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    सूरए अनआम, आयतें 10-14, (कार्यक्रम 196)

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    आइये सूरए अनआम की 10वीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَلَقَدِ اسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِنْ قَبْلِكَ فَحَاقَ بِالَّذِينَ سَخِرُوا مِنْهُمْ مَا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ (10)(हे पैग़म्बर! अपने साथ अनेकेश्वरवादियों के बुरे व्यवहार से चिंतित न हों कि) तुमसे पहले वाले पैग़म्बरों का भी परिहास किया जा चुका है परंतु जिस चीज़ का वे परिहास करते थे उसने स्वयं उन्हें अपने घेरे में ले लिया (और वे ईश्वरीय दंड में घिर गये) (6:10)इससे पहले हमने कहा कि हठधर्मी लोग सत्य स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। वे ईमान न लाने के लिए विभिन्न प्रकार के बहाने बनाते और कहते थे कि इस पैग़म्बर के साथ कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं आता कि इनकी पैग़म्बरी की गवाही दे और हम भी उसे अपनी आंखों से देख लें।यह आयत ऐसी अनुचित मांग के उत्तर में पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहती है कि मानव इतिहास के आरंभ से ही सदैव ऐसे लोग रहे हैं जिन्होंने न केवल सत्य को स्वीकार नहीं किया बल्कि उसका परिहास भी करते रहे। आपसे पहले वाले पैग़म्बरों को भी इस प्रकार के लोगों का सामना रहा है अतः आप भी ऐसे लोगों को सहन करो कि उनका उत्तर ईश्वर के ज़िम्मे है और जब संसार या प्रलय में ईश्वरीय दंड उन्हें घेर लेगा तो उनकी समझ में आ जाएगा कि जिस बात का यह परिहास करते थे, वह सत्य थी।इस आयत से हमने सीखा कि सत्य के विरोधियों के पास तर्कसंगत बात नहीं होती। उनकी शैली सत्य और सत्यप्रेमियों के परिहास तथा अनादर पर आधारित होती है।दूसरों के साथ परिहासपूर्ण व्यवहार नहीं करना चाहिए कि यह बुरा रवैया काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों की शैली है।आइये अब सूरए अनआम की 11वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قُلْ سِيرُوا فِي الْأَرْضِ ثُمَّ انْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُكَذِّبِينَ (11)(हे पैग़म्बर! उनसे) कह दीजिए कि धरती में घूमो फिरो, फिर देखो कि (ईश्वरीय आयतों को) झुठलाने वालों का अंजाम क्या हुआ? (6:11)इस आयत में क़ुरआने मजीद, निश्चेतना की निंद्रा में सोने वालों और वास्तविकताओं को देखने से वंचित हो जाने वालों को जागृत करने के लिए, सिफ़ारिश करता है कि पिछली जातियों के इतिहास का अध्ययन करें और सत्य का इन्कार करने और उसे झुठलाने वालों के अंजाम की समीक्षा करें।बीते हुए लोगों के इतिहास के अध्ययन का एक सबसे अच्छा मार्ग उनके अवशेषों को देखना है कि जिस पर आजकल पर्यटन के उद्योग में विशेष ध्यान दिया जाता है। अलबत्ता केवल पुरातन अवशेषों को देखना पर्याप्त नहीं है बल्कि उन पर अतीत में बीती हुई घटनाओं से पाठ सीखना आवश्यक है।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम ने पुरातन अवशेषों की सैर की सिफ़ारिश की है जिससे अतीत की पहचान द्वारा मनुष्य के भविष्य में सही मार्ग पर चलने की भूमि प्रशस्त होती है।देखने की क्रिया मनुष्य और जानवरों दोनों ही में पायी जाती है। महत्त्वपूर्ण बात वस्तुओं को ध्यान से देखना और उनसे पाठ सीखना है।आइये सूरए अनआम की 12वीं और 13वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।قُلْ لِمَنْ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ قُلْ لِلَّهِ كَتَبَ عَلَى نَفْسِهِ الرَّحْمَةَ لَيَجْمَعَنَّكُمْ إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ لَا رَيْبَ فِيهِ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنْفُسَهُمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ (12) وَلَهُ مَا سَكَنَ فِي اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ (13)(हे पैग़म्बर! उनसे) कह दीजिए कि जो कुछ आकाशों और धरती में है, किसका है? कह दीजिए कि ईश्वर का है। उसने अपने ऊपर दया को आवश्यक कर दिया है। वह तुम सबको प्रलय के दिन एकत्रित करेगा जिसमे कोई संदेह नहीं है। केवल वही लोग ईमान नहीं लाएंगे जिन्होंने अपने आपको घाटे में डाल रखा है। (6:12) और उसी का है जो कुछ रात और दिन में स्थाई रहता है और वह सुनने वाला और जानकार है। (6:13)अनेकेश्वरवादियों के जवाब में पिछली आयत को आगे बढ़ाते हुए क़ुरआने मजीद इस आयत में कहता है कि संसार के आरंभ और अंत के बीच संबंध है। उस ईश्वर ने, जिसके बारे में तुम भी स्वीकार करते हो कि उसी ने ब्रह्मांड की रचना अपनी दया के आधार पर की है और जो कुछ है उसी का है, तुम्हें इस संसार में ऐसे ही नहीं छोड़ दिया है मृत्यु को तुम्हारे जीवन का अंत नहीं बनाया है बल्कि वह प्रलय के दिन तुम सबको एकत्रित करेगा और उसके पश्चात स्वर्ग या नरक में तुम्हारे जीवन को जारी रखेगा।अंत में आयत कहती है कि अलबत्ता जो लोग एकेश्वरवाद की अपनी पवित्र प्रवृत्ति और प्रकृति से मुंह मोड़ कर अपने घाटे का मार्ग प्रशस्त कर लेते हैं, वे इन वास्तविकताओं को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है और कभी भी ईमान नहीं लाएंगे।इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय का होना न केवल ईश्वर के न्याय व तत्वदर्शिता के आधार पर आवश्यक है बल्कि उसकी अपार दया व कृपा की भी मांग है कि मनुष्य का जीवन, मृत्यु के साथ समाप्त न हो जाए बल्कि किसी अन्य संसार में उसकी उपस्थिति की संभावना भी बनी रहे।यद्यपि हम ईश्वर को नहीं देखते और उसकी बात नहीं सुनते परंतु उसने हमसे बात की है। वह हमारी बातें सुनता है और हमारे कर्मों को देखता है।आइये सूरए अनआम की 14वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قُلْ أَغَيْرَ اللَّهِ أَتَّخِذُ وَلِيًّا فَاطِرِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَهُوَ يُطْعِمُ وَلَا يُطْعَمُ قُلْ إِنِّي أُمِرْتُ أَنْ أَكُونَ أَوَّلَ مَنْ أَسْلَمَ وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُشْرِكِينَ (14)(हे पैग़म्बर! उनसे) कह दीजिए कि क्या मैं ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य को अपना अभिवावक बना लूं जबकि वह आकाशों और धरती का रचयिता है। वही सबको रोज़ी देता है और किसी से रोज़ी नहीं लेता। कह दीजिए कि मुझे आदेश दिया गया है कि मैं सबसे पहला आज्ञापालक बनूं और देखो कदापि अनेकेश्वरवादियों में से न हो जाना। (6:14)मक्के के कुछ अनेकेश्वरवादी यह समझते थे कि पैग़म्बर अपनी दरिद्रता के कारण ईश्वर की ओर आमंत्रित करते हैं और ईश्वर का दूत या पैग़म्बर होने का दावा करते हैं। इसी कारण वे पैग़म्बर से कहते थे कि हम अपनी संपत्ति में आपको भी भागीदार बनाते हैं परंतु आप इस प्रकार के दावे छोड़ दीजिए।इसके उत्तर में ईश्वर, इस आयत में अपने पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहता है कि आप इन अनेकेश्वरवादियों से कह दीजिए कि जो कुछ तुम खाते हो और जो कुछ तुम्हारे पास है, वह सब ईश्वर ही का है। तुम्हारे पास अपना कुछ है ही नहीं कि मैं उसे लेकर ईश्वर को छोड़ दूं।मैंने उस ईश्वर को अपना अभिवावक बनाया है जिसने आकाशों और धरती की सृष्टि की है और मैं कदापि किसी को उसका समकक्ष नहीं ठहराऊंगा। मैं पहला व्यक्ति हूं जो उसके आदेशों के सामने नतमस्तक है।इस आयत से हमने सीखा कि संसार में ईश्वर के अतिरिक्त कोई शरणस्थल नहीं है। सारे मनुष्य चाहे दरिद्र हों या धनसंपन्न, ज्ञानी हों या अज्ञानी, छोटे हों या बड़े, उसी ईश्वर का दिया खाते हैं और सबको उसकी आवश्यकता है।पैग़म्बर का धर्म, इस्लाम है और इस्लाम स्वीकार करने के लिए आवश्यक है कि ईश्वर और उसके आदेशों के समक्ष नतमस्तक रहा जाए।