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    सूरए अनआम, आयतें 137-140, (कार्यक्रम 225)

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    आइये सूरए अनआम की आयत संख्या 137 की तिलावत सुनते हैं।وَكَذَلِكَ زَيَّنَ لِكَثِيرٍ مِنَ الْمُشْرِكِينَ قَتْلَ أَوْلَادِهِمْ شُرَكَاؤُهُمْ لِيُرْدُوهُمْ وَلِيَلْبِسُوا عَلَيْهِمْ دِينَهُمْ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا فَعَلُوهُ فَذَرْهُمْ وَمَا يَفْتَرُونَ (137)और इस प्रकार उनके सहभागियों ने बहुत से अनेकेश्वरवादियों के लिए बच्चों की हत्या को सजा संवार कर पेश कर दिया ताकि उन्हें तबाह कर दें और उनके लिए उनके धर्म को संदिग्ध बना दें। और यदि ईश्वर चाह लेता तो वे ऐसा न कर पाते तो (हे पैग़म्बर!) आप उन्हें उनके झूठ के साथ छोड़ दें। (6:137)इससे पहले हमने अनेकेश्वरवादियों के एक भ्रष्ट विश्वास की ओर संकेत किया था कि वे खेतियों और पशुओं में मूर्तितयों का हिस्सा लगाते थे। यह आयत उनके एक और भ्रष्ट विश्वास की ओर संकेत करते हुए कहती है।वे न केवल अपनी संपत्ति का एक भाग मूर्तियों के लिए विशेष करते थे, बल्कि कभी कभी मूर्तियों को प्रसन्न करने के लिए अपने बच्चों की बलि भी चढ़ाया करते थे और इसे एक की उपासना मानते थे। क़ुरआने मजीद कहता है कि मूर्तियों से प्रेम इतना अधिक बढ़ चुका था कि ये घृणित कर्म उन्हें सुन्दर लगता था, यहां तक कि वे इस पर गर्व करते थे।आगे चलकर आयत कहती है, ये ग़लत रीतियां और धारणाएं इस बात का कारण बनीं कि धीरे-2 वास्तविक धर्म में फेरबदल होता गया और अंधविश्वास ने उपासना का स्थान ले लिया जिसके चलते उनका पूरा वंश तबाह हो गया। क़ुरआने मजीद पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम को संबोधित करते हुए कहता है। वे अपने इस घृणित कर्म को ईश्वर से संबोधित करते हैं तथा आपकी सत्य बात स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, अतः आप अपने को इससे अधिक कष्ट न दें और उन्हें छोड़ दें क्योंकि ईश्वर भी नहीं चाहता कि वे ज़बरदस्ती और विवशता के साथ सत्य की ओर आएं और यदि ईश्वर चाहता तो वे इस प्रकार का कोई बुरा कर्म नहीं कर सकते थे।इस आयत से हमने सीखा कि पाप से भी अधिक बुरा उसका औचित्य दर्शाना है कि जो मनुष्य के पतन और बर्बादी का कारण बनता है और सत्य स्वीकार करने के द्वार उस पर बंद कर देता है।पैग़म्बरों और धर्म प्रचारकों का दायित्व, ईश्वरीय धर्म पहुंचाना है न कि उसे स्वीकार करने के लिए लोगों को विवश करना, अतः उन्हें लोगों की ओर से पीठ मोड़े जाने के कारण, अपने दायित्व की ओर से निराश नहीं होना चाहिए।आइये अब सूरए अनआम की 138वीं आयत की तिलावत सुनते हेंوَقَالُوا هَذِهِ أَنْعَامٌ وَحَرْثٌ حِجْرٌ لَا يَطْعَمُهَا إِلَّا مَنْ نَشَاءُ بِزَعْمِهِمْ وَأَنْعَامٌ حُرِّمَتْ ظُهُورُهَا وَأَنْعَامٌ لَا يَذْكُرُونَ اسْمَ اللَّهِ عَلَيْهَا افْتِرَاءً عَلَيْهِ سَيَجْزِيهِمْ بِمَا كَانُوا يَفْتَرُونَ (138)और अनेकेश्वरवादियों ने अपने विचार में कहाः यह जानवर और खेती (मूर्तियों से विशेष और अन्य लोगों के लिए) वर्जित है और इसे वही खा सकते हैं जिन्हें हम चाहें। और कुछ चौपाए हैं जिनकी पीठ (पर बैठना) वर्जित है और कुछ चौपाए हैं (जिन्हें ज़िबह करते समय) उन पर ईश्वर का नाम नहीं लेते हैं। वे इन (सब बातों को) झूठ ही ईश्वर से संबंधित कर देते हैं। शीघ्र ही ईश्वर उन्हें उनके इस झूठ का बदला देगा। (6:138)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि मक्के के अनेकेश्वरवादी अपने पशुओं तथा अपनी फ़सल का एक भाग मूर्तियों से विशेष कर देते थे। यह आयत अनेकेश्वरवादियों से इस भ्रष्ठ विश्वास का विवरण देते हुए कहती है। वे सबसे पहले कुछ पशुओं को मूर्तियों के लिए अलग कर देते थे। और उनसे किसी भी प्रकार का लाभ उठाने की अनुमति नहीं देते थे।वे इन पशुओं के दूध व मांस को स्वयं के लिए वर्जित समझते थे, केवल मूर्तियों की रखवाली करने वाले ही इनसे लाभान्वित हो सकते थे। इन जानवरों पर सवारी को भी वे वर्जित समझते थे, यहां त कि ज़िबह करते समय इन जानवरों पर ईश्वर का नहीं बल्कि मूर्तियों का नाम लेते थे।क़ुरआने मजीद कहता है। यद्यपि यह सारे विचार और कर्म भ्रष्ठ और बुरे हैं परंतु इससे भी बड़ी बुराई यह है कि इन अंधविश्वासों को धर्म का नाम दिया जाता था और कहा जाता था कि ऐसा ईश्वर के आदेश पर होता है। इसी झूठ के कारण ईश्वर उन्हें दंडित करेगा।इस आयत से हमने सीखा कि अंधविश्वास विशेषकर धर्म के नाम से प्रचलित भ्रष्ट विचारों से संघर्ष करना, पैग़म्बरों के मुख्य लक्ष्यों में से एक है।ईश्वर द्वारा वर्जित की गयी वस्तुओं को वैध समझना ही नहीं, बल्कि ईश्वर द्वारा वैध बताई गयी वस्तुओं को वर्जित करना भी, उसपर झूठा आरोप और महापाप है।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 139 और 140 की तिलावत सुनते हैं।وَقَالُوا مَا فِي بُطُونِ هَذِهِ الْأَنْعَامِ خَالِصَةٌ لِذُكُورِنَا وَمُحَرَّمٌ عَلَى أَزْوَاجِنَا وَإِنْ يَكُنْ مَيْتَةً فَهُمْ فِيهِ شُرَكَاءُ سَيَجْزِيهِمْ وَصْفَهُمْ إِنَّهُ حَكِيمٌ عَلِيمٌ (139) قَدْ خَسِرَ الَّذِينَ قَتَلُوا أَوْلَادَهُمْ سَفَهًا بِغَيْرِ عِلْمٍ وَحَرَّمُوا مَا رَزَقَهُمُ اللَّهُ افْتِرَاءً عَلَى اللَّهِ قَدْ ضَلُّوا وَمَا كَانُوا مُهْتَدِينَ (140)और अनेकेश्वरवादी कहते थे जो कुछ इन चौपायों के पेट में है, हमारे पुरुषों के लिए विशेष है और हमारी महिलाओं पर वर्जित है। हां यदि मरा हुआ हो तो सब उसमें भागीदार हैं। शीघ्र ही ईश्वर उन्हें इन ग़लत बातों के कारण दंडित करेगा कि निसंदेह वह तत्व दर्शी और जानकार है। (6:139) निसंदेह वे लोग घाटे में हैं जिन्होंने मूर्खता में, बिना जाने बूझे अपने बच्चों की हत्या कर दी और जो रोज़ी ईश्वर ने उन्हें दी थी उसे उन्होंने ईश्वर पर आरोप लगाकर (स्वयं पर) वर्जित कर लिया। निसंदेह ये सब पथभ्रष्ट हो गये हैं और इन्हें मार्गदर्शन प्राप्त होने वाला नहीं है। (6:140)यह आयतें भी अनेकेश्वरवादियों के एक अन्य अंधविश्वास तथा भेदभावपूर्ण आदेश की ओर संकेत करते हुए कहती हैः यह लोग न किवल मूर्तियों को समर्पित चौपायों के संबंध में अंध विश्वास रखते थे बल्कि इन चौपायों के पेट में जो बच्चे होते थे उनके बारे में भी, अंधविश्वास की बातें करते थे और कहते थे कि पशुओं के पेट के जीवित बच्चे केवल पुरुषों के लिए हैं जबकि मरे हुए बच्चों को दोनों के बीच बांटा जाएगा, जबकि सामान्यतः मृत पैदा होने वाले पशु का मांस खाने योग्य नहीं होता।आयत के अंतिम भाग में एक बार पुनः संतान की हत्या के मामले की ओर संकेत करते हुए कहा गया हैः तुम्हारी पथभ्रष्टता और अज्ञानता बल्कि वस्तुतः तुम्हारी मूर्खता इस सीमा तक पहुंच गयी है कि तुम संतानों की हत्या जैसे घृझित कार्य को आसमानी धर्म का आदेश मानते हो।पैग़म्बरे इस्लाम, ऐसे वातावरण में तथा ऐसे विचार रखने वाले लोगों के बीच भेजे गये और उन्होंने अपने अनथक प्रयासों द्वारा उनकी प्रगति और ज्ञान की भूमि समतल की।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय विभूतियों से लाभान्वित होने में महिलाओं औ पुरुषों के बीच किसी भी प्रकार का अनुचित भेदभाव, एक अज्ञानतापूर्ण और ग़लत कार्य है।इस बात की ओर से सचेत रहना चाहिए कि अंधविश्वास को धर्म से संबंधित न करें क्योंकि ये, ईश्वर के ज्ञान व तत्वदर्शिता से मेल नहीं खाता और दंडनीय है।वास्तविक घाटा, अज्ञानता और मूर्खता के आधार पर किया गया काम है न कि धन संपत्ति का हाथ से जाना है।