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    सूरए अनआम, आयतें 131-136, (कार्यक्रम 224)

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    आइये सूरए अनआम की आयत संख्या 131 और 132 की तिलावत सुनते हैं।ذَلِكَ أَنْ لَمْ يَكُنْ رَبُّكَ مُهْلِكَ الْقُرَى بِظُلْمٍ وَأَهْلُهَا غَافِلُونَ (131) وَلِكُلٍّ دَرَجَاتٌ مِمَّا عَمِلُوا وَمَا رَبُّكَ بِغَافِلٍ عَمَّا يَعْمَلُونَ (132)यह इसलिए है कि तुम्हारा पालनहार कदापि बस्तियों को अत्याचार के साथ इस प्रकार तबाह नहीं करना चाहता कि उनके रहने वाले (सत्य को पहचानने से) निश्चेत हों। (6:131) और हर एक के लिए उसके कर्मों के अनुसार दर्जे हैं और तुम्हारा पालनहार, उनके कर्मों की ओर से निश्चेत नहीं है। (6:132)पिछले कार्यक्रम की अंतिम आयत में ईश्वर ने जिन्नों और मनुष्यों को संबोधित करते हुए कहा था कि मैंने तुम्हारे मार्गदर्शन और प्रलय से तुम्हें डराने के लिए पैग़म्बर भेजे। यह आयतें कहती हैं। ईश्वर की यह चेतावनियां लोगों को सचेत करने तथा उन्हें अज्ञानता व निश्चेतना से निकालने और सत्य को पहचनवाने के लिए हैं ताकि कोई यह न कह सके कि मुझे इन बातों का ज्ञान नहीं था।क्योंकि यदि ईश्वर बिना ज्ञान और चेतावनी दिए, काफ़िरों को दंडित करेगा तो यह उन पर अत्याचार होगा। पहले निश्चेत लोगों को सत्य से अवगत कराना चाहिए, उसके बाद यदि वे स्वीकार न करें तो उन्हें दंड दिया जाना चाहिए। यह ईश्वर की परंपरा है जिसके बारे में क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों में भी संकेत किया गया है जैसे सूरए इसरा की 15वीं आयत में कहा गया है कि जब तक हम कोई पैग़म्बर न भेज दें, किसी को दंडित नहीं करते।इन आयतों से हमने सीखा कि ऐसे लोग प्रलय में, नरक में जाएंगे जो इस्लाम की सत्यता को समझ चुके होंगे परंतु उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए होंगे।अज्ञानी और निश्चेत लोगों को दंडित करना, उन पर अत्याचार है, अवगत कराने को दंड पर वरीयता प्राप्त है।हर किसी का कल्याण और पतन स्वयं उसी के हाथ में है। हर व्यक्ति का कर्म, ईश्वर के निकट उसके स्थान को निर्धारित करता है।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 133 और 134 की तिलावत सुनते हैं।وَرَبُّكَ الْغَنِيُّ ذُو الرَّحْمَةِ إِنْ يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ وَيَسْتَخْلِفْ مِنْ بَعْدِكُمْ مَا يَشَاءُ كَمَا أَنْشَأَكُمْ مِنْ ذُرِّيَّةِ قَوْمٍ آَخَرِينَ (133) إِنَّ مَا تُوعَدُونَ لَآَتٍ وَمَا أَنْتُمْ بِمُعْجِزِينَ (134)और (हे पैग़म्बर!) आपका पालनहार आवश्यकतामुक्त और दयावान है। यदि वह चाहे तो तुम सबको (इस संसार से) ले जाए और तुम्हारे पश्चात जिसे चाहे तुम्हारे स्थान पर ले आए, जिस प्रकार से वह तुम्हें एक अन्य जाति से अस्तित्व में लाया है। (6:133) (हे लोगो!) निसंदेह तुमसे जो वादा किया गया है वह (सामने) आने वाला है और तुम ईश्वर को अक्षम नहीं बना सकते। (6:134)पिछली आयतों में इस बात का वर्णन करने के पश्चात कि ईश्वर अपने बंदों पर अत्याचार नहीं करता, इन आयतों में क़ुरआने मजीद कहता है कि इस बात का कोई तर्क और कारण नहीं है कि ईश्वर अपने बंदों पर अत्याचार करे क्योंकि अत्याचार, या तो आवश्यकता के चलते किया जाता है या फिर हिंसा और निर्दयता के कारण जबकि ईश्वर आवश्यकतामुक्त भी है, और कृपालु व दयावान भी।अलबत्ता पापियों को ईश्वर की दया से अनुचित लाभ उठाकर यह नहीं कहना चाहिए कि ईश्वर को हमसे कुछ मतलब नहीं है, क्योंकि ईश्वर संसार में भी शक्ति रखता है और प्रलय में भी। और यदि वह चाहे तो तुम्हें संसार से समाप्त करके तुम्हारे स्थान पर दूसरे लोगों को ला सकता है और प्रलय में भी किसी के पास ईश्वरीय दंड से बचने और उनके मुक़ाबले में खड़े होने की क्षमता नहीं है।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर को हमारी उपासनाओं की कोई आवश्यकता नहीं है, जिस प्रकार से कि उसे हमारे अस्तित्व की भी कोई आवश्यकता नहीं है और यदि वह चाहे तो हमें समाप्त कर सकता है।यद्यपि ईश्वर की दया अत्यधिक व्यापक है परंतु कुछ पापी इतने अधिक आगे बढ़ जाते हैं कि इस व्यापक दया की सीमा से बाहर निकलकर ईश्वरीय प्रकोप के पात्र बन जाते हैं।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 135 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ يَا قَوْمِ اعْمَلُوا عَلَى مَكَانَتِكُمْ إِنِّي عَامِلٌ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ مَنْ تَكُونُ لَهُ عَاقِبَةُ الدَّارِ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ (135)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि हे मेरी जाति (वालो!) तुम अपनी पद्धति पर कर्म करो (और) निसंदेह में भी (अपनी पद्धति पर) कर्म करने वाला हूं, तो शीघ्र ही तुम्हें ज्ञान हो जाएगा कि परलोक का (भला) अंत किसके पक्ष में है। निश्चित रूप से अत्याचारी सफल होने वाले नहीं हैं। (6:135)पिछली आयतों में काफ़िरों को ईश्वरीय दंड से डराने के पश्चात इस आयत में पैग़म्बर को आदेश दिया गया है कि वे उनसे कह दें कि जो कुछ तुम कर सकते हो करो, मैं भी वही करूंगा जिसका मुझे ईश्वर ने आदेश दिया है, परंतु शीघ्र ही पता चल जाएगा कि भला अंत किसका है और यह भी जान लो कि अत्याचारी कभी भी सफल होने वाले नहीं हैं।इस आयत से हमने सीखा कि सफलता का मानदंड वर्तमान नहीं बल्कि परिणाम और अंत है, कितने ऐसे आनंद विलास हैं जिनके पश्चात रोना पड़ता है।ईश्वर के मार्ग से लोगों की उद्दंडता चाहे वे बहुसंख्या में ही क्यों न हों, हमारे दायित्व को नहीं बदलती। हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और पूरी गंभीरता और दृढ़ता से, असत्य के मुक़ाबले में अपने सत्य मार्ग की घोषणा करनी चाहिए।आइये अब सूरए अनआम की 136वीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَجَعَلُوا لِلَّهِ مِمَّا ذَرَأَ مِنَ الْحَرْثِ وَالْأَنْعَامِ نَصِيبًا فَقَالُوا هَذَا لِلَّهِ بِزَعْمِهِمْ وَهَذَا لِشُرَكَائِنَا فَمَا كَانَ لِشُرَكَائِهِمْ فَلَا يَصِلُ إِلَى اللَّهِ وَمَا كَانَ لِلَّهِ فَهُوَ يَصِلُ إِلَى شُرَكَائِهِمْ سَاءَ مَا يَحْكُمُونَ (136)और अनेकेश्वरवादियों ने ईश्वर द्वारा बनाई गयी खेतियों और पशुओं में, ईश्वर का (भी) हिस्सा लगाया और अपने विचार में कहाः यह (भाग) ईश्वर का है, और यह (ईश्वर के समकक्ष और उनकी सहभागी मूर्तियों) का, तो जो (भाग) उनके सहभागियों का है वह ईश्वर तक नहीं पहुंच सकता और जो (भाग) ईश्वर का है वह उनके सहभागियों को मिल सकता है, कितना बुरा फ़ैसला है जो उन्होंने किया। (6:136)यह आयत मक्के के अनेकेश्वरवादियों के एक अन्य भ्रष्ट विचार की ओर संकेत करते हुए कहती है। वे अपनी फ़स्ल और पशुओं का एक भाग, ईश्वर के लिए बनाते थे और एक भाग मूर्तियों के लिए। इतिहास में है कि वे ईश्वर का भाग दरिद्रों और अतिथियों को देते थे जबकि मूर्तियों का भाग उनकी देख-भाल करने वालों को देते थे या भेंट चढ़ाने के उत्सव के लिए विशेष कर देते थे परंतु जब कभी मूर्तियों का भाग कम पड़ जाता तो वे ईश्वर के भाग में से ले लेते थे परंतु इसका उलटा नहीं करते थे। यदि किसी घटनावश, मूर्तियों के लिए अलग करके रखे गये भाग को क्षति पहुंच जाती या वो नष्ट हो जाता तो वे कहते थे, ईश्वर तो आवश्यकतामुक्त है, मूर्तियों को अधिक आवश्यकता है।आयत के अंत में क़ुरआने मजीद एक संक्षिप्त वाक्य में इन ग़लत रीतियों व विचारों की आलोचना करते हुए कहता है। वे कितना बुरा निर्णय करते थे कि अनेकेश्वरवाद के अतिरिक्त वे ईश्वर को मूर्तियों से भी कम मानते थे। यद्यपि ईश्वर हर वस्तु का स्वामी है और किसी भी वस्तु के बंटवारे का वास्तविक अधिकार उसी के पास है परंतु वे स्वयं ईश्वर का हिस्सा लगाते थे और उसे भी अपनी बुद्धि से कम या ज़्यादा करते थे।अलबत्ता उनके इस काम में पायी जाने वाली सभी बुराईयों के साथ-2 एक बात स्पष्ट होती है और वह यह कि अनेकेश्वरवादी यह स्वीकार करते थे कि उनकी फ़स्लों और पशुओं का एक भाग ईश्वर से विशेष है और यह वही वस्तु है जिसे ईश्वरीय धर्मों में ज़कात के रूप में रखा गया है। दूसरे शब्दों में अनेकेश्वरवादियों का मूल विश्वास, एक ईश्वरीय क़ानून था, जिसके समय बीतने के साथ-2 अंधविश्वास भी शामिल हो गया तथा उसमें मूर्तियों का भी हिस्सा लगाया जाने लगा।इस आयत से हमने सीखा कि वास्तव में फ़स्ल उगाने वाला मनुष्य नहीं बल्कि ईश्वर है। किसान तो केवल दानों को मिट्टी में बोता है, उसके बढ़ने और पौधा बनने के साधन तो ईश्वर उपलब्ध कराता है।पैग़म्बरों का एक सबसे महत्त्वपूर्ण दायित्व, अंधविश्वास से मुक़ाबला करना था।