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    सूरए अनआम, आयतें 120-122, (कार्यक्रम 221)

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    आइये सूरए अनआम की आयत नंबर 120 की तिलावत सुनते हैं।وَذَرُوا ظَاهِرَ الْإِثْمِ وَبَاطِنَهُ إِنَّ الَّذِينَ يَكْسِبُونَ الْإِثْمَ سَيُجْزَوْنَ بِمَا كَانُوا يَقْتَرِفُونَ (120)और (हे ईमान वालो!) प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष पापों को छोड़ दो। निसंदेह जो लोग पाप करते हैं शीघ्र ही उन्हें उनके किए का फल दिया जाएगा। (6:120)यह आयत उन लोगों को, जो ईश्वर और पैग़म्बर पर ईमान रखते हैं, हर प्रकार के पापों से रोकती है, चाहे वे खुलकर और स्पष्ट रूप से किए जाएं या लोगों की दृष्टि से दूर और छिपकर किए जाएं।इसके अतिरिक्त हर पाप का एक प्रत्यक्ष रूप होता है जो दिखाई पड़ता है जबकि उसके अप्रत्यक्ष रूप के घातक प्रभाव मनुष्य की मानस और आत्मा पर पड़ते हैं। पाप, विषाक्त भोजन की भांति है कि जो स्वादिष्ट होता परंतु धीरे-धीरे मनुष्य के शरीर को निर्जीव बनाता चला जाता है।खाने पीने की वर्जित वस्तुओं का भी शायद अच्छा स्वाद हो परंतु मनुष्य के हृदय पर उनका प्रभाव ऐसा होता है कि हृदय धीरे-धीरे पत्थर की भांति कड़ा हो जाता है।आगे चलकर आयत कहती है कि लोक परलोक में मिलने वाला ईश्वरीय दंड, स्वयं मनुष्य के कर्मों का परिणाम होता है, ईश्वर किसी को अकारण दंडित नहीं करता।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम मनुष्य के प्रकट रूप की पवित्रता पर भी ध्यान देता है। व्यवहारिक पापों से भी दूर रहना चाहिए और लोगों के संबंध में बुरे विचारों जैसे आत्मिक पापों से भी बचना चाहिए।यद्यपि शैतान, मनुष्य को पाप करने पर उकसाता रहता है परंतु वह मनुष्य से उसका संकल्प नहीं छीनता और हर कोई अपनी इच्छा से पाप की ओर जाता है।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 121 की तिलावत सुनते हैंوَلَا تَأْكُلُوا مِمَّا لَمْ يُذْكَرِ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ وَإِنَّهُ لَفِسْقٌ وَإِنَّ الشَّيَاطِينَ لَيُوحُونَ إِلَى أَوْلِيَائِهِمْ لِيُجَادِلُوكُمْ وَإِنْ أَطَعْتُمُوهُمْ إِنَّكُمْ لَمُشْرِكُونَ (121)और जिस (पशु) पर ईश्वर का नाम न लिया गया हो उसे न खाओ कि निसंदेह यह अवज्ञा है। और निश्चित रूप से शैतान अपने साथियों के मन में यह बात डालते हैं कि वे तुमसे (वर्जित खानों के बारे में) झगड़ा करें और यदि तुम उनका अनुसरण करोगे तो उन्हीं की भांति अनेकेश्वरवादी हो जाओगे। (6:121)चूंकि ईश्वरीय धर्म, लोक-परलोक में मनुष्य के कल्याण के लिए हैं अतः उसके आदेशों का एक भाग, खाने पीने जैसी सांसारिक बातों से संबंधित है। इस्लाम ने खाने पीने के विषय पर विशेष ध्यान दिया है और प्रकृति में पायी जाने वाली ईश्वरीय अनुकंपाओं से लाभान्वित होने का आदेश देने के साथ ही कुछ वस्तुओं को वर्जित किया है कि जो ईश्वर के ज्ञान और तत्वदर्शिता के दृष्टिगत, मनुष्य के शरीर या आत्मा के लिए हानिकारक हैं।एक वर्जित खाना, मरे हुए पशु का मांस है। अरब के कुछ लोग कहते थे कि अपने आप मरने वाले या ज़िबह किए जाने वाले पशु के बीच क्या अंतर है बल्कि अपने आप मरने वाला पशु बेहतर है क्योंकि उसे ईश्वर मारता है जबकि ज़िबह किया गया पशु, मनुष्य के हाथों मरता है।यह बात एक शैतानी विचार के अतिरिक्त कुछ नहीं क्योंकि अपने आप मरने वाला पशु प्रायः रोग ग्रस्त होता है और ऐसे पशु का मांस, मनुष्य के लिए हानिकारक होता है परंतु जिस पशु को ज़िबह किया जाता है उसके शरीर और रगों से रक्त निकल जाता है और उसका मांस बेहतर होता है।इससे अधिक महत्त्वपूर्ण बात, पशु को ज़िबह करते समय ईश्वर का नाम लेना है जो यह दर्शाता है कि एक ईमान वाले व्यक्ति का आहार, ईश्वरीय आयाम लिए हुए होता है। जिस प्रकार से नमाज़ क़िबले की ओर मुंह करके तथा ईश्वर के नाम से पढ़ी जाती है उसी प्रकार, उस पशु को भी क़िबले की ओर मुंह करके तथा ईश्वर के नाम के साथ ज़िबह करना चाहिए जो मनुष्य की कोशिकाओं में परिवर्तित होने वाला है।इस आयत से हमने सीखा कि खाने पीने के मामले में भी, अपने धार्मिक दायित्वों का पालन करना चाहिए। ईमान वाले व्यक्ति का आहार भी, ईश्वरीय दिशा लिए हुए होता है।वर्जित वस्तुओं को खाने के संबंध में शैतान के बहकावे, मनुष्य की आत्मा और मानस पर इन वस्तुओं के नकारात्मक प्रभाव को दर्शाते हैं।अनेकेश्वरवादियों का अनुसरण, बात तथा विचारधारा तक में, ईमान से दूरी का कारण बनता है।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 122 की तिलावत सुनते हैंأَوَمَنْ كَانَ مَيْتًا فَأَحْيَيْنَاهُ وَجَعَلْنَا لَهُ نُورًا يَمْشِي بِهِ فِي النَّاسِ كَمَنْ مَثَلُهُ فِي الظُّلُمَاتِ لَيْسَ بِخَارِجٍ مِنْهَا كَذَلِكَ زُيِّنَ لِلْكَافِرِينَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (122)क्या वह व्यक्ति जो मरा हुआ था फिर हमने उसे जीवित किया और उसे प्रकाश दिया जिसके माध्यम से वह लोगों के बीच चलता है, उस व्यक्ति की भांति हो सकता है जो अंधकारों में (पड़ा हुआ) हो और उनसे निकल भी न सकता हो। इसी प्रकार काफ़िरों के लिए उनके कर्मों को सजा दिया गया है। (6:122)इतिहास में वर्णित है कि जिस समय पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के चाचा हज़रत हम्ज़ा, ईमान लाए और पैग़म्बरे इस्लाम को यातनाएं देने वाले अबू जहल जैसे लोगों के समक्ष डट गये, उस समय ईश्वर की ओर से यह आयत आई जिसमें उनकी प्रशंसा की गयी है। अलबत्ता पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अबू लहब जैसे चाचा भी थे। अबू लहब के बारे में क़ुरआने मजीद में मसद नामक सूरा है जिसमें उसकी हठधर्मी और यातनाओं का वर्णन किया है।इस आयत से हमने सीखा कि कुफ़्र और अनेकेश्वरवाद मनुष्य के पतन और उसकी तबाही का कारण है। इसी प्रकार ईमान, मनुष्य के जीवन तथा मोक्ष का कारण है। अतः कहा जा सकता है कि वास्तविक जीवन व मृत्यु, ईमान और कुफ़्र है।ईमान, नूर अर्थात प्रकाश लाता है जबकि कुफ़्र, अंधकार का कारण बनता है। ईमान वाला व्यक्ति कभी भी बंद गली में नहीं फंसता और सदैव ईश्वरीय प्रकाश के साथ चलता रहता है।भौतिक जीवन में तड़क भड़क के कामों ने काफ़िरों को इस प्रकार मंत्रमुग्ध कर लिया है कि वे अपनी पथभ्रष्टता और पतन के बारे में विचार ही नहीं करते।