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    सूरए अनआम, आयतें 1-3, (कार्यक्रम 194)

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    सूरए माएदा की आयतों की व्याख्या समाप्त हुई और अब हम पवित्र क़ुरआने मजीद के छठे सूरे अर्थात सूरए अनअम की आयतों की व्याख्या आरंभ करेंगे। सूरए अनआम की 165 आयतें हैं और यह सूरा मक्के में उतरा है। इस सूरे का मुख्य संदेश अनेकेश्वरवाद से संघर्ष और एकेश्वरवाद का निमंत्रण है। इस सूरे की अधिकांश आयतें अनेकेश्वरवादियों और मूर्तिपूजा करने वालों की ग़लत आस्थाओं का वर्णन करती और उन्हें रद्द करती है। इस सूरे में हलाल अर्थात वैध व हराम अर्थात वर्जित पशुओं के बारे में भी बात की गयी है क्योंकि अनेकेश्वरवादी अपनी ग़लत आस्थाओं के आधार पर कुछ पशुओं को अपने लिए वर्जित कर लेते थे तथा उनका मांस खाने और उन पर सवारी को वैध नहीं समझते थे। इस सूरे का नाम अनआम इस कारण से है कि ईश्वर ने इसमें चौपायों के कुछ आदेशों का वर्णन किया है। अरबी भाषा में चौपायों को अनआम कहा जाता है। आइये इस सूरे की पहली आयत की तिलावत सुनें।بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَجَعَلَ الظُّلُمَاتِ وَالنُّورَ ثُمَّ الَّذِينَ كَفَرُوا بِرَبِّهِمْ يَعْدِلُونَ (1)ईश्वर के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। सारी प्रशंसा ईश्वर के लिए है जिसने आकाशों और धरती की रचना की और (उनमें) अंधकार तथा प्रकाश बनाया परंतु काफ़िर, (लोगों व वस्तुओं को) अपने पालनहार का समकक्ष ठहराते हैं। (6:1)यह आयत ईश्वर का परिचय कराते हुए कहती है कि वह वही है जिसने आकाशों और धरती की रचना की है। तुम जिनकी उपासना करते हो क्या उनमें रचना की शक्ति है? वह वही है जिसने सूर्य एवं अन्य प्रकाशमयी सितारों की रचना करके संसार में प्रकाश एवं गर्मी का साधन बनाया है तथा सितारों की परिक्रमा के आधार पर अंधकार द्वारा सभी के आराम की भूमि प्रशस्त की है, क्या तुम्हारे देवताओं और ईश्वरों में भी यह शक्ति है? अगर नहीं है तो केवल एकमात्र शक्तिशाली ईश्वर की उपासना करो और उसका गुणगान करो कि उसने ऐसी व्यवस्था तुम्हारे अधिकार में दी है।यह आयत भौतिकतावादियों की आस्था का भी खंडन करती है कि जो ब्रह्मांड की रचना के लिए ईश्वर के अस्तित्व का इन्कार करते हैं और ज़रतुश्तियों की भांति दो ईश्वरों के विश्वास को भी रद्द करती है जिनका मानना है कि अंधकार और प्रकाश दोनों के अलग अलग ईश्वर हैं। इसी प्रकार यह अनेकेश्वरवादियों की आस्था को भी ग़लत सिद्ध करती है जो किसी व्यक्ति या वस्तु को ईश्वर का समकक्ष ठहराते हैं।यहाँ रोचक बात यह है कि पूरे क़ुरआन में नूर अर्थात प्रकाश का शब्द एक वचन और ज़ुल्मत अर्थात अंधकार का शब्द सदैव बहुवचन के रूप में प्रयोग हुआ है क्योंकि सत्य का मार्ग प्रकाश है, जो एक से अधिक नहीं है परंतु असत्य का मार्ग, जो अंधकार का कारण है, अत्यधिक है। दूसरे शब्दों में प्रकाश एकता और अंधकार फूट का कारण है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर वस्तुओं और जीवों का सृष्टिकर्ता भी है और उनकी प्रगति व परिपूर्णता का मार्ग भी प्रशस्त करता है। सभी प्राणी और उनका जीवन ईश्वर के हाथ में है।अनेकेश्वरवाद एक प्रकार का कुफ़्र है क्योंकि किसी को ईश्वर के समान और उसका समकक्ष समझना अकेले ही संसार की व्यवस्था चलाने में ईश्वर की क्षमता का इन्कार है।आइये अब सूरे अनआम की दूसरी आयत की तिलावत सुनते हैंهُوَ الَّذِي خَلَقَكُمْ مِنْ طِينٍ ثُمَّ قَضَى أَجَلًا وَأَجَلٌ مُسَمًّى عِنْدَهُ ثُمَّ أَنْتُمْ تَمْتَرُونَ (2)वह वही है जिसने मिट्टी से तुम्हारी सृष्ट की और फिर (तुम में से हर एक के लिए) मृत्यु का समय निर्धारित किया और (मृत्यु का) निर्धारित समय केवल उसी के पास है तो (फिर भी उसके बारे में) संदेह करते हो। (6:2)पिछली आयत में धरती तथा आकाशों की सृष्टि में ईश्वर की शक्ति का वर्णन किया गया था। यह आयत निर्जीव मिट्टी से मनुष्य की सृष्टि की ओर संकेत करते हुए कहती है। तुम्हारा जीवन और मृत्यु ईश्वर के हाथ में है तो तुम किस प्रकार उसके अस्तित्व में संदेह करते हो?यह आयत मनुष्य की आयु के लिए दो समय और अवधि पेश करती है। एक निर्धारित समय जिसका ज्ञान केवल ईश्वर को है और दूसरा अनिर्धारित समय कि जो हर मनुष्य के जीवन की परिस्थितियों से संबंधित है।ईश्वर ने हर मनुष्य को एक निर्धारित मात्रा में क्षमताएं दी हैं कि जिसके आधार पर जब क्षमताएं समाप्त हो जाती हैं तो उसकी आयु का भी अंत हो जाता है जैसे कि तेल समाप्त हो जाने के पश्चात दिया बुझ जाता है।परंतु ऐसे कितने ही लोग होते हैं कि जो दुर्घटना या अन्य कारणों से अपनी निर्धारित आयु से पूर्व ही मर जाते हैं, जैसे कि तेज़ हवा के कारण, तेल होने के बावजूद दिया बुझ जाता है।इस आधार पर इस्लामी शिक्षाओं में, खाने पीने और स्वास्थ्य संबंधी मामलों के अतिरिक्त कि जो लंबी आयु का कारण बनते हैं, ऐसे कर्मों का भी उल्लेख किया गया है जो आयु के बढ़ने या घटने का कारण बनते हैं। उदाहरण स्वरूप परिजनों से मिलने जुलने से मनुष्य की आयु में वृद्धि होती है।इस आयत से हमने सीखा कि हम अपनी इच्छा से संसार में नहीं आए हैं कि अपनी इच्छा से, यहां से जाएं। जीवन का आरंभ और अंत हमारे हाथ में नहीं है तो जब हम इस संसार में हैं तो किस प्रकार ईश्वर और प्रलय के बारे में संदेह करते हैं।जिस संसार में हम जीवन व्यतीत कर रहे हैं उसकी एक स्थायी व्यवस्था है जिसके अंतर्गत हर प्राणी का जीवन व मृत्यु स्पष्ट और निर्धारित है तथा ईश्वर इस व्यवस्था का सृष्टिकर्ता और ज्ञानी है।आइये सूरे अनआम की तीसरी आयत की तिलावत सुनते हैंوَهُوَ اللَّهُ فِي السَّمَاوَاتِ وَفِي الْأَرْضِ يَعْلَمُ سِرَّكُمْ وَجَهْرَكُمْ وَيَعْلَمُ مَا تَكْسِبُونَ (3)वही आकाशों और धरती का ईश्वर है। वह तुम्हारी गुप्त व स्पष्ट (सभी) बातों को जानता है और जो कुछ तुम (करते और) कमाते हो वह उससे भी अवगत है। (6:3)पिछली आयतों में आकाशों, धरती तथा मनुष्य की सृष्टि में ईश्वर की शक्ति का उल्लेख करने के पश्चात यह आयत कहती है कि केवल एक ही ईश्वर धरती व आकाशों का स्वामी है और सभी की सृष्टि उसी के हाथ में है। उन लोगों की आस्था के विपरीत जो हर वस्तु के लिए एक अलग ईश्वर मानते हैं।यह आयत इसी प्रकार मनुष्य के गुप्त व खुले कर्मों तथा व्यवहार के प्रति ईश्वर के व्यापक ज्ञान की ओर संकेत करते हुए कहती है कि वो न केवल तुम्हारा सृष्टिकर्ता है बल्कि उसने तुम्हारी रचना करके तुम्हें छोड़ दिया है। वह सदैव तुमपर दृष्टि रखता है।इस आयत से हमने सीखा कि यदि हम ईश्वर के ज्ञान पर विश्वास रखें तो हम अपने कर्मों के प्रति सावधान रहेंगे। यह विश्वास हमें बुरे कर्मों से भी रोकता है और भले कर्मों के लिए प्रेरित करता है।धरती व आकाश और स्पष्ट व गुप्त, हमारे निकट व हमारे ज्ञान के अनुसार विभिन्न और अलग-अलग हैं किन्तु ईश्वर के निकट सब एक समान हैं। {