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    सूरए अनआम, आयतें 115-119, (कार्यक्रम 220)

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    आइये सूरए अनआम की आयत संख्या 115 की तिलावत सुनते हैं।وَتَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ صِدْقًا وَعَدْلًا لَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَاتِهِ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ (115)तुम्हारे पालनहार का कथन (क़ुरआन) सत्य और न्याय में सबसे महत्त्वपूर्ण है, उसके शब्दों को बदलने वाला कोई नहीं है और वह सुनने वाला तथा जानकार है। (6:115)हमने जाना कि क़ुरआन के उतरने के समय, यहूदियों और इसाईयों के कुछ विद्वान मदीना नगर में मौजूद थे और वे इस किताब के आसमानी होने से अवगत भी थे, परंतु अपने विभिन्न हितों के कारण वे इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए। यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती हैः आप इस बात से दुःखी न हों कि वे आपकी सत्यता की गवाही नहीं देते क्योंकि ईश्वर इस बात की गवाही देता है कि उसने अपने सबसे अच्छे कथन को आपके पास भेजा है कि जो सत्य पर आधारित है।इस कथन में कि जो समाज में न्याय लागू करने हेतु अत्यंत परिपूर्ण ईश्वरीय आदेशों के लिए हुए है, कभी भी परिवर्तित नहीं होगा जबकि पिछले पैग़म्बरों की किताबों में, उनके अनुयाइयों के हाथों फेर-बदल हो चुका है।इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआन मनुष्य के लिए ईश्वर का सबसे परिपूर्ण और व्यापक कथन है, इसी कारण इस्लाम अंतिम आसमानी धर्म है।क़ुरआने मजीद के सभी क़ानूनों के आधार पर सत्य, सत्यवाद, न्याय, सच्चाई और सत्य की खोज है।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 116 की तिलावत सुनते हैंوَإِنْ تُطِعْ أَكْثَرَ مَنْ فِي الْأَرْضِ يُضِلُّوكَ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ إِنْ يَتَّبِعُونَ إِلَّا الظَّنَّ وَإِنْ هُمْ إِلَّا يَخْرُصُونَ (116)(हे पैग़म्बर!) यदि आप धरती पर रहने वाले अधिकांश लोगों का अनुसरण करेंगे तो वे आपको ईश्वर के मार्ग से विचलित कर देंगे (क्योंकि) वे कल्पना व अनुमान के अतिरिक्त किसी बात का अनुसरण नहीं करते। वे तो केवल अटकलें ही लगाते हैं। (6:116)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम और उनके अनुयाइयों को संबोधित करते हुए कहती हैः अब जबकि तुम्हारे पास ईश्वर की ओर से सत्य कथन आ चुका है तो तुम दूसरों के विचारों और मतों के अनुसरण के बारे में मत सोचो चाहे उनकी संख्या कितनी ही अधिक क्यों न हो क्योंकि संख्या का अधिक होना, सत्यता का तर्क नहीं है विशेषकर ऐसे समाज में जहां अधिकांश लोग तर्क तथा बुद्धि के आधार काम नहीं करते बल्कि रीति रिवाजों, प्रथाओं और विचारों के आधार पर जीवन बिताते हों।मूल रूप से ईश्वरीय पैग़म्बर, अपने समाज के अधिकांश लोगों के विश्वासों के विपरीत अपना निमंत्रण आरंभ करते हैं। यदि मानदंड लोगों की बड़ी संख्या हो तो किसी भी पैग़म्बर को भेजे जाने या अनेकेश्वरवादियों और काफ़िरों के दृष्टिकोण के विपरीत कोई बात कहने की आवश्यकता नहीं है।अबलत्ता कुछ मामलों में समाज के अधिकतर लोगों के मतों को मानदंड माना जाता है जैसे प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति पद के चुनाव परंतु इससे उक्त पद के लिए उनकी वास्तविक योग्यता को सिद्ध नहीं होती। यही कारण है कि संभावित रूप से किसी मंत्री को मत देने वाले सांसद उसके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव भी लाते हैं।कुल मिलाकर यह कहना चाहिए कि किसी विश्वास या दृष्टिकोण का सही या ग़लत होना, लोगों के स्वीकार या अस्वीकार करने से सिद्ध नहीं होता। सिगरेट पीना बुरा है अब यदि संसार के सभी लोग सिगरेट पियें तब भी यह बुराई बाक़ी रहेगी। इसी प्रकार से सच बोलना अच्छी बात है, चाहे संसार के सभी लोग झूठे हों।इस आयत से हमने सीखा कि वास्तविक मार्गदर्शन सत्य और क़ुरआन के मार्ग पर चलने से प्राप्त होता है न कि अधिकांश लोगों के मार्ग पर चलने से।विश्वास और आस्था में, बहुमत और बहुसंख्या सत्यता का तर्क नहीं है केवल सामाजिक मामलों में बहुमत को देखा जा सकता है और इसमें भी वह समाधान है न कि सत्य का मार्ग।सत्य और तर्क के आधार को ही स्वीकार करके कर्म करना चाहिए। सत्य के स्थान पर सोच, अनुमान, कल्पना और वासना का अनुसरण नहीं करना चाहिए।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 117 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ مَنْ يَضِلُّ عَنْ سَبِيلِهِ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ (117)निसंदेह, तुम्हारा पालनहार उसके मार्ग से विचलित हो जाने वालों और मार्गदर्शन प्राप्त करने वालों से, सबसे अधिक अवगत है। (6:117)अब जबकि यह स्पष्ट हो गया कि अधिकांश लोगों का मत, किसी बात के सत्य होने को नहीं दर्शात तो फिर सत्य का मार्ग ईश्वर से प्राप्त करके उसका अनुसरण करना चाहिए चाहे सत्य के मानने और अनुसरण करने वालों की संख्या कम ही क्यों न हो।सत्य और असत्य की पहचान के लिए वर्तमान और भविष्य के मामलों के परिणामों के व्यापक ज्ञान की आवश्यकता होती है और यह बात केवल ईश्वर के लिए ही संभव है जिसका ज्ञान अनंत है अतः ईश्वर सबसे बेहतर जानता है कि मार्गदर्शन और पथभ्रष्टता का मार्ग क्या है। वह पथभ्रष्ट होने वालों और मार्गदर्शन प्राप्त करने वालों को भलिभांति पहचानता है। अलबत्ता मनुष्य भी अपनी बुद्धि की सहायता से, किसी सीमा तक सत्य और असत्य को पहचान सकता है परंतु मनुष्य के ग़लती की संभावना वाले सीमित ज्ञान और ईश्वर के सटीक और असीम ज्ञान की तुलना कहां की जा सकती है।यही कारण है कि आय आयत पिछली आयत की बातों पर बल देते हुए कहती है कि ऐसे ईश्वर की बातों का अनुसरण करो कि जो तुमसे अधिक ज्ञानी है और अपने ज्ञान के आधार पर तुम्हारा मार्गदर्शन करता है।इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य के पास यद्यपि बुद्धि और ज्ञान है परंतु ईश्वर सबसे अधिक जानकार और ज्ञानी है तथा बुद्धि कहती है कि सबसे अधिक जानकार का अनुसरण करो।यह नहीं सोचना चाहिए कि जिस दिखावे और मिथ्या से हम दूसरों को धोखा देते हैं उससे ईश्वर को भी धोखा दिया जा सकता है। वह हर प्रत्यक्ष और परोक्ष का जानने वाला है और पथभ्रष्टों एवं मार्गदर्शन प्राप्त करने वालों को सबसे अधिक पहचानता है।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 118 और 119 की तिलावत सुनते हैं।فَكُلُوا مِمَّا ذُكِرَ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ إِنْ كُنْتُمْ بِآَيَاتِهِ مُؤْمِنِينَ (118) وَمَا لَكُمْ أَلَّا تَأْكُلُوا مِمَّا ذُكِرَ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ وَقَدْ فَصَّلَ لَكُمْ مَا حَرَّمَ عَلَيْكُمْ إِلَّا مَا اضْطُرِرْتُمْ إِلَيْهِ وَإِنَّ كَثِيرًا لَيُضِلُّونَ بِأَهْوَائِهِمْ بِغَيْرِ عِلْمٍ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِالْمُعْتَدِينَ (119)यदि तुम ईश्वर की आयतों पर ईमान रखते हो तो केवल उन्हीं वस्तुओं में से खाओ जिन पर ईश्वर का नाम लिया गया हो। (6:118) तुम्हें क्या हो गया है कि तुम उन वस्तुओं में से नहीं खाते जिन पर ईश्वर का नाम लिया गया है। (अर्थात तुमने ईश्वर द्वारा वैध की गयी वस्तुओं को अपने लिए वर्जित कर लिया है) जबकि ईश्वर ने स्वयं विस्तार से उन वस्तुओं का वर्णन कर दिया है जो उसने तुम्हारे लिए वर्जित की हैं, या जिन्हें खाने के लिए तुम विवश हो। और निसंदेह, बहुत से लोग, दूसरों को अपनी अज्ञानतापूर्ण आंतरिक इच्छाओं से पथभ्रष्ट कर देते हैं और निसंदेह, ईश्वर इन अतिक्रमणकारियों से पूर्णतः अवगत है। (6:119)ये आयतें जीवन में अनेकेश्वरवाद के एक स्पष्ट उदाहरण की ओर संकेत करते हुए कहती है कि ईश्वर के मार्ग से दूरी, पथभ्रष्टता यहां तक कि खाने-पीने में भी असंतुलन और अतिश्योक्ति का कारण बनती है। कुछ लोग स्वयं को इस बात की अनुमति देते हैं कि जिस पशु को ही चाहें मार कर खा जाएं और वे इस संबंध में किसी सीमा का पालन नहीं करते, जबकि कुछ अन्य लोगों ने हर प्रकार के पशुओं के मांस को वर्जित कर लिया है। क़ुरआने मजीद कहता है कि यह दोनों ही मार्ग ग़लत हैं। सत्य का मार्ग यह है कि उन पशुओं को ज़िबह करके तुम उनका मांस खा सकते हो जिनकी अनुमति ईश्वर ने दी है परंतु ज़िबह करते समय ईश्वर का नाम लेना आवश्यक है।किसी को भी इस बात की अनुमति नहीं है कि वह ईश्वर की आज्ञा के बिना किसी भी पशु की जान ले क्योंकि वही पशुओं का वास्तविक स्वामी है। इसी प्रकार से ज़िबह करते समय ईश्वर का नाम लेना पोषण के मामले में ईमान को प्रकट करने के अर्थ में है। जिस प्रकार से तुम्हारे शरीर के स्वास्थ्य के लिए मांस का ठीक होना आवश्यक है उसी प्रकार से ईश्वर का नाम और उसकी याद इस बात का कारण बनती है कि तुम्हारी आत्मा इस भोजन को अपनी प्रगति और परिपूर्णता के लिए प्रयोग करे।आगे चलकर आयत कहती है कि ईश्वर को यह बात पसंद है कि जिस प्रकार तुम उसके द्वारा वर्जित की गयी वस्तुओं से बचते और उनसे दूर रहते हो, उसी प्रकार उसने जिन वस्तुओं को हलाल या वैध घोषित किया, उन्हें प्रयोग करो। इस प्रकार की अतिशयोक्ति अज्ञानी लोगों की आंतरिक इच्छाओं के कारण होती है और यह एक प्रकार का अतिक्रमण है, ईश्वरीय और मानवाधिकारों का हनन तथा अतिक्रमण।इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान वालों के खानों और भोजन का भी ईश्वरीय आयाम होना चाहिए क्योंकि लोगों का धर्म उनके संसार से अलग नहीं तथा वैध व हलाल भोजन ईमान की शर्त है।मनुष्य का आहार पेट और मन की अनुचित इच्छाओं के लिए नहीं बल्कि ईश्वरीय आदेशों के अंतर्गत होना चाहिए।अत्यंत विवशता के समय, आवश्यकता भर वर्जित वस्तुओं में से खाना वैध है क्योंकि इस्लाम में बंद गली नहीं है।