islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए अनआम, आयतें 103-106, (कार्यक्रम 217)

    सूरए अनआम, आयतें 103-106, (कार्यक्रम 217)

    Rate this post

    आइये सूरए अनआम की आयत नंबर 103 की तिलावत सुनते हैं।لَا تُدْرِكُهُ الْأَبْصَارُ وَهُوَ يُدْرِكُ الْأَبْصَارَ وَهُوَ اللَّطِيفُ الْخَبِيرُ (103)(लौकिक) निगाहें उसे नहीं पातीं परंतु वह निगाहों को पा लेता है और वह अत्यंत सूक्ष्मदर्शी और जानकार है। (6:103)इससे पहले हमने कुछ ऐसी आयतें सुनीं जिनमें ईश्वर की विशेषताओं का वर्णन किया गया था। ये विशेषताएं ईश्वर को मूर्तियों या उन समकक्षों से अलग करती हैं जिन्हें लोग ईश्वर के बराबर समझ लेते हैं।यह आयत भी ईश्वर की एक अन्य विशेषता की ओर संकेत करते हुए कहती है। न केवल विदित व लौकिक निगाहों बल्कि मानव बुद्धि में भी ईश्वर को पहचानने की क्षमता नहीं है, केवल उसके अस्तित्व को समझा और उसकी विशेषताओं को पहचाना जा सकता है परंतु इसके विपरीत ईश्वर न केवल मनुष्य के पूरे अस्तित्व से अवगत है बल्कि उसकी कही और देखी हुई बातों का भी उसे पूर्ण ज्ञान है। उसे देखा नहीं जा सकता परंतु वह सारी निगाहों और देखी जाने वाली बातों से अवगत है। ईश्वर अत्यंत सूक्ष्मदर्शी है, वह दिखाई नहीं देता परंतु छोटी से छोटी बात भी उसकी निगाहों से दूर नहीं।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर क्या है इसके बारे में नहीं सोचना चाहिए कि इससे पथभ्रष्टता का ख़तरा है।यद्यपि ईश्वर हमारी बुराइयों से अवगत है किन्तु फिर भी वह हम पर कृपा करता है और अपनी अनुकंपाओं से हमें वंचित नहीं रखता। आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 104 की तिलावत सुनते हैंقَدْ جَاءَكُمْ بَصَائِرُ مِنْ رَبِّكُمْ فَمَنْ أَبْصَرَ فَلِنَفْسِهِ وَمَنْ عَمِيَ فَعَلَيْهَا وَمَا أَنَا عَلَيْكُمْ بِحَفِيظٍ (104)निसंदेह तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम्हारे पास (आसमानी पुस्तकों के रूप में) तर्क आ चुके हैं तो जो सोच समझ से काम लेगा वह अपना लाभ करेगा और जो अंधा बन जाएगा तो वह अपना (ही) घाटा करेगा और मैं तुम लोगों (के ईमान) का रक्षक नहीं हूं। (6:104)पिछली आयतों में ईश्वर की कुछ विशेषताओं का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में क़ुरआन कहता है कि जो कुछ कहना चाहिए था, हमने कह दिया, सत्य के मार्ग को हमने स्पष्ट कर दिया, सही पहचान के लिए जो बातें आवश्यक थीं, उन्हें हमने तर्क के साथ पेश कर दिया किन्तु हम उसे स्वीकार करने के लिए किसी को विवश नहीं करते, जो कोई चाहे और स्वीकार करे तो इसमें उसी का लाभ है परंतु यदि कोई स्वीकार नहीं करना चाहता तो हम उसे विवश नहीं करते। कुफ़्र और ईमान के मार्ग का चयन करने में मनुष्य स्वतंत्र है और हर व्यक्ति अपनी इच्छा से अपने मार्ग का चयन करता है।इस आयत से हमने सीखा कि हमारा काम लोगों को नसीहत और उनका मार्गदर्शन करना है, हमें किसी को विवश करने का अधिकार नहीं है।कुछ लोगों का कुफ़्र, पैग़म्बरों की शिक्षाओं के असत्य होने की निशानी नहीं है बल्कि उनके हृदय के अंधे होने की निशानी है।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 105 की तिलावत सुनते हैं।وَكَذَلِكَ نُصَرِّفُ الْآَيَاتِ وَلِيَقُولُوا دَرَسْتَ وَلِنُبَيِّنَهُ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ (105)और इस प्रकार हमने (क़ुरआन की) आयतों को विभिन्न ढंग से पेश कर दिया है (परंतु काफ़िर ईमान नहीं लाएंगे) और कहेंगे कि तुमने (इन्हें कहीं से) पढ़ा है। और हमने जानने वालों के लिए सत्य स्पष्ट कर दिया है। (6:105)पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के काल में काफ़िर और अनेकेश्वरवादी पैग़म्बरे इस्लाम पर एक आरोप यह भी लगाते थे कि आपने यहूदियों के विद्वानों से शिक्षा प्राप्त की है और जो कुछ आप क़ुरआन और ईश्वरीय संदेश के रूप में पेश करते हैं वह वही है जो आपने उनसे पढ़ा और सीखा है। ये आपकी नहीं बल्कि दूसरों की बातें हैं।इसके उत्तर में ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को सांत्वना देते हुए कहता है कि आप इस प्रकार के आरोपों से दुखी न हों क्योंकि पढ़े लिखे लोग इस आरोप को स्वीकार नहीं करेंगे और उसके ग़लत होने की गवाही देंगे। आरोप लगाने वाले कोई तर्क और प्रमाण पेश नहीं करते क्योंकि इतिहास की दृष्टि मंं ऐसा कोई प्रमाण है ही नहीं जो यह सिद्ध करे कि पैग़म्बरे इस्लाम ने किसी से शिक्षा ग्रहण की हो।इसके अतिरिक्त क़ुरआन और तौरैत में बहुत अधिक मतभेद और अंतर है तथा क़ुरआन की दृष्टि से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के काल में मौजूद तौरैत में अत्यधिक फेर बदल किया जा चुका था।इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआन के विरोधी उसकी शिक्षाओं और बातों को स्वीकार करते हैं और यह नहीं कहते कि क़ुरआन की बातें निराधार हैं बल्कि वो यह कहते हैं कि इन बातों को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने अपने काल के विद्वानों से सीखा है।ज्ञान विज्ञान न केवल ये कि क़ुरआन की सत्यता को नहीं छिपाते बल्कि उसके सत्य होने की गवाही देते हैं।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 106 की तिलावत सुनते हैं।اتَّبِعْ مَا أُوحِيَ إِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ وَأَعْرِضْ عَنِ الْمُشْرِكِينَ (106)(हे पैग़म्बर! केवल) अपने पालनहार की ओर से आने वाले संदेश का अनुसरण कीजिए और अनेकेश्वरवदियों से मुंह मोड़ लीजिए कि उसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है। (6:106)काफ़िरों की ओर से पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम पर लगाए जाने वाले इस आरोप के मुक़ाबले में कि क़ुरआन ईश्वरीय संदेश नहीं बल्कि उनकी अपनी वे बातें हैं जो उन्होंने दूसरों से सीखी हैं, यह आयत पैग़म्बर से कहती है कि आप विरोधियों की बातों पर ध्यान न दें और केवल ईश्वरीय संदेश अर्थात वहि का अनुसरण करें कि सत्य केवल ईश्वर से संबंधित है और वह आपकी सत्यता की गवाही देता है।काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों के प्रति हमारा दायित्व केवल संदेश पहुंचाने और मार्गदर्शन तक ही सीमित है, यदि वे स्वीकार नहीं करते तो हमें उन्हें विवश करने का अधिकार नहीं है, अतः हम उन्हें उनके हाल पर छोड़ देते हैं।दूसरों को ईमान का निमंत्रण, आग्रह और निवेदन पर आधारित नहीं होना चाहिए कि वे यह सोचें कि हमें उनके ईमान की आवश्यकता है, बल्कि पहले चरण में अच्छी और तर्कसंगत बात द्वारा सत्य उनके कानों तक पहुंचाना चाहिए परंतु यदि वे स्वीकार न करें तो आग्रह नहीं करना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि सत्य के मार्ग में, आरोपों, अपमान और तुच्छता को सहन करना पड़ता है।पैग़म्बर भी ईश्वरीय संदेश के पालनकर्ता हैं और अपनी ओर से कोई निर्णय नहीं करते।