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    सूरए अनआम, आयतें 126-130, (कार्यक्रम 223)

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    आइये सूरए अनआम की आयत संख्या 126 और 127 की तिलावत सुनते हैं।وَهَذَا صِرَاطُ رَبِّكَ مُسْتَقِيمًا قَدْ فَصَّلْنَا الْآَيَاتِ لِقَوْمٍ يَذَّكَّرُونَ (126) لَهُمْ دَارُ السَّلَامِ عِنْدَ رَبِّهِمْ وَهُوَ وَلِيُّهُمْ بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (127)और यह तुम्हारे पालनहार का सीधा मार्ग है। हमने (नसीहत) स्वीकार करने वालों के लिए अपनी निशानियों को विस्तार से बयान कर दिया है। (6:126) ऐसे ही लोगों के लिए उनके पालनहार के निकट शांति का ठिकाना है और उन्होंने जो कर्म किए हैं, उनके आधार पर ईश्वर उनका अभिभावक है। (6:127)इससे पहले हमने ऐसी आयतें सुनीं जिनमें काफ़िरों और ईमान वालों के व्यवहार की ओर संकेत किया गया था, इस संबंध में अंतिम आयत में कहा गया था कि इस्लाम स्वीकार करना मनुष्य की आत्मा और मानस की पवित्रता की निशानी है। यह आयत कहती है कि इस्लाम के आदेश भी सीधे मार्ग के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं जिन्हें ईश्वर ने मनुष्य की परिपूर्णता और कल्याण के लिए बनाया है। जो कोई विश्वास और व्यवहार में इस्लाम को स्वीकार कर लेता है वस्तुतः वह स्वयं को गंतव्य से निकट कर लेता है और वह भी बीच के और सीधे मार्ग पर चलकर, जो दो बिन्दुओं के बीच का सबसे निकट मार्ग है।स्वाभाविक है कि जो संसार में ईश्वर के मार्ग पर चलता है वह प्रलय में भी हर प्रकार के ख़तरे और दंड से बचा रहेगा तथा उसे ईश्वर के स्वर्ग में स्थान मिलेगा जिसे यह आयत शांति का ठिकाना कहती है।इन आयतों से हमने सीखा कि सीधा मार्ग केवल ईश्वर का मार्ग है और इसके अतिरिक्त हर दूसरा मार्ग या तो ग़लत है, या भटकाने वाला है।सीधे रास्ते पर जमे रहने के लिए निरंतर और सदैव ध्यान देने की आवश्यकता है वरना हो सकता है कि एक क्षण की निश्चेतना मनुष्य को उस मार्ग से बाहर कर दे।स्वर्ग में किसी भी प्रकार की मृत्यु, रोग, दरिद्रता, कठिनाई और कड़ाई, ईर्ष्या, हिंसा, निराशा या आरोप का कोई स्थान नहीं है।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 128 और 129 की तिलावत सुनते हैं।وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ جَمِيعًا يَا مَعْشَرَ الْجِنِّ قَدِ اسْتَكْثَرْتُمْ مِنَ الْإِنْسِ وَقَالَ أَوْلِيَاؤُهُمْ مِنَ الْإِنْسِ رَبَّنَا اسْتَمْتَعَ بَعْضُنَا بِبَعْضٍ وَبَلَغْنَا أَجَلَنَا الَّذِي أَجَّلْتَ لَنَا قَالَ النَّارُ مَثْوَاكُمْ خَالِدِينَ فِيهَا إِلَّا مَا شَاءَ اللَّهُ إِنَّ رَبَّكَ حَكِيمٌ عَلِيمٌ (128) وَكَذَلِكَ نُوَلِّي بَعْضَ الظَّالِمِينَ بَعْضًا بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ (129)और जिस दिन ईश्वर सबको एकत्रित करेगा (तो कहेगा) हे जिन्नों के गुट! तुम्हें (तो) मनुष्यों के अत्यधिक (अनुयाई) मिल गये थे। और मनुष्यों के बीच से उनके अनुयाई कहेंगेः हे पालनहार! हम सबने एक दूसरे से लाभ उठाया और अब हम उस अंत तक पहुंच चुके हैं जो तूने हमारे लिए निर्धारित किया था। (तो) ईश्वर कहेगाः तुम्हारा ठिकाना नरक है जिसमें तुम सदैव रहोगे (सिवाय इसके कि ईश्वर, तुममें से किसी को क्षमा करना) चाहे। निसंदेह तुम्हारा पालनहार तत्वदर्शी और सबसे अधिक जानकार है। (6:128) और इस प्रकार हम कुछ अत्याचारियों पर, उनके कर्मों के चलते कुछ अन्य अत्याचारियों को थोप देते हैं। (6:129)क़ुरआने मजीद इन आयतों में एक बार फिर पथभ्रष्टों की स्थिति की ओर संकेत करता है और प्रलय के दिन उनकी दशा का वर्णन करता है। आरंभ में वह कहता है। चाहे शैतान हो जो पथभ्रष्टों का सरदार है और चाहे उसके अनुयाई कि जो असंख्य मनुष्य होंगे, सबका हिसाब किताब किया जाएगा परंतु उनके लिए कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि न तो वहां से वापसी का कोई मार्ग है और न ही क्षतिपूर्ति की कोई संभावना।इस आयत में जिन्नों के गुट का अर्थ शैतान और उसके चेले हैं कि जो अपने उकसावे द्वारा मनुष्य के लिए पाप का मार्ग प्रशस्त करते हैं परंतु ऐश्वर्य और आराम का एक न एक दिन अंत होना है और बुद्धिमान व्यक्ति ईश्वरीय स्वर्ग के स्थाई और अनंतकालीन ठिकाने को, इस नश्वर संसार और इसके झूठे आनंदों के बदले कभी नहीं बेचता।आगे चलकर आयत कहती है कि संसार में तुम लोग सदैव पाप करते रहे, आज वह आग तुम्हें अपनी लपेट में ले लेगी जो तुमने स्वयं अपने हाथों से जलाई है। इस आग या नरक से मुक्ति का कोई मार्ग नहीं सिवाय इसके कि ईश्वर किसी को क्षमा करना चाहे, परंतु ईश्वर भी अकारण और बिना तर्क के कोई काम नहीं करता क्योंकि वह तत्वदर्शी और जानकार है। उसके दंड का भी तर्क होता है और क्षमा का भी।इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय में मनुष्यों और शैतान को एक स्थान पर एकत्रित करके हिसाब किताब किया जाएगा ताकि शैतान के अनुयायी उसके साथ रहें।हमें अपने अंत और परिणाम के बारे में सोचना चाहिए और ऐसे नेता का चयन करना चाहिए जो प्रलय में हमारे समर्थन की क्षमता रखता हो।सभी पथभ्रष्टों का दंड एक समान नहीं होगा तथा नरक में बाक़ी रहना ईश्वर के ज्ञान व तत्वदर्शिता पर निर्भर है।जीवन में शैतान का आज्ञापालन, समाज व सरकार पर अत्याचारियों के वर्चस्व का मार्ग प्रशस्त करता है।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 130 की तिलावत सुनते हैं।يَا مَعْشَرَ الْجِنِّ وَالْإِنْسِ أَلَمْ يَأْتِكُمْ رُسُلٌ مِنْكُمْ يَقُصُّونَ عَلَيْكُمْ آَيَاتِي وَيُنْذِرُونَكُمْ لِقَاءَ يَوْمِكُمْ هَذَا قَالُوا شَهِدْنَا عَلَى أَنْفُسِنَا وَغَرَّتْهُمُ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا وَشَهِدُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ أَنَّهُمْ كَانُوا كَافِرِينَ (130)हे जिन्नों और मनुष्यों के गुट! क्या तुम्हारे पास स्वयं तुम्हीं में से पैग़म्बर नहीं आए थे जो मेरी निशानियों को बयान करते थे और तुम्हें आज के दिन की भेंट से डराते थे। वे कहेंगे, हम स्वयं अपने विरुद्ध गवाही देते हैं। और सांसारिक जीवन ने उन्हें धोखा दिया है और उन्होंने स्वयं अपने विरुद्ध गवाही दी कि वे काफ़िर थे। (6:130)यह आयत कहती है कि प्रलय के दिन ईश्वर काफ़िरों को दंड देने से पूर्व उनसे इस बात की स्वीकारोक्ति कराएगा कि वे सत्य को समझ गये थे परंतु उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। उनके पास मार्गदर्शन प्राप्त करने की संभावना और साधन थे परंतु वे पथभ्रष्ट हुए। उन्होंने प्रलय का नाम सुना था परंतु सांसारिक जीवन की माया ने उन्हें इस प्रकार जकड़ रखा था कि वे अपने अंत और प्रलय की ओर से निश्चेत रहे।ये सारी बातें उनके कुफ़्र और ईश्वर तथा ईश्वरीय अनुकंपाओं के प्रति उनकी अकृतज्ञता का कारण बनी और अंततः उन्हें प्रलय के दिन नरक में पहुंचा दिया।इस आयत से हमने सीखा कि जिन्नों और मनुष्यों दोनों के ऊपर ईश्वर की ओर से दायित्व निर्धारित किए गये हैं और दोनों के पास उन्हीं में से पैग़म्बर आए हैं।प्रलय, छिपाने या इन्कार करने का स्थान नहीं है, अपराधी तक अपने विरुद्ध गवाही देंगे।पैग़म्बरों के निमंत्रण से इन्कार का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण संसार तथा सांसारिक आनंदों की ओर लोगों का झुकाव है।