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    सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई के बयान की रौशनी में रमज़ान एक ईद

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    रमज़ानुल मुबारक की शुरुवात मुसलमानों के लिये एक बहुत बड़ी ईद है इसलिये बहुत अच्छा है कि मोमिनीन एक दूसरे को इस महीने की मुबारकबाद दें और एक दूसरे को इस महीने से ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाने की सलाह दें। क्योंकि यह महीना अल्लाह के मेहमान बनने का महीना है इसलिये इस महीने में केवल वही इसका फ़ायदा उठा सकते हैं जिनके दिल में मान हो और जिनको ख़ुदा अपना मेहमान बनने की तौफ़ीक़ व शुभ अवसर दे। ख़ुदा का एक दस्तरख़्वान आम है जिस पर सारे बैठते हैं और हर दिन बैठते हैं और उस पर लगाई और सजाई गई नेमतों से फ़ायदा उठाते हैं लेकिन यह ख़ुदा का ख़ास दस्तरख़्वान है जिस पर ख़ास लोग ही बैठते हैं।
    एक ज़रूरी पिलर
    क़ुरआने मजीद फ़रमाता है-
    ’’ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ‘‘(سورہ بقرہ183-)
    कुछ चीज़ें ऐसी हैं जो केवल इस्लाम में नहीं हैं बल्कि उससे पहले भी दूसरी उम्मतों में रही हैं जैसे नमाज़ और ज़कात के बारे में क़ुरआने मजीद में है कि मुसलमानों से पहले यह दूसरी क़ौमों पर भी वाजिब थे।
    ’’وَأَوْصَانِي بِالصَّلَاةِ وَالزَّكَاةِ مَا دُمْتُ حَيًّا‘‘(سورہ مریم19-)
    जनाबे ईसा अपने लोगों से कहते हैं ख़ुदा नें मुझे नमाज़ पढ़ने और ज़कात देने को कहा है। ऊपर जो आयत बयान की गई है उससे मालूम होता है कि रोज़ा भी नमाज़ और ज़कात की तरह मुसलमानों से पहले दूसरी उम्मतों पर वाजिब था, फ़रमाता है- तुम पर रोज़े को वाजिब किया गया है जिस तरह तुमसे पहले वालों पर किया गया था। इससे मालूम होता है कि इबादत के यह तीन पिलर हमेशा हर उम्मत के लिये ज़रूरी रहे हैं जिनमें से एक रोज़ा है। नमाज़ इन्सान और ख़ुदा के बीच सम्बंध का नाम है, ज़कात इन्सान के माल को पाक और शुद्ध करने का ज़रिया है और रोज़े के द्वारा दिल और आत्मा पाक होती है।
    तक़वे तक पहुँचने की सीढ़ी
    इस आयत में ख़ुदा फ़रमाता है-
    ’’لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ‘‘
    ताकि उसके द्वारा तुम तक़वे तक पहुँचो। इससे मालूम होता है कि रोज़ा तक़वे तक पहुँचने की एक सीढ़ी है। तक़वा यह है कि इन्सान अपने तमाम आमाल की तरफ़ पूरा ध्यान रखे कि इस काम में ख़ुदा की इच्छा है कि नहीं। इस ध्यान को तक़वा कहते हैं। इसकी अपोज़िट ग़फ़लत (लापरवाही) और बिना सोचे समझे, बिना ध्यान दिये चलते रहना है. ख़ुदा को यह बात पसंद नहीं है कि मोमिन जीवन में आँख बंद कर के सब कुछ करता रहे। मोमिन को हर हाल में और हर काम में खुली आँखों और सावधान दिल के साथ चलना चाहिये। मोमिन के लिये  ज़रूरी है कि वह यह देखे कि जो काम वह कर रहा है वह अल्लाह और शरियत की मरज़ी के विरुद्ध तो नहीं हैं। जब इन्सान इस तरह से सावधान हो जाता है और हर चीज़ में अल्लाह और दीन का ध्यान रखता है तो उसके अन्दर तक़वा आ जाता है। रोज़ा उन चीज़ों में से है जो इन्सान को होशियार बनाती हैं, जिनके ज़रिये इन्सान के अन्दर तक़वा आता है। इसी लिये रोज़ा मोमिन के लिये ज़रूरी है।
    जो इन्सान और समाज तक़वे के साथ जियेगा तो दुनिया और आख़ेरत की सारी अच्छाईयां उसे प्राप्त होंगी। तक़वा केवल क़यामत और जन्नत के लिये नहीं है बल्कि उसका फ़ायदा दुनिया में भी है। जिस समाज में तक़वा होगा, जो ख़ुदा के रास्ते पर होगा, जिसनें सोच समझ कर इस रास्ते को चुना हो और पूरे ध्यान से उस पर चल रहा होगा तो उसे दुनिया की नेमतें भी मिलेंगी, उस समाज में मोहब्बत, एक दूसरे की सहायता और नेक कामों में एक दूसरे का हाथ बटाने जैसे चीज़ें आम होंगी। तक़वा दुनिया और आख़ेरत दोनों में सफलता की चाभी है। आज की दुनिया इसलिये इतनी समस्याओं, कठिनाइयों और मुसीबतों में फँसी हुई है क्योंकि वह तक़वे से दूर है, गुनाहों में डूबी हुई है और डूबती जा रही है।
    तक़वा तमाम नबियों की पहली और आख़िरी बात रही है। आप क़ुरआने करीम की आयतों में पढ़ते होंगे कि अल्लाह के नबी लोगों से सबसे पहली बात तक़वा के बारे में कहते थे। क्योंकि तक़वे ही के ज़रिये अल्लाह की हिदायत मिलती है और अगर तक़वा न हो तो किसी भी इन्सान या समाज को अल्लाह की हिदायत पूरी तरह से नहीं मिलती। रोज़ा सी तक़वे को हासिल करने का एक रास्ता है।
    अल्लाह तआला सूरा-ए-हदीद की एक आयत में फ़रमाता है-
    ’’يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَآمِنُوا بِرَسُولِهِ يُؤْتِكُمْ كِفْلَيْنِ مِن رَّحْمَتِهِ وَيَجْعَل لَّكُمْ نُورًا تَمْشُونَ بِهِ‘‘(سورہ حدید28-)
    ऐ ईमान वालों! अल्लाह का तक़वा अपनाओ और उसके रसूल पर ईमान ले आओ ताकि वह अपनी रहमत से तुम्हे दो फ़ायदे पहुँचाए और तुम्हे एक ऐसी रौशनी दे जिसके द्वारा तुम आसानी से रास्ता चल सको। इस आयत से पता चलता है कि तक़वा इन्सान के दिल में एक ऐसी रौशनी डाल देता है जिससे वह आसानी से आगे बढ़ता है और सारे अंधेरे दूर हो जाते हैं। जब तक इन्सान को यह न मालूम हो कि उसे कहाँ जाना है, जब तक रास्ता साफ़ न हो वह आगे नहीं बढ़ सकता। तक़वा इन्सान को मन्ज़िल का पता भी बताता है और रास्ता भी साफ़ दिखाता है। http://www.welayat.in/hindi/