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    सूरए अनआम, आयतें 107-110, (कार्यक्रम 218)

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    आइये सूरए अनआम की आयत नंबर 107 की तिलावत सुनते हैं।وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا أَشْرَكُوا وَمَا جَعَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا وَمَا أَنْتَ عَلَيْهِمْ بِوَكِيلٍ (107)और यदि ईश्वर चाहता तो (सभी लोग विवश होकर ईमान ले आते और) किसी को उसका समकक्ष नहीं ठहराते (परंतु ईश्वरीय परंपरा ऐसी नहीं है) और हमने आपको इनका रक्षक नहीं बनाया है और न ही आप इनके उत्तरदायी हैं। (6:107)पिछली आयतों में अधिकांश लोगों के अनेकेश्वरवाद की ओर संकेत करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है। यह मत सोचो कि वे लोग ईश्वर के अधिकार और नियंत्रण से बाहर हैं बल्कि यदि वह चाहता तो कोई अनेकेश्वरवादी बन ही न पाता परंतु मनुष्य के बारे में ईश्वर का इरादा यह है कि वह अपने अधिकार और मर्ज़ी से काम लेते हुए अपने मार्ग का चयन करे।अतः ईश्वर पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहता है। आपको भी लोगों को ईमान लाने पर विवश करने का अधिकार नहीं है। आप लोगों के अभिभावक और उत्तरदायी नहीं हैं। दूसरे शब्दों में ईश्वर चाहता है कि सभी लोग ईमान लाएं, इसी लिए उसने पैग़म्बरों को भेजा, परंतु वो यह भी चाहता है कि लोग अपनी मर्ज़ी और इच्छा से यह काम करें और धर्म को स्वीकार करने में विवश न हों।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने मनुष्यों को अपने मार्ग के चयन का अधिकार दे रखा है और अनेकेश्वरवादियों का अस्तित्व इसका प्रमाण है।पैग़म्बरों और धर्म के प्रचारकों का दायित्व लोगों का मार्गदर्शन करना है न कि धर्म स्वीकार करने के लिए उन्हें विवश करना। आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 108 की तिलावत सुनते हैं।وَلَا تَسُبُّوا الَّذِينَ يَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ فَيَسُبُّوا اللَّهَ عَدْوًا بِغَيْرِ عِلْمٍ كَذَلِكَ زَيَّنَّا لِكُلِّ أُمَّةٍ عَمَلَهُمْ ثُمَّ إِلَى رَبِّهِمْ مَرْجِعُهُمْ فَيُنَبِّئُهُمْ بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (108)और उन लोगों को बुरा भला न कहो जो ईश्वर के अतिरिक्त किसी और को पुकारते हैं कि वे भी शत्रुता से (और) बिना सोचे समझे ईश्वर को बुरा भला कहेंगे। इस प्रकार हमने हर जाति के कर्म को उसके लिए सजा कर पेश कर दिया है। इसके बाद सबकी वापसी उनके पालनहार ही की ओर है और तब वह उन्हें उनके कर्मों से अवगत कराएगा। (6:108)पिछली आयत में पैग़म्बर व अन्य ईमान वालों को, धर्म स्वीकार करने के लिए अनेकेश्वरवादियों को विवश करने से रोकने के पश्चात यह आयत उन्हें किसी भी प्रकार की यातना देने और बुरा भला कहने से रोकती है और कहती है कि अनेकेश्वरवादियों और उनके देवताओं को बुरा भला मत कहो कि वे शत्रुता और प्रतिशोध में तुम्हारे ईश्वर को बुरा भला कहेंगे। जब तुम्हारे पास तर्क है तो बुरा भला कहने के स्थान पर तर्कसंगत ढंग से उन्हें निमंत्रण दो। यदि वे चाहेंगे तो स्वीकार करेंगे और नहीं चाहेंगे तो नहीं सुनेंगे, इसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई दायित्व नहीं है।आगे चलकर आयत कहती है कि हर गुट अपने विश्वासों से गहरा लगाव रखता है और अपने कर्मों को अच्छा समझता है परंतु प्रलय में वास्तविकताएं स्पष्ट हो जाएंगी। ईश्वर हर गुट को उनके कर्मों की सूचना देगा और हर गुट को पता चल जाएगा कि उसने क्या किया है।इस आयत से हमने सीखा कि विरोधियों से अपने व्यवहार के परिणामों पर ध्यान देना चाहिए। कभी उनकी प्रतिक्रिया ऐसी होती है कि हमें चुप रहना चाहिए।धिक्कार व विरक्तता और गाली-गलौच में अंतर है। विरक्तता, कुफ़्र,अनेकेश्वरवाद तथा अत्याचार से अलग एक प्रकार से अपनी नीति की घोषणा है कि हम उनसे विरक्त हैं।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 109 की तिलावत सुनते हैं।وَأَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ لَئِنْ جَاءَتْهُمْ آَيَةٌ لَيُؤْمِنُنَّ بِهَا قُلْ إِنَّمَا الْآَيَاتُ عِنْدَ اللَّهِ وَمَا يُشْعِرُكُمْ أَنَّهَا إِذَا جَاءَتْ لَا يُؤْمِنُونَ (109)और उन्होंने ईश्वर की बड़ी-2 सौगन्ध खाई कि यदि उनके लिए ईश्वर की कोई निशानी या चमत्कार आए तो वे अवश्य उसपर ईमान ले आएंगे। कह दीजिए कि चमत्कार और निशानियां तो केवल ईश्वर के हाथ में हैं और तुम्हें क्या पता कि यदि चमत्कार और निशानियां आ भी जाएं, तब भी ये ईमान नहीं लाएंगे। (6:109)पैग़म्बरे इस्लाम के काल में काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों का एक बहाना यह था कि पैग़म्बर हर वह चमत्कार क्यों नहीं दिखाते जो हम चाहते हैं। इस आयत में ईश्वर पैग़म्बर से कहता है कि उनसे कह दीजिए कि चमत्कार मेरे हाथ में नहीं है कि जब तुम लोग कहो मैं उसे पेश कर दूं। चमत्कार तो ईश्वर के हाथ में है और जब वह उचित समझता है उसे लोगों को दिखाता है।मूल रूप से चमत्कार अपनी ओर से दायित्व समाप्ति की घोषणा के लिए होता है न कि लोगों की मांग पूरी करने के लिए। इसके अतिरिक्त लोगों की बहुत सी मांगें सत्य के विरुद्ध होती हैं, जिस प्रकार से कि कुछ लोग ईश्वर को देखने की मांग करते हैं, जबकि यह संसार अनेकेश्वरवादियों के हाथ का खिलौना नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि विरोधियों की झूठी सौगन्धों के धोखे में नहीं आना चाहिए कि जो प्रायः अपने दावों पर अत्यधिक बल देते हैं।कुफ़्र की जड़, सांप्रदायिकता और हठधर्म में है कि हर चमत्कार को देखने के बाद भी सत्य को स्वीकार नहीं करते।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 110 की तिलावत सुनते हैं।وَنُقَلِّبُ أَفْئِدَتَهُمْ وَأَبْصَارَهُمْ كَمَا لَمْ يُؤْمِنُوا بِهِ أَوَّلَ مَرَّةٍ وَنَذَرُهُمْ فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ (110)और जिस प्रकार से ये आरंभ में ईमान नहीं लाए थे, इस बार भी हम इनके हृदयों और आंखों को उलट देंगे और इन्हें इनकी उद्दंडता में छोड़ देंगे कि (उसी में) भटकते फिरें। (6:110)कुफ़्र और हठधर्म के कारण धीरे-2 मनुष्य में से सत्य और वास्तविकताओं को देखने, सुनने और समझने की क्षमता समाप्त हो जाती है, यहां तक कि वह सत्य को असत्य और असत्य को सत्य देखने और समझने लगता है।क़ुरआन कहता है कि यह ईश्वरीय सृष्टि की परंपरा है कि कुफ़्र, भटकने और मार्ग से विचलित होने का कारण बनता है क्योंकि मनुष्य की दृष्टि बिल्कुल उल्टी हो जाती है और वह सृष्टि के लक्ष्य को नहीं देखता।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर तथा पैग़म्बर पर ईमान के लिए स्वस्थ और पवित्र हृदय की आवश्यकता है। द्वेष, हठधर्म और वासना से दूषित हृदय, सत्य स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता।ईश्वर और उसके मार्ग से दूरी, संसार में निराशा और पथभ्रष्टता का कारण बनती है।