islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए अनआम, आयतें 141-144, (कार्यक्रम 226)

    सूरए अनआम, आयतें 141-144, (कार्यक्रम 226)

    Rate this post

    आइये सूरए अनआम की 141वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَهُوَ الَّذِي أَنْشَأَ جَنَّاتٍ مَعْرُوشَاتٍ وَغَيْرَ مَعْرُوشَاتٍ وَالنَّخْلَ وَالزَّرْعَ مُخْتَلِفًا أُكُلُهُ وَالزَّيْتُونَ وَالرُّمَّانَ مُتَشَابِهًا وَغَيْرَ مُتَشَابِهٍ كُلُوا مِنْ ثَمَرِهِ إِذَا أَثْمَرَ وَآَتُوا حَقَّهُ يَوْمَ حَصَادِهِ وَلَا تُسْرِفُوا إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُسْرِفِينَ (141)वह ईश्वर वही है जिसने लकड़ी की टट्टी पर चढ़ायी गयी बेलों और बिना टट्टी वाले बाग़ों, खजूर के पेड़ों और विभिन्न खाद्य सामग्री वाली खेतियों तथा ज़ैतून और अनार को पैदा किया है जिनमें से कुछ आपस में मिलते जुलते हैं और कुछ अलग हैं। जब इनके पास फल तैयार हो जाएं तो उनमें से खाओ। और जब काटने का दिन आए तो (वंचितों को) उनका अधिकार दे दो और अपव्यय न करो कि निसंदेह ईश्वर अपव्यय करने वालों को पसंद नहीं करता। (6:141)इससे पहले हमने कहा था कि मक्के के अनेकेश्वरवादी अपने चौपायों के एक भाग को मूर्तियों से विशेष और उनके लिए समर्पित कर देते थे, जबकि एक भाग ईश्वर से विशेष कर देते थे। अपने इस काम में वे अंधविश्वास में ग्रस्त हो गये थे। यह आयत कहती है कि ईश्वर का भाग और अधिकार, जो वंचितों और अनाथों को मिलना चाहिए, केवल चौपाए नहीं हैं बल्कि फ़सल और बाग़ों का एक भाग भी ईश्वर का अधिकार है, जिसे कटाई के दिन अलग करके उन्हें दिया जाना चाहिए।अलबत्ता ऐसे लोगों के मुक़ाबले में जो सारी फ़स्ल या सारे फल स्वयं ले लेते थे और वंचितों को उनका भाग नहीं देते थे, कुछ ऐसे लोग भी थे जो संतुलित मार्ग से आगे बढ़कर अपनी सारी फ़सल दरिद्रों को दे देते थे। क़ुरआन ऐसे कर्म को, चाहे वो ईश्वर के मार्ग में ही क्यों न किया गया हो, अपव्यय बताकर उससे रोकता है। क्योंकि इस्लाम का मार्ग संतुलन का मार्ग है। न कमी होनी चाहिए कि मनुष्य वंचितों पर ध्यान ही न दे और न ही अतिशयोक्ति होनी चाहिए कि मनुष्य अपनी और अपने परिवार की आवश्यकताओं की ओर से लापरवाह रहे।जैसा कि ईश्वर ने सूरए फ़ुरक़ान की आयत नंबर 67 में कहा है। और जब वे दान दक्षिणा और ख़र्च करते हैं तो न अपव्यय करते हैं और न ही कंजूसी करते हैं बल्कि इन दोनों के बीच संतुलन का मार्ग अपनाते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि एक ही मिट्टी और पानी से विभिन्न प्रकार के पौधों और फलों का उगना, धरती में ईश्वर की शक्ति की निशानियों में से है।पानी, मिट्टी, प्रकाश और ऑक्सीजन भी कि जो पौधों के बढ़ने के कारण बनते हैं, ईश्वर की ही ओर से हैं और वस्तुतः सारी फ़स्लें और फल ईश्वर के ही हैं अतः उनका एक भाग ईश्वर के मार्ग में ख़र्च करना चाहिए और कंजूसी नहीं करनी चाहिए।आइये अब सूरए अनआम की 142वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَمِنَ الْأَنْعَامِ حَمُولَةً وَفَرْشًا كُلُوا مِمَّا رَزَقَكُمُ اللَّهُ وَلَا تَتَّبِعُوا خُطُوَاتِ الشَّيْطَانِ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُبِينٌ (142)और चौपायों में कुछ भार उठाने वाले और कुछ छोटे हैं। जो कुछ ईश्वर ने तुम्हें रोज़ी प्रदान की है उसमें से खाओ और शैतान के पदचिन्हों पर न चलो कि वो तुम्हारा खुला हुआ शत्रु है। (6:142)यह आयत भी इस बात पर बल देती है कि हर वस्तु ईश्वर की सृष्टि और रचना है। चाहे निर्जीव मिट्टी से उगने वाले पेड़े पौधे हों या छोटे बड़े पशु हों जिनसे तुम लाभान्वित होते हो, सबका रचयिता ईश्वर ही है और इनसे लाभान्वित होना, ईश्वर की अनुमति पर निर्भर है।इनको अस्तित्व में लाने में मूर्तियों या दूसरों की कोई भूमिका नहीं है तथा इनमें उनका कोई भाग और अधिकार नहीं है। यह ईश्वर ही है जिसने ऊंट और घोड़े जैसे बड़े जानवरों को तुम्हारे नियंत्रण में दिया कि भार उठाने में तुम्हारी सहायता करें और इसी प्रकार उसने भेड़ और बकरी जैसे छोटे पशुओं को भी तुम्हारे नियंत्रण में दिया ताकि तुम उनके दूध, मांस और खाल से लाभ उठा सको।यह आयत भी पशुओं से लाभ उठाने के संबंध में हर प्रकार की कमी और अतिश्योक्ति को रोकते हुए कहती है कि अनेकेश्वरवादियों की भांति मत बनो कि जिन्होंने अनेक पशुओं को बेकार छोड़ रखा था और उनसे लाभान्वित होने को वैध नहीं समझते थे।और इसी प्रकार उन लोगों की भांति भी मत हो जाओ कि जो ईश्वरीय क़ानूनों का अनुसरण नहीं करते तथा हराम अर्थात वर्जित और हलाल या वैध बातों का पालन नहीं करते। यहां तक कि वर्जित पशुओं का मांस खाने को भी वे वैध समझते हैं। तुम्हें केवल वैध पशुओं का मांस ही खाना चाहिए और वर्जित पशुओं के मांस से दूर ही रहना चाहिए कि ये केवल शैतान का उकसावा है।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम ने खाने वाली सभी वस्तुओं को कच्चा खाने का आदेश नहीं दिया है जिसका आजकल कुछ गुटों की ओर से प्रचार हो रहा है।अपने खाने पीने पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को बहकाने में शैतान का एक हथकंडा, आहार था।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 143 और 144 की तिलावत सुनते हैं।ثَمَانِيَةَ أَزْوَاجٍ مِنَ الضَّأْنِ اثْنَيْنِ وَمِنَ الْمَعْزِ اثْنَيْنِ قُلْ آَلذَّكَرَيْنِ حَرَّمَ أَمِ الْأُنْثَيَيْنِ أَمَّا اشْتَمَلَتْ عَلَيْهِ أَرْحَامُ الْأُنْثَيَيْنِ نَبِّئُونِي بِعِلْمٍ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ (143) وَمِنَ الْإِبِلِ اثْنَيْنِ وَمِنَ الْبَقَرِ اثْنَيْنِ قُلْ آَلذَّكَرَيْنِ حَرَّمَ أَمِ الْأُنْثَيَيْنِ أَمَّا اشْتَمَلَتْ عَلَيْهِ أَرْحَامُ الْأُنْثَيَيْنِ أَمْ كُنْتُمْ شُهَدَاءَ إِذْ وَصَّاكُمُ اللَّهُ بِهَذَا فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَى عَلَى اللَّهِ كَذِبًا لِيُضِلَّ النَّاسَ بِغَيْرِ عِلْمٍ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ (144)(ईश्वर ने तुम्हारे लिए) आठ प्रकार के (जानवर वैध किए) हैं। भेड़ के दो और बकरी के दो। (हे पैग़म्बर! इनसे) कह दीजिए कि ईश्वर ने इन दोनों के नरों को वर्जित किया है या मादा को या उन बच्चों को उनके पेट में हैं। यदि तुम लोग अपने दावों में सच्चे हो तो मुझे भी ज्ञान के साथ उसकी सूचना दो। (6:143) और दो ऊंट के और दो गाए के दो। (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि ईश्वर ने इन दोनों के नरों को वर्जित किया है या मादा को या उन बच्चों को जो उनके पेट में हैं। या तुम उपस्थित थे जब ईश्वर ने इसके वर्जित होने की तुम्हें सिफ़ारिश की थी? तो उस व्यक्ति से अधिक अत्याचारी कौन होगा जो लोगों को बहकाने के लिए, बिना ज्ञान के ईश्वर पर झूठा आरोप लगाए? निसंदेह ईश्वर अत्याचारियों का मार्गदर्शन नहीं करता। (6:144)पिछली आयत में हमने पढ़ा कि ईश्वर ने वैध पशुओं के मांस और खाल से लाभ उठाने पर बल दिया था और इस संबंध में हर प्रकार के अंधविश्वास से रोका था। ये आयत विस्तार के साथ पशुओं के नाम और उनके बारे में अनेकेश्वरवादियों के विश्वास का वर्णन करते हुए कहती हैः ईश्वर ने तुम्हारे लिए आठ प्रकार के जानवर बनाए हैं। भेड़, बकरी, ऊंट और गाय कि जिनके नर और मादा मिलाकर आठ हो जाते हैं।जबकि पिछली आयतों में कहा गया था कि अनेकेश्वरवादी कभी कभी इन जानवरों के नरों को, कभी मादाओं को और कभी-2 इन जानवरों के पेट में मौजूद बच्चों को अपनी ओर से वर्जित कर देते थे परंतु ईश्वर ने इन सभी को वैध बताते हुए इनसे लाभ उठाने की सिफ़ारिश की है।आगे चलकर आयत कहती है। इस प्रकार का अंधविश्वासस, ईश्वरीय धर्म के प्रति बहुत बड़ा अत्याचार है जिससे अज्ञानता के चलते लोगों में पथभ्रष्टता फैलती है। जो लोग इस प्रकार के अंधविश्वास फैलाते हैं उन्हें इनके कुपरिणामों का उत्तरदायी होना पड़ेगा।इन आयतों से हमने सीखा कि खाने पीने की वस्तुओं में मुख्य मानदंड उनका वैध होना है, सिवाय इसके कि ईश्वर किसी वस्तु के वर्जित होने का आदेश दे।धर्मगुरूओं के लिए आवश्यक है कि वे धर्म के चेहरे से अंधविश्वास का पर्दा हटाएं और सत्य को स्पष्ट रूप से बयान करें।विश्वासों को ज्ञान व जानकारी के आधार पर होना चाहिए न कि अंधविश्वास और अज्ञानता के आधार पर कि जो पथभ्रष्टता का कारण है।