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    सूरए अनआम, आयतें 111-114, (कार्यक्रम 219)

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    आइये सूरए अनआम की आयत नंबर 111 की तिलावत सुनते हैंوَلَوْ أَنَّنَا نَزَّلْنَا إِلَيْهِمُ الْمَلَائِكَةَ وَكَلَّمَهُمُ الْمَوْتَى وَحَشَرْنَا عَلَيْهِمْ كُلَّ شَيْءٍ قُبُلًا مَا كَانُوا لِيُؤْمِنُوا إِلَّا أَنْ يَشَاءَ اللَّهُ وَلَكِنَّ أَكْثَرَهُمْ يَجْهَلُونَ (111)और यदि हम उनकी ओर फ़रिश्तों को भेजते और मरे हुए (लोग) उनसे बात करते और हम उनके समक्ष हर वस्तु ले आते तब भी वे ईमान नहीं लाते सिवाए इसके कि ईश्वर चाहे, परंतु उनमें से अधिकांश (लोग) अज्ञानी हैं। (6:111)इससे पहले हमने कहा था कि अधिकांश लोगों के कुफ़्र का कारण हठधर्म होता है कि वे सत्य बात को स्वीकार नहीं करना चाहते, ऐसा नहीं है कि वे सत्य को समझते ही नहीं। इस आयत में भी क़ुरआने मजीद कहता है कि काफ़िरों का एक आग्रह यह था कि फ़रिश्ते उनके पास आएं जबकि उनमें इस बात की क्षमता नहीं थी। इसके अतिरिक्त क़ुरआने मजीद की दूसरी आयतों के अनुसार, फ़रिश्ते यदि दिखाई देते हैं तो मनुष्यों के रूप में ही दिखाई देते हैं, जिस प्रकार से कि वे इज़रत इब्राहीम और हज़रत लूत के सामने प्रकट हुए थे कि इस स्थिति में भी काफ़िर उनके फ़रिश्ते होने से इन्कार कर देते।उनका दूसरा आग्रह यह था कि ईसा मसीह के चमत्कार की भांति पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम भी मुर्दों को जीवित करें परंतु क्या जिन लोगों ने ईसा मसीह का यह चमत्कार देखा था वे सब उन पर ईमान ले आए थे? क़ुरआने मजीद कहता है कि जब तक उनके हृदय में हठधर्म और द्वेष रहेगा तब तक वे ईमान नहीं लाएंगे। चाहे फ़रिश्ते आकाश से आ जाएं या मरे हुए लोग धरती से निकलकर उनसे बातें करें या जो कुछ वे चाहें उनके समक्ष ले आया जाए। वे लोग इन बातों को जादू बताकर रद्द कर देंगे, जैसा कि उन्होंने पिछले पैग़म्बरों के साथ किया था।इस आयत से हमने सीखा कि ईमान के लिए केवल जानना पर्याप्त नहीं है बल्कि चाहना भी आवश्यक है।संसार के सारे ही लोग ईमान नहीं लाएंगे क्योंकि ईश्वर चाहता है कि लोग अपनी इच्छा से चयन करें।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 112 की तिलावत सुनते हैं।وَكَذَلِكَ جَعَلْنَا لِكُلِّ نَبِيٍّ عَدُوًّا شَيَاطِينَ الْإِنْسِ وَالْجِنِّ يُوحِي بَعْضُهُمْ إِلَى بَعْضٍ زُخْرُفَ الْقَوْلِ غُرُورًا وَلَوْ شَاءَ رَبُّكَ مَا فَعَلُوهُ فَذَرْهُمْ وَمَا يَفْتَرُونَ (112)और इसी प्रकार हमने हर पैग़म्बर के लिए मनुष्यों और जिन्नों के शैतानों को शत्रु बनाया है, इनमें से कुछ, कुछ अन्य के मन में धोखे से चिकनी चुपड़ी बातें डालते हैं और यदि तुम्हारा पालनहार चाहता तो वे ऐसा न कर पाते तो आप उन्हें उनके झूठ और आरोप के साथ छोड़ दें। (6:112)पिछली आयत के क्रम को जारी रखते हुए यह आयत कहती है कि मनुष्यों और जिन्नों का यह गुट, जो पैग़म्बरों की शिक्षाओं को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है और उनका प्रतिरोध करता है तो यह ईश्वर की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण परंपरा है अर्थात मनुष्य की स्वेच्छा का अधिकार। ईश्वर ने जिस प्रकार से सबसे बड़े शैतान इबलीस को, कि जो एक जिन्न था, उसकी उद्दंडता के कारण दंडित किया और उसे मोहलत दी, उसी प्रकार ईश्वर ने सभी मनुष्यों को यह अधिकार दिया है कि वे चाहें तो उसके संदेश अर्थात वहि को स्वीकार न करें और वह उन्हें मोहलत देता है कि अपनी आयु के अंत तक अपने मार्ग से पीछे न हटें।ईश्वर की यह परंपरा इस प्रकार से जारी है कि कुछ लोगों ने यह सोच लिया है कि ईश्वर स्वयं चाहता है कि शैतान, पैग़म्बरों के मुक़ाबले में डट जाए और लोगों का एक गुट काफ़िर रहे।आयत आगे चलकर कहती है कि काफ़िरों द्वारा कही जाने वाली अनेक बातें, शैतान की बातें हैं जो वह उनके मन में डालकर उन्हीं की ज़बान पर ले आता है। अतः हे पैग़म्बर, आप उनके विरोध की चिंता बिल्कुल न करें और उनको उन्हीं के हाल पर छोड़ दें क्योंकि आपका काम नसीहत और मार्गदर्शन करना है न कि ईमान के लिए विवश करना।इस आयत से हमने सीखा कि सत्य और असत्य के बीच मानव इतिहास के हर काल में संघर्ष रहा है, यह किसी ख़ास समय से विशेष नहीं है।सुन्दर और धोखा देने वाले शब्दों और बातों की ओर से सदा की सावधान रहना चाहिए क्योंकि शैतानी और ग़लत प्रचार प्रायः ऐसे ही होते हैं।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 113 की तिलावत सुनते हैं।وَلِتَصْغَى إِلَيْهِ أَفْئِدَةُ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآَخِرَةِ وَلِيَرْضَوْهُ وَلِيَقْتَرِفُوا مَا هُمْ مُقْتَرِفُونَ (113)और (वे ऐसा इसलिए करते हैं कि) जिन लोगों का प्रलय पर ईमान नहीं है उनके हृदय, उसकी ओर आकृष्ट हो जाएं और वो उसे पसंद कर लें और फिर वे उस वस्तु को प्राप्त कर लें जिसे वे प्राप्त करना चाहते थे। (6:113)यह आयत सत्य के शत्रुओं के प्रचारों की ओर संकेत करते हुए कहती है कि हमें हर किसी की बातें ध्यान से नहीं सुननी चाहिए कि शैतान का अनुसरण करने वाले इतनी सुन्दर और मनमोहक बातें करते हैं कि प्रलय पर दृढ़ ईमान और विश्वास रखने वाला भी उनकी बातों पर मंत्रमुग्ध होकर उन्हें धीरे-2 स्वीकार कर लेता है और उनका उद्देश्य पूरा हो जाता है।यदि कोई शैतानी बातों को सुने ही नहीं तो वे अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाएंगे। वे जैसे ही यह देखते हैं कि कुछ लोग उनकी बैठक में आए हैं और उनकी बातों को सुन रहे हैं तो उनका उत्साह बढ़ जाता है और वे उन लोगों के बीच प्रभाव बना लेते हैं।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 114 की तिलावत सुनते हैंأَفَغَيْرَ اللَّهِ أَبْتَغِي حَكَمًا وَهُوَ الَّذِي أَنْزَلَ إِلَيْكُمُ الْكِتَابَ مُفَصَّلًا وَالَّذِينَ آَتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَعْلَمُونَ أَنَّهُ مُنَزَّلٌ مِنْ رَبِّكَ بِالْحَقِّ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُمْتَرِينَ (114)(हे पैग़म्बर! उनसे कह दीजिए कि इतने सारे स्पष्ट तर्कों के बावजूद भी) क्या मैं ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य को फ़ैसला करने वाले के रूप में खोजूं? जबकि उसी ने आसमानी किताब को तुम्हारे पास विस्तार से भेजा है और जिन्हें हमने किताब दी है वे जानते हैं कि यह किताब भी आपके पालनहार की ओर से, सत्य के साथ उतारी गयी है, अतः आप संदेह करने वालों में कदापि शामिल न हों। (6:114)यह आयत जो यहूदियों और ईसाईयों के बारे में है कहती है कि इन्होंने पैग़म्बर को देखा है और उनकी बातें भी सुनी हैं तथा जानते हैं कि उनकी बातें हज़रत ईसा और हज़रत मूसा की बातों के समान हैं और उनकी किताब तौरैत व इंजील की ही भांति है परंतु फिर भी वे उन पर और उनकी किताब पर ईमान लाने के लिए तैयार नहीं हैं और हज़रत ईसा तथा हज़रत मूसा के चमत्कारों जैसे चमत्कारों की मांग, बहाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। अतः आयत मुसलमानों को सचेत करती है कि वे अपनी सत्यता में संदेह न करें।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम की सत्यता का एक तर्क, तौरैत तथा इंजील में पिछले पैग़म्बरों द्वारा दी गयी ख़ुशख़बरी है।अन्य लोगों का कुफ़्र, सत्य के मार्ग के असत्य होने का तर्क नहीं है। सत्य और असत्य का मानदंड, लोगों का मानना या न मानना नहीं है बल्कि इनका अपना मानदंड है।