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    सुधार की ज़रूरत

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    सवालः मैंने कुछ साल पहले शादी की थी और मैं दीनी व शरई कामों को बहुत ज़्यादा महत्व देता हूँ और इमाम ख़ुमैनी (र.ह) का मुक़ल्लिद (तक़लीद करने वाला) हूँ लेकिन मेरी बीवी (पत्नी) दीनी मसअलों को महत्व नहीं देती और बुहत ज़्यादा टोकने से एक बार पढ़ लेती है मगर ज्यादा तर नहीं पढ़ती है जिससे मुझे बहुत दुख़ होता है ऐसी स्तिथि मे मेरी क्या ज़िम्मेदारी है?

    जवाबः जैसे भी संभव हो, आप पर उसके सुधार में जो चीज़े मददगार साबित हो सकती हैं उन्हें उपलब्ध कराना बाजिब है। और ऐसी चीज़ों से बचना ज़रूरी है जो भेदभाव का कारण बने। लेकिन आपको यह याद रखना चाहिए कि दीनी मजलिसों और धार्मिक लोगों के यहाँ आना जाना, इंसान के सुधार में बहुत प्रभावी (मुअस्सिर) है।