खेलने की आवाज़ आ रही थी। तभी किसी भिखारी की आवाज़ सुनाई पड़ी जो एक छोटे बच्चे से कह रहा था मुझे अपने घर से कुछ लाकर दे दो।

    बच्चे ने उत्तर में कहाः तुम अपनी अपनी मां से मांगो वह देंगी। भिखारी की आवाज़ आईः मेरी मां नहीं है, तुम अपनी मां जी से मांग कर ले आओ

    आयतुल्लाह बहजत कहते हैं कि बच्चे के अत्यंत भोलेपन से कहे गये शब्दों को सुनकर मैं सोच में पड़ गया कि बच्चे को मां पर कितना भरोसा है। वह सोचता है कि मां से जो भी मांगा जाए और जो भी अपनी मां से मांगे उसे अवश्य मिलेगा। यदि यही भावना और भरोसा हमें ईश्वर पर हो तो हमारा जीवन कितना सरल हो जाए और कठिनाइयों का भय हमारे मन से बिल्कुल निकल जाए।

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    यदि आप कल सवेरे जब नींद से जागें और देखें कि अचानक आपका भार बीस किलो बढ़ गया है, तो क्या होगा? आप चिंतित हो जाएंगे और तुरंत अस्पताल को फ़ोन करेंगे। हेलो, मेरी सहायता करें, मैं अचानक मोटा हो गया हूं।

    परंतु यही घटना यदि धीरे-2 घटे, एक किलो इस महीने में, एक किलो अगले महीने में बढ़ता रहे तो क्या आप की प्रतिक्रिया यही होगी? स्पष्ट है कि नहीं। आप बिना किसी चिंता के समय बिताते रहेंगे।

    जो लोग दीवालिया हो जाते हैं, बहुत मोटे हो जाते हैं, वैवाहिक जीवन में बात तलाक़ तक पहुंच जाती है, परीक्षा में फ़ेल हो जाते हैं तो यह एकदम से नहीं होता। ज़रा सा आज, ज़रा सा कल और फिर अचानक ज़ोरदार धमाका, विस्फोट और तब हम पूछते हैं कि ऐसा क्यों हुआ?

    देखिए जीवन में विभिन्न बातें, घटनाएं और आदतें एक के ऊपर एक इकट्ठा होती जाती हैं और हमें पता भी नहीं चलता। इसलिए हमको चाहिए कि हर रोज़ अपने सामने यह प्रश्न रखें कि हम कहां जा रहे हैं? क्या पिछले साल या पिछले महीने या फिर पिछले सप्ताह से हमारा जीवन अधिक स्वस्थ, अधिक व्यवस्थित और अधिक सफल है या नहीं? यदि उत्तर नकारात्मक है तो हमको तुरंत अपनी जीवनचर्या पर पुनर्विचार करना होगा।

    अब आइये आपको हज़रत यूनुस पैग़म्बर की कथा सुनाते हैं। इस प्रकार की सच्ची कहानियों में पूरी मानवता के लिए पाठ होता है। दजला नदी के तट पर नैनवा नामक नगर में आशूरी लोग रहते थे जिनकी संख्या लगभग एक लाख थी। यहां के लोगों का व्यवसाय कृषि और पशुपालन था। उसी नगर में हज़रत यूनुस का जन्म हुआ। वह जब बड़े हुए तो उनकी पवित्रता को देखकर ईश्वर ने उन्हें अपना प्रतिनिधि या दूसरे शब्दों में यह कहें कि पैग़म्बर नियुक्त किया। हज़रत यूनुस एकमात्र व अनन्य ईश्वर पर विश्वास रखते थे और इस बात से बहुत दुखी रहा करते थे कि उनके समाज में लोग ईश्वर के स्थान पर पत्थर की मूर्तियों की पूजा करते और उनसे अपने जीवन में सहायता मांगते हैं जबकि यह पत्थर न उनकी सहायता कर सकते हहैं न उन्हें क्षति पहुंचा सकते हैं।

    एक दिन ईश्वर ने हज़रत यूनुस को आदेश दिया कि अपनी जाति वालों के पास जाएं और उन्हें अनन्य ईश्वर की उपासना का उपदेश दें। नैनवा के लोग बड़े सीधे सादे लोग थे और अज्ञानता के कारण प्राचीन काल से अनन्य ईश्वर के स्थान पर मूर्तियों की पूजा करते आ रहे थे इसलिए उनके लिए हज़रत यूनुस की बताई हुई बातों को समझना कठिन था। समय बीतता रहा, हज़रत यूनुस अन्य ईश्वरीय पैग़म्बरों की भांति लोगों को अज्ञानता के अंधकार से निकाल कर ज्ञान के प्रकाश में लाने का प्रयास करते रहे किन्तु अधिकतर लोगों ने हठधर्मी बरती और हज़रत यूनुस की बातों पर ध्यान नहीं दिया। यहां तक कि हज़रत यूनुस ने उन्हें ईश्वरीय प्रकोप से डराने का प्रयास किया और कहाप कि यदि तुम अपने हठ पर अड़े रहोगे तो मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि वह तुम को अपने प्रकोप का पात्र बनाए। लोगों ने जब उनकी धमकी को कोई महत्त्व नहीं दिया तो काफ़ी समय तक संयम बरतने के पश्चात वह ईश्वर से जनता पर क़हर ढाने की प्रार्थना करके नैनवा नगर से निकल गये और भूमध्य सागर की ओर चल पड़े। उन्हें निरंतर इस बात की आशा लगी हुई थी कि नैनवा नगर के अनेकेश्वरवादी अब तक ईश्वर के क्रोध का पात्र बन चुके होंगे।

    मार्ग में नैनवा की ओर से गुज़र कर आता हुआ कोई यात्री मिलता तो हज़रत यूनुस उससे नैनवा की दशा के बारे में प्रश्न करते और पता चलता कि लोग बिल्कुल कुशल हैं तो वह आश्चर्यचकित हो जाते और सोचने लगते कि उन लोगों पर से ईश्वर का प्रकोप क्यों टल गया। यही सब सोचते हुए वह भूमध्य सागर की ओर बढ़ते गये।

    दूसरी ओर जब हज़रत यूनुस ने दुखी और क्रोधित होकर नैनवा नगर को छोड़ दिया और एक या दो दिन बीत गया तो लोगों ने भयंकर संकेतों और निशानियों का आभास किया। उन्होंने देखा कि आकाश पर काले धुएं जैसे भयानक बादल छाने लगे और स्थिति ऐसी होने लगी जैसे ईश्वरीय प्रकोप नगर को तबाह करने वाला है उन लोगों के बीच मौजूद एक पवित्र व्यक्ति ने लोगों सचेत किया और कहा कि हे लोग तुम जानते हो कि यूनुस भले मनुष्य और ईश्वर के दूत हैं, वह कभी झूठ नहीं बोलते और तुम्हारा भला चाहते हैं, उनका कहना मानो, अपने बच्चों और परिवार पर दया करो, अनन्य ईश्वर की प्रार्थना करो और विभिन्न वस्तुओं की पूजा करना छोड़ दो, नहीं तो ईश्वरीय प्रकोप तुमको घेर लेगा और इसके संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहे हैं।

    नैनवा के लोग् यह बातें सुनकर और ईश्वर के प्रकोप के स्पष्ट रूप से संकेत देखकर पछताने लगे और हज़रत यूनुस को ढूढ़ने लगे ताकि उनके समक्ष अनन्य ईश्वर प अपने ईमान और विश्वास की घोषणा करें और अपने ग़लत कर्मों पर पश्चाताप करें। परंतु हज़रत यूनुस का कहीं पता नहीं था।

    नैनवा में मौजूद उस पवित्र व्यक्ति ने लोगों से कहा कि अब जब कि हज़रत यूनुस तुम्हारी ओर से निराश होकर इस नगर से चले गये हैं तो सब लोग इस नगर के बड़े मैदान में एकत्रित होकर अनन्य ईश्वर पर अपने ईमान की घोषणा करो, अपने ग़लत कर्मों पर रो-2 कर तौबा और प्रायश्चित करो, शिशुओं को माताओं से अलग कर दो ताकि वह भी रोएं और इस प्रकार ईश्वर की कृपा को अपनी ओर उन्मुख करो, क्योंकि ईश्वर अपनी रचनाओं से अत्याधिक प्रेम करता है और अपने भले बंदों को तबाही से बचाता है।

    लोगों ने वैसा ही किया जैसा उस भले व्यक्ति ने कहा था। अतः थोड़ी ही देर में धुएं जैसे भयानक बादल छटने और ईश्वरीय क्रोध के चिन्ह मिटने लगे। आकाश नीला हो गया, प्रकाश फैल गया और लोगों में संतोष व्याप्त होने लगा। अब दोबारा सब को हज़रत यूनुस की याद आने लगी परंतु वह कहां हैं यह कोई नहीं जानता।

    (जारी है)

    विलियम शेक्सपियर का कहना कि मैं सदैव प्रसन्न रहता हूं जानते हो क्यों?

    क्योंकि मैं किसी से कोई आशा व अपेक्षा नहीं रखता। दूसरों से आशा लगाने से, मन को दुख पहुंचता है जीवन की अवधि कम होती है, अतः जीवन से प्रेम करो, प्रसन्न रहो, मुस्कुराओ।

    बात करने से पहले, बात सुनो

    लिखने से पूर्व सोचो

    ख़र्च करने से पूर्व आय की व्यवस्था करो।

    दुआ मांगने से पहले लोगों को देना सीखो

    क्षति पहुंचाने से पूर्व, आभास करो।

    घृणा से पहले प्रेम व स्नेह करो

    जीवन यही है उसका आभास करो, जियो और जीवन का आनंद उठाओ।