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    सूरए अनआम, आयतें 145-149, (कार्यक्रम 227)

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    आइये सूरए अनआम की आयत नंबर 145 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ لَا أَجِدُ فِي مَا أُوحِيَ إِلَيَّ مُحَرَّمًا عَلَى طَاعِمٍ يَطْعَمُهُ إِلَّا أَنْ يَكُونَ مَيْتَةً أَوْ دَمًا مَسْفُوحًا أَوْ لَحْمَ خِنْزِيرٍ فَإِنَّهُ رِجْسٌ أَوْ فِسْقًا أُهِلَّ لِغَيْرِ اللَّهِ بِهِ فَمَنِ اضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍ وَلَا عَادٍ فَإِنَّ رَبَّكَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (145)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि मैं अपने पास वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश के रूप में आने वाले आदेशों में किसी भी खाने वाले के लिए कोई भी वस्तु वर्जित नहीं पाता सिवाए इसके कि मरा हुआ पशु हो या बहाया हुआ रक्त हो या सुअर का मांस हो, कि निसंदेह यह गंदगी है, या उद्दंडता के साथ बिना ईश्वर का नाम लिए ज़िबह किया गया (पशु) हो, तो जो कोई इन्हें खाने पर विवश हो, इस शर्त के साथ कि वह उद्दंडता और हद से बढ़ने वाला न हो तो (उस पर कोई पाप नहीं है और) निसंदेह आपका पालनहार अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (6:145)इससे पहले हमने कहा था कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम द्वारा लाए गये ईश्वरीय धर्म में उत्पन्न होने वाले अंधविश्वासों और ग़लत विचारों के कारण अनेकेश्वरवादी, कुछ हलाल अर्थात वैध बातों को भी वर्जित समझते थे और अपने अंधविश्वास को ईश्वर से संबंध देते थे। इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को आदेश दिया गया है कि वे खाने की वर्जित वस्तुओं का, जिनकी संख्या बहुत सीमित है, उल्लेख करें ताकि सत्य स्पष्ट और असत्य अपमानति हो जाए।इस आयत में जिन वस्तुओं को वर्जित बताया गया है वो या तो गंदी और अपवित्र हैं या पाप और उद्दंडता हैं। मरे हुए पशु का मांस, सुअर का मांस और पशुओं का रक्त उन गंदी और दूषित वस्तुओं में से है जिनसे मनुष्य के स्वस्थ मन को घिन आती है क्योंकि ये वस्तुएं विभिन्न प्रकार के प्रदूषण और रोगों का स्रोत हैं जबकि ईश्वर चाहता है कि मनुष्य साफ़ सुथरी और पवित्र व स्वस्थ खाद्यसामग्री का प्रयोग करे जैसा कि उसने सूरए बक़रह की 57वीं आयत में कहा है हमने जो तुम्हें पवित्र रोज़ी दी है, उसमें से खाओ।गंदी और दूषित वस्तुओं के अतिरिक्त, मनुष्य के लिए हर वो वस्तु भी खाना वर्जित है जो ईश्वर के आदेशों के प्रति उद्दंडता के साथ हो। उदाहरण स्वरूप यदि किसी पशु को किसी मूर्ति के नाम पर ज़िबह किया जाए तो उसका खाना वैध नहीं है। मनुष्य की खाद्य सामग्री ईश्वर के नाम से और उसके मार्ग में होनी चाहिए।अंत में आयत एक मूल सिद्धांत की ओर संकेत करते हुए कहती हैः जिन वस्तुओं को खाना वर्जित है, उन्हें विवशता की स्थिति में खाया जा सकता है परंतु शर्त यह है कि केवल विवशता समाप्त करने की मात्रा भर ही खाया जाए और विवशता मनुष्य ने स्वयं उत्पन्न न की हो। उदाहरण स्वरूप यदि कोई भूख से मर रहा हो और उसके पास मरे हुए पशु के अतिरिक्त कुछ और न हो तो वो उसके मांस की उतनी मात्रा खा सकता है जिससे उसकी जान बच जाए।इस आयत से हमने सीखा कि जिन वस्तुओं को इस्लाम ने वर्जित किया है वो केवल स्वास्थ्य को पहुंचाने वाली हानि के कारण नहीं है बल्कि कभी अध्यात्मिक व शिष्टाचारिक हानि के दृष्टिगत भी कुछ वस्तुओं को वर्जित किया गया है।इस्लाम में कोई बंद गली नहीं है, विवशता और आपातकाल के समय, जान की रक्षा, मरे हुए पशु का मांस खाने या अन्य वर्जित बातों से अधिक महत्त्वपूर्ण है।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 146 और 147 की तिलावत सुनते हैं।وَعَلَى الَّذِينَ هَادُوا حَرَّمْنَا كُلَّ ذِي ظُفُرٍ وَمِنَ الْبَقَرِ وَالْغَنَمِ حَرَّمْنَا عَلَيْهِمْ شُحُومَهُمَا إِلَّا مَا حَمَلَتْ ظُهُورُهُمَا أَوِ الْحَوَايَا أَوْ مَا اخْتَلَطَ بِعَظْمٍ ذَلِكَ جَزَيْنَاهُمْ بِبَغْيِهِمْ وَإِنَّا لَصَادِقُونَ (146) فَإِنْ كَذَّبُوكَ فَقُلْ رَبُّكُمْ ذُو رَحْمَةٍ وَاسِعَةٍ وَلَا يُرَدُّ بَأْسُهُ عَنِ الْقَوْمِ الْمُجْرِمِينَ (147)और हमने यहूदियों पर हर नाख़ून वाले पशु को वर्जित कर दिया और गाए तथा भेड़ की चर्बी को उनके लिए वर्जित कर दिया, सिवाए उसके कि जो पीठ पर हो या आंतों पर हो या जो हड्डी से लगी हुई हो। यह वर्जन हमारी ओर से दंड है उनके द्वारा किए गये अत्याचार के कारण और निसंदेह हम सच्चे हैं। (6:146) तो (हे पैग़म्बर!) यदि ये लोग आपको झुठलाएं तो कह दीजिए कि तुम्हारा पालनहार बड़ी व्यापक दया वाला है (परंतु) उसके दंड को अपराधियों (पर) से टाला नहीं जा सकता। (6:147)ईश्वर इस आयत में यहूदी जाति के लिए वर्जित की गयी वस्तुओं का वर्णन करता है ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि अनेकेश्वरवादियों के अंधविश्वास न तो इस्लाम से मेल खाते हैं न यहूदी धर्म से और न ही ईसाई धर्म से कि जिसके आदेश सामान्यतः यहूदी धर्म के ही आदेश हैं। इसके अतिरिक्त यहूदियों के लिए वर्जित की गयीं यह वस्तुएं, अपने आप में वर्जित नहीं थीं बल्कि दंड स्वरूप उनके लिए वर्जित की गयी थीं और यदि यहूदी उद्दंडता न करते तो यह वस्तुए उनके लिए वर्जित न होतीं जैसा कि सूरए निसा की 160वीं आयत में इस बात पर बल दिया गया है।ईश्वर के इस आदेश के आधार पर यहूदियों के लिए वो सारे पशु पक्षी वर्जित हो गये जिनकी उंगलियां जुड़ी हुई हों या खुर फटे न हों। अतः ऊंट और बत्तख़ उन पर वर्जित हो गये। इसके अतिरिक्त भेड़ और गाए की चर्बी भी उनके लिए वर्जित हो गयी सिवाए आंतों या हड्डी से लगी हुई चर्बी के। अलबत्ता इनमें से कुछ वस्तुएं हज़रत ईसा मसीह के काल में ईसाइयों के लिए वैध हो गयीं।अगली आयत पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहती है। यदि अनेकेश्वरवादी या यहूदी आपको झुठलाएं तो उनसे कह दीजिए कि यद्यपि अपने बंदों के प्रति ईश्वर की दया व्यापक है परंतु यह दया पापियों से दंड के समाप्त होने का कारण नहीं बनती। वह तत्काल तुम्हें दंडित नहीं करता बल्कि मोहलत देता है कि शायद तुम तौबा कर लो और ईश्वर की ओर पलट आओ।इन आयतों से हमने सीखा कि हमें अपने कर्मों के प्रति सतर्क रहना चाहिए क्योंकि संसार में ईश्वर का एक दंड, कुछ अनुकंपाओं से वंचित करना भी होता है।विरोधियों के सामने ईश्वर की दया का भी उल्लेख करना चाहिए और ईश्वरीय दंड की ओर से भी उन्हें सतर्क करना चाहिए।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 148 और 149 की तिलावत सुनते हैं।سَيَقُولُ الَّذِينَ أَشْرَكُوا لَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا أَشْرَكْنَا وَلَا آَبَاؤُنَا وَلَا حَرَّمْنَا مِنْ شَيْءٍ كَذَلِكَ كَذَّبَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ حَتَّى ذَاقُوا بَأْسَنَا قُلْ هَلْ عِنْدَكُمْ مِنْ عِلْمٍ فَتُخْرِجُوهُ لَنَا إِنْ تَتَّبِعُونَ إِلَّا الظَّنَّ وَإِنْ أَنْتُمْ إِلَّا تَخْرُصُونَ (148) قُلْ فَلِلَّهِ الْحُجَّةُ الْبَالِغَةُ فَلَوْ شَاءَ لَهَدَاكُمْ أَجْمَعِينَ (149)(हे पैग़म्बर!) शीघ्र ही ये अनेकेश्वरवादी कहेंगे कि यदि ईश्वर चाहता तो न हम अनेकेश्वरवादी होते न हमारे बाप दादा और न ही हम अपनी ओर से किसी वस्तु को वर्जित करते। इसी प्रकार इनसे पहले वालों ने भी सत्य को झुठलाया था यहां तक कि उन्होंने हमारे दंड का स्वाद चख लिया। (हे पैग़म्बर!) इनसे कह दीजिए कि क्या तुम्हारे पास कोई तर्क भी है? (यदि है) तो हमें दिखाओ। तुम लोग तो केवल विचारों और कल्पनाओं का अनुसरण करते हो और केवल अनुमान की बात करते हो। (6:148) (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि स्पष्ट और ठोस तर्क तो केवल ईश्वर के लिए ही है तो यदि वह चाहे तो तुम सबका मार्गदर्शन कर सकता है। (6:149)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को सूचना देती है कि शीघ्र की अनेकेश्वरवादी अपने अंधविश्वासी व पथभ्रष्ट विचारों का औचित्य दर्शाने के लिए विवशता की बात छेड़ेंगे और कहेंगे। ईश्वर को देख ही रहा है कि हम इन विचारों के आधार पर कर्म करते हैं, यदि वो चाहता तो हमें रोक सकता था। इसके अतिरिक्त यदि वो चाहता तो न हम अनेकेश्वरवादी बनते न हमारे पूर्वज और न ही हम किसी वस्तु को वर्जित करते। ये सारी बातें दर्शाती हैं कि ईश्वर चाहता है कि हम ऐसे ही रहें और ऐसे कर्म करते रहें।इस प्रकार के बहानों के उत्तर में क़ुरआने मजीद कहता है। ईश्वर ने अपने पैग़म्बर और आसमानी धर्म को भेजकर यह घोषणा कर दी कि वह ऐसी अंधविश्वासी आस्थाओं को स्वीकार नहीं करता, परंतु ऐसा भी नहीं है कि वो तुम्हें सत्य को स्वीकार करने पर विवश करे और तुम अपने पसंद के मार्ग का चयन न कर सको। ईश्वर ने तुम्हें अधिकार दिया है परंतु पैग़म्बर व आसमानी धर्म भेजकर तुम्हारा मार्गदर्शन किया है और अपना दायित्व पूरा कर दिया है ताकि तुम प्रलय में यह न कह सको कि हमें पता नहीं था और हम समझते नहीं थे तथा सत्य बात हमारे कानों तक नहीं पहुंची थी।अनेकेश्वरवादियों की बात को जारी रखते हुए क़ुरआने मजीद कहता ह कि ये केवल इन्हीं का कथन नहीं है बल्कि मानव इतिहास में सदैव विरोधियों और इन्कार करने वालों ने ऐसे ही बहाने बनाए हैं। परंतु यह बात ज्ञान और तर्क पर आधारित नहीं है बल्कि ये केवल एक अनुचित और महत्त्वहीन कल्पना और अनुमान है कि मनुष्य कहेः यदि ईश्वर चाहता तो मैं ऐसा न करता।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर लोगों का ईमान चाहता है परंतु विवशता से नहीं बल्कि स्वेच्छा से। इसी कारण पैग़म्बरों को भी लोगों को विवश करने का अधिकार नहीं है।पाप करने से भी बुरा उसका औचित्य दर्शाना है और सबसे बुरी बात पाप को ईश्वर से संबंधित करना है।