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    सूअर के मांस की हानियां

    सूअर के मांस की हानियां
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    सभी को स्वस्थ्य रहना अच्छा लगता है और कोई भी यह नहीं चाहता कि उसे किसी प्रकार का रोग लगे। सही रूप से विकास, शक्ति और प्रफुल्लता आदि सब कुछ शारीरिक स्वास्थ्य और उचित आहार पर निर्भर है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम इस संदर्भ में कहते हैं कि जीवन में स्वास्थ्य के बिना कोई भलाई नहीं है। इस्लाम की दृष्टि में, स्वास्थ्य की रक्षा का एक मार्ग, धर्म में वर्जित चीज़ों को खाने से बचना है। जैसाकि हमने पिछले कार्यक्रम में बताया था कि इस्लाम ने मनुष्य के सूअर का मांस हराम अर्थात वर्जित किया है और इसे बहुत से मानसिक व शारीरिक रोगों का कारण बताया है। वास्तव में इस्लाम ने एसे विभिन्न आहारों और खाद्य सामाग्रियों को जो शरीर के लिए लाभदायक हैं हलाल किया है और हानिकारक वस्तुओं को खाने से मना किया है। सूअर का मांग हराम चीज़ों में शामिल है और उसके बारे में बहुत सी बातों का वर्णन किया गया है। इस प्रकार सूअर का मांस खाना या उसका दूध पीना हराम और पाप है और थल का सूअर अपवित्र होता है। यदि हम सूअर के रहन सहन और खाने पीने पर ध्यान दें तो हमें नज़र आता है कि यह पशु हर प्रकार की गंदगी खाता है इसी लिए इसके अमाशय में विभिन्न प्रकार के रोगाणुओं का जमावड़ा रहता है जो सूअर के मांस, रक्त और दूध तक पहुंच जाते हैं और इन वस्तुओं का प्रयोग करने वालों को रोगी बना देते हैं। क़ुरआने मजीद में रक्त व मुर्दा पशुओं के साथ ही साथ सूअर का मांस खाने की भी मनाही है और इन्हें हानिकारक कहा गया है। इसके साथ ही शहद जैसे पवित्र व लाभदायक वस्तुओं को खाने की सिफारिश की गयी है। क़ुरआने मजीद ने शहद को एक स्वास्थ्य प्रदान करने वाली औषधि के रूप में पेश किया और उसे खाने की सिफारिश की है। अध्ययन कर्ताओं ने अध्ययन के बाद यह पाया है कि मधुमक्खी साफ सुथरे स्थानों से अच्छे अच्छे फूलों का रस चूस कर शहद तैयार करती हैं और गंदगी से दूर रहती हैं। यदि कोई मधुमक्खी, गंदगी पर बैठ जाए तो अन्य मधुमक्खियां उसे छत्ते में घुसने ही नहीं देती बल्कि उसे मार देती हैं ताकि उसके द्वारा लाया गया गंदा रस पूरी शहद को गंदा न करे। अब आधुनिक विज्ञान ने काफी हद तक स्वास्थ्य व मनोदशा पर आहार के प्रभावों का पता लगा लिया है। इस्लामी कथनों में आहार विशेषकर विभिन्न प्रकार के मांस के मनुष्य के व्यवहार व मानसिक दशा पर प्रभाव के बारे में बात की गयी है। इन आहारों का मनुष्य की मनोदशा पर प्रभाव एसा है कि जो मनुष्य जिस चीज़ का मांस अधिक खाता है उसी की विशेषताएं उसमें पैदा हो सकती हैं। उदाहरण स्वरूप सूअर का मांस खाने से इस पशु की कुछ विशेषताएं मनुष्य में पहुंच जाती हैं। संभवत यही कारण है कि इस्लाम से पूर्व भी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के धर्म में भी सूअर के मांस को हराम कहा गया है और बाइबल में पापियों को सूअर की संज्ञा दी गयी है। जैसाकि बताया गया सूअर गंदगी खाता है इस लिए उसके अमाशय में रोगाणुओं का जमावड़ा रहता है। अध्ययनों के बाद कई एसे रोगों के बारे में पता चला है जो सूअर का मांस खाने से मनुष्य को लग जाते हैं। Trichinosis नाम का पैरासाइट पराजीवी मनुष्य रोगी बना देता है और यह पराजीवी सूअर के मांस द्वारा मनुष्य के शरीर में पहुंचता है। सब से पहले ब्रिटेन के सर जेम्ज़ पार्ट ने वर्ष १८३५ में यह खोज की कि सूअर के मांस में Trichinosis नाम का पैरासाइट या पराजीवी पाया जाता है। वर्ष १८६० में जर्मनी में Trichinosis नाम के पैरासाइट या पराजीवी के कारण एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद फ्रेड्रिक यून ज़िन्कर नामक एक जर्मन डाक्टर ने त्रिचिनोसिस पराजीवी के ख़तरों का पता लगाया। यह कीड़ा बहुत छोटा होता है और उसका नर डेढ़ मिलीमीटर और मादा तीन मिलीमीटर तक व्यास रखती है। एक महीने के भीतर यह कीड़ा, दस से पंद्रह हज़ार अंडे दे सकता है। यह कीड़ा अत्याधिक तापमान के साथ सूअर के मांस के पकने के बाद भी नहीं मरता। डाक्टरों का मानना है कि जब यह कीड़ा मनुष्य के अमाशय में पहुंच गया तो फिर उसे मारने का कोई मार्ग नहीं है। त्रिचिनोसिस आरंभिक काल सूअर के शरीर में बिताता है और मनुष्य के शरीर में व्यस्क होता है और शरीर में पहुंचने के बाद मांस पेशियों में घुस जाता है। सूअर के एक किलो मांस में संभव है चालीस करोड़ त्रिचिनोसिस कीड़े के बच्चे मौजूद हों जो मांस के साथ ही मनुष्य के शरीर में पहुंच जाते हैं और अंडे देने लगते हैं जो बड़ी तेज़ी से रक्त के माध्यम से पूरे शरीर में पहुंच जाते हैं। इस रोग में ग्रस्त होने वाले व्यक्ति के रक्त के लाल कणों में पहले वृद्धि होती है और फिर धीरे धीरे रक्त से लाल कण लुप्त होने लगती हैं और एनिमिया या रक्त की कमी का रोग लग जाता है। इस रोग का पहला प्रभाव यह होता है कि रोगी को चक्कर आने लगते हैं और सदैव उसे बुखार रहता है फिर उसे दस्त आने लगते हैं और धीरे धीरे उसका रोग बढ़ता जाता है। रोगी को इसी प्रकार गठिया, शरीर के भीतर खुजली, वसा का जमाव तथा अत्याधिक थकन का आभास होने लगता है और चार या पांच दिनों बाद रोगी की मृत्यु हो जाती है। इस के अतिरिक्त धरती के अन्य सभी पशुओं की तुलना में सूअर के मांस में यूरिक एसिड की मात्रा सब से अधिक होती है। सूअर अपने शरीर में मौजूद यूरिक एसिड का मात्र दो प्रतिशत बाहर निकालता है और इस विषैले पदार्थ का बाक़ी अंश उसके शरीर अर्थात उसके मांस में ही रहता है इसी लिए सूअरों को सदैव जोड़ों का दर्द रहता है। डाक्टरों के अनुसार इसी लिए सूअर का मांस खाने वाले अधिकांश लोगों को जोड़ों के दर्द की शिकायत रहती है। एक अन्य बात यह है कि सूअर के मांस का प्रोटीन देर से हज़्म होता है। सूअर का मांस यदि तेज़ आंच पर देर तक पकाया जाए तब भी उसे खाने के बाद मनुष्य विभिन्न प्रकार की समस्याओं में ग्रस्त हो जाता है क्योंकि इससे मनुष्य के शरीर में एमिनो एसिड की मात्रा पांच घंटे बाद अपनी चरमसीमा पर पहुंच जाती है। कुरआने मजीद की चार आयतों में सूअर के मांस खाने की मनाही की गयी है और उसे अपवित्र बताया गया है। जैसे सूरए माएदा की आयत नंबर में ३ में मरे हुए पशु के मांस, रक्त तथा सूअर के मांस को हराम कहा गया है।

    वास्तव में इस्लाम और अन्य धर्मों में सूअर का मांस खाने की मनाही इन धर्मों के चमत्कारों में से एक है क्योंकि यह आदेश उस समय दिया गया था जब मनुष्य को विज्ञान की सहायता से सूअर के मांस की हानियों का पता नहीं चला था। इस समय भी बहुत से शारीरिक व नैतिक रोगों से मुसलमान दूर हैं या यदि हैं तो बहुत कम हैं। सही और हलाल आहार शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को निश्चित बनाते हैं।

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