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    सिल्वर स्क्रीन की डायमंड जुबली

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    हिंदुस्तानी सिनेमा आज पूरे 100 साल का हो गया. लेकिन क्या इसने ठीक से बचपन की दहलीज भी लांघी है? पूजा सिंह की रिपोर्ट.

     

    ‘मेरे ख्याल से यह कहना सही होगा कि हमारे देश के जनमानस पर जितना असर तमाम समाचार पत्र और पुस्तकें मिलकर नहीं डाल पाते, उससे अधिक असर अकेले सिनेमा डालता है. हालांकि मैं इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं करूंगा कि यह असर अच्छा है अथवा बुरा.’
                                               – पंडित जवाहर लाल नेहरू

    राजधानी दिल्ली के सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से सिनेमा के सौ साल के सफर पर आयोजित समारोह में टंगे एक परदे पर अंकित देश के प्रथम प्रधानमंत्री का यह उद्घरण हिंदुस्तानी मानस का तगड़ा प्रतिबिम्ब है. यकीनन ऐसे आयोजन में आयोजकों के समक्ष सबसे बड़ी दुविधा यह होती है कि सिनेमा के 100 पूरे होने पर दरअसल किस क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाए. सिनेमा से जुड़ी अकादमिक परिचर्चाओं को, फिल्मों के प्रदर्शन को, सूचनादायी वृत्त चित्रों को अथवा किन्हीं अन्य बातों को?

    पिछले सौ सालों में हमारा सिनेमा मूक और श्वेत-श्याम से होते हुए 3डी सिनेमा तक की राह तय कर चुका है लेकिन सिनेमा की समांतर धारा को छोड़ दिया जाए तो आज हमारे सिनेमा में (हिंदी और क्षेत्रीय दोनों) वैचारिक दखल के बजाय पलायनवादी मनोरंजन अधिक प्रभावी और मुखर नजर आता है. ऐसे में यह एक अच्छा मौका था कि फिल्म उद्योग के रचनात्मक अगुआ मिल बैठते और बीते कल के अवलोकन के साथ आने वाले कल में देश के सिनेमा की क्या तस्वीर हो इस पर चर्चा करते? लेकिन इस सब के नाम पर सीरी फोर्ट के चारों सभागारों में अलग-अलग समय पर आयोजित परिचर्चाओं, वृत्त चित्रों और सिनेमा शो के रूप में खानापूर्ति ही अधिक नजर आई. कमी दर्शकों की नहीं बल्कि आयोजन में विजन की थी.

    हालांकि कुछ हिस्से ऐसे भी थे जो इनमें शामिल लोगों की स्मृतियों में अरसे तक दर्ज रहेंगे. मसलन, कट-अनकट वर्कशॉप में सिनेमा के उन दृश्यों को दिखाया गया जिनको मूल फिल्म में सेंसर का प्रमाणपत्र नहीं मिल पाने के कारण नहीं दर्शाया जा सका था. इसमें अश्लील करार दिए गए दृश्यों के अलावा महिलाओं के विरुद्घ अपराध के संवेदनशील तथा हिंसक दृश्य शामिल थे. यह वर्कशॉप युवाओं के लिए बहुत काम की थी. इसके जरिए वे हमारे समाज में वर्जनाओं और नैतिक अनैतिक के मानदंड में आते बदलाव को इस आयोजन के जरिए समझ सके. इस वर्कशॉप के दौरान भारतीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की मुखिया पंकजा ठाकुर ने कहा कि सिनेमा के 100 साल पूरे होने के बाद हम ये दृश्य देखने की स्थिति में हैं. आशा है कि इससे समाज, फिल्म उद्योग व सेंसर बोर्ड के बीच की दूरियां कम होंगी.

    मल्टीप्लेक्स पीढ़ी के लिए ऑडिटोरियम के मुख्य खंड में बने तंबू सिनेमा ‘गुलशन महल’ (तंबू में बने इस सिनेमाहॉल के बाहर बकायदा दो आने और आठ आने के टिकट का जिक्र है) के दीदार यकीनन जादुई अनुभव था. साथ ही इस खंड में रखे 100 साल तक पुराने कैमरे और फिल्म निर्माण से जुड़े अन्य तकनीकी उपकरण भी. भारतीय सिनेमा का जिक्र कभी भी सत्यजित रे के बिना पूरा नहीं हो सकता है. सिनेमा के 100 साल पूरा होने के मौके पर किए गए इस आयोजन का एक खंड भारतीय सिनेमा के इस शीर्ष व्यक्तित्व को भी समर्पित था जहां उनकी निर्देशित फिल्मों के प्रदर्शन के अलावा उनकी कृतियों पर परिचर्चा आयोजित की गई.