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    सूरए अनआम, आयतें 123-125, (कार्यक्रम 222)

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    आइये सूरए अनआम की आयत संख्या 123 की तिलावत सुनते हैं।وَكَذَلِكَ جَعَلْنَا فِي كُلِّ قَرْيَةٍ أَكَابِرَ مُجْرِمِيهَا لِيَمْكُرُوا فِيهَا وَمَا يَمْكُرُونَ إِلَّا بِأَنْفُسِهِمْ وَمَا يَشْعُرُونَ (123)और इस प्रकार हम हर बस्ती में बड़े बड़े अपराधियों को अवसर देते हैं कि वे वहां धूर्तता करें और उनकी धूर्तता का प्रभाव स्वयं उनके अतिरिक्त किसी पर नहीं होता परंतु वे (इसे) नहीं समझते। (6:123)इससे पहले हमने कहा था कि अबू जहल जैसे मक्के के कुछ बड़े लोग सदैव पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और उनके साथियों के विरुद्ध षड्यंत्र रचा करते थे ताकि मुसलमानों के प्रभाव को रोक सकें।यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम व उनके अनुयाइयों को संबोधित करते हुए कहती है। ऐसे लोगों का अस्तित्व कोई नई बात नहीं है बल्कि पूरे मानव इतिहास में सदैव ही ऐसे लोग रहे हैं जिन्होंने पैग़म्बरों के निमंत्रण का विरोध किया और उनके विरुद्ध षड्यंत्र करते रहे।चूंकि मनुष्य द्वारा किया गया हर अच्छा या बुरा कर्म ईश्वर की शक्ति के अधीन है और उसके द्वारा दी गयी क्षमता के बिना किसी भी काम की संभावना नहीं है, अतः यह आयत कहती है कि सत्य के मुक़ाबले में खड़े होने वाले इन अपराधियों को यह नहीं सोचना चाहिए कि ईश्वर में उन्हें समाप्त करने की शक्ति नहीं है या वे ईश्वर के शासन से बाहर निकल गये हैं बल्कि वे उसी बुद्धि और विचार द्वारा षड्यंत्रों में व्यस्त हैं जो ईश्वर ने उन्हें प्रदान किए हैं और किसी भी क्षण उनसे छीन सकता है।परंतु ईश्वर की परंपरा यह है कि इस संसार में लोग अपने अधिकार से कर्म करें और वे जिस मार्ग का चयन करें, उसमें ईश्वर उनकी सहायता करे।इस आयत से हमने सीखा कि भ्रष्ट नेता और समाज में भ्रष्ट आर्थिक व व्यवहारिक मोहरे, समाज में बुराई की जड़ हैं।पैग़म्बरों के विरोधियों का तर्क धोखा, धूर्तता और बहाना है न कि सत्य, सच्चाई और पवित्रता।दूसरों के लिए गढ़ा खोदने वाला, स्वयं गढ़े में सबसे नीचे होता है अर्थात धोखे के बुरे परिणाम सबसे पहले धोखेबाज़ को देखने पड़ते हैं।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 124 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا جَاءَتْهُمْ آَيَةٌ قَالُوا لَنْ نُؤْمِنَ حَتَّى نُؤْتَى مِثْلَ مَا أُوتِيَ رُسُلُ اللَّهِ اللَّهُ أَعْلَمُ حَيْثُ يَجْعَلُ رِسَالَتَهُ سَيُصِيبُ الَّذِينَ أَجْرَمُوا صَغَارٌ عِنْدَ اللَّهِ وَعَذَابٌ شَدِيدٌ بِمَا كَانُوا يَمْكُرُونَ (124)और जब भी उनके पास कोई निशानी आती है तो वे कहते हैं, हम तब तक ईमान नहीं लाएंगे जब तक हमें भी वैसा ही (ईश्वरीय संदेश) न दिया जाए, जैसा पैग़म्बरों को दिया गया है। (जबकि) ईश्वर बेहतर जानता है कि अपनी पैग़म्बरी को कहां (और किसके पास) रखे। शीघ्र ही अपराध करने वालों को उनके द्वारा किए गये (अपराध और) धोखे के बदले में ईश्वर के निकट अपमान और कड़े दंड का सामना करना पड़ेगा। (6:124)पिछली आयतों में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के विरोधियों के विभिन्न धोखों और बहानों का वर्णन करने के पश्चात यह आयत कहती है कि पैग़म्बर के समक्ष मक्के के अनेकेश्वरवादियों के नेताओं का एक बहाना यह था कि ईश्वर का पैग़म्बर होने का दावा करने वाले इस व्यक्ति से हमारा धन, नाम, माल और स्थान कहीं अधिक है, तो यदि ईश्वर की ओर से किसी का चयन होना था तो वे हम होते न कि मुहम्मद। या कम से कम जिस प्रकार उनके पास वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश आता है, उसी प्रकार हमारे पास भी आता, और अब जबकि ऐसा नहीं हुआ तो हम भी कदापि उन पर ईमान नहीं लाएंगे और न ही उनकी पुष्टि करेंगे।इस प्रकार के बहानेबाज़ियों के उत्तर में क़ुरआने मजीद कहता है कि ईश्वर सबसे बेहतर जानता है कि किसमें इस महान ईश्वरीय दायित्व को संभालने की योग्यता है। इसके अतिरिक्त धन और पद योग्यता की निशानी नहीं है बल्कि लोगों के मार्गदर्शन के लिए अन्य साधनों की आवश्यकता होती है जो संसार प्रेमी और सत्ता लोलुप लोगों के पास नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों के निमंत्रण के इन्कार का एक महत्त्वपूर्ण स्वयं को बड़ा और श्रेष्ठ समझना है कि जो सत्य और सत्य का निमंत्रण देने वालों के समक्ष घमंड और अहं का कारण बनता है।ईश्वर ने वचन दिया है कि वह घमंडी और अहंकारी लोगों को इसी संसार में लज्जित और अपमानित करेगा ताकि अन्य लोगों के लिए पाठ रहे।आइये अब सूरए अनआम की 125वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।فَمَنْ يُرِدِ اللَّهُ أَنْ يَهدِيَهُ يَشْرَحْ صَدْرَهُ لِلْإِسْلَامِ وَمَنْ يُرِدْ أَنْ يُضِلَّهُ يَجْعَلْ صَدْرَهُ ضَيِّقًا حَرَجًا كَأَنَّمَا يَصَّعَّدُ فِي السَّمَاءِ كَذَلِكَ يَجْعَلُ اللَّهُ الرِّجْسَ عَلَى الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ (125)तो ईश्वर जिसका मार्गदर्शन करना चाहता है उसके सीने को इस्लाम (की स्वीकृति) के लिए खोल देता है और जिसे पथभ्रष्टता में छोड़ना चाहता है उसके सीने को (ईमान के मुक़ाबले में) कठोर और तंग बना देता है जैसे वह बड़ी कठिनाई से आकाश की ओर ऊपर उठ रहा हो। इस प्रकार ईश्वर ईमान न लाने वालों पर उनकी गंदगी को थोप देता है। (6:125)यह आयत कहती है कि लोगों का कुफ़्र या ईमान उनकी आत्मा और मन की ओर पलटता है। कुफ़्र और ईमान केवल मनुष्य के कुछ बाहरी कर्मों का नाम नहीं है बल्कि ईमान, सत्य के समक्ष हृदय से झुकने और ईश्वरीय आदेशों के पालन का नाम है जबकि कुफ़्र, सत्य से शत्रुता और द्वेष तथा ईश्वर के मुक़ाबले में खड़े हो जाने को कहा जाता है।यही कारण है कि क़ुरआने मजीद कहता है कि ऐसा व्यक्ति ईश्वरीय मार्गदर्शन को स्वीकार करता है जिसका हृदय और मन पवित्र होता है। यदि आत्मा स्वस्थ और पवित्र हो तो वो सत्य को स्वीकार कर लेती है परंतु जब मनुष्य की आत्मा रोगी हो तो, रोगी शरीर की भांति ही, बेहतरीन भोजनों को स्वीकार करने की योग्यता नहीं रखती।यह आयत इसी प्रकार एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु की ओर संकेत करते हुए कहती है कि जो कोई सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता वो उस व्यक्ति की भांति है जो आकाश की ओर जाना चाहता है परंतु ऑक्सीजन की कमी के कारण उसका सीना तंग हो जाता है और वह सांस नहीं ले पाता।इस आयत से हमने सीखा कि सत्य स्वीकार करने के लिए आंतरिक योग्यता की आवश्यकता है परंतु सत्य स्वीकार करने के पश्चात धीरे-2 इस योग्यता में वृद्धि होती है और यह ईमान वालों को ईश्वर का उपहार है।यद्यपि पथभ्रष्ट, स्वयं को आराम और ऐश्वर्य में समझते हैं परंतु वस्तुतः वे अनेक कठिनाइयों और दबाव में हैं।