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    सूरए अनआम, आयतें 15-19, (कार्यक्रम 197)

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    आइये सूरए अनआम की 15वीं और 16वीं आयतों की तिलावत सुनते हैंقُلْ إِنِّي أَخَافُ إِنْ عَصَيْتُ رَبِّي عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ (15) مَنْ يُصْرَفْ عَنْهُ يَوْمَئِذٍ فَقَدْ رَحِمَهُ وَذَلِكَ الْفَوْزُ الْمُبِينُ (16)(हे पैग़म्बर! अनेकेश्वरवादियों से) कह दीजिए कि निसंदेह मैं (प्रलय के) महान दिन के दंड से डरता हूं कि अपने पालनहार की अवज्ञा करूं। (6:15) उस दिन जिस पर से दंड टाल दिया जाए तो निसंदेह उस पर ईश्वर ने दया की है और यही स्पष्ट सफलता है। (6:16)अनेकेश्वरवादियों द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को यह प्रस्ताव दिए जाने के पश्चात कि यदि आप एकेश्वरवाद का निमंत्रण देना छोड़ दें तो हम आपको आवश्यकतामुक्त कर देंगे, इस आयत में ईश्वर अपने पैग़म्बर से कहता है कि उनसे कह दो कि तुम मुझे संसार का लोभ दे रहे हो जबकि मैं प्रलय के दिन के हिसाब से डरता हूं क्योंकि पैग़म्बरी के काम में किसी भी प्रकार की कमी या उसे छिपाने और फेर बदल का बहुत बड़ा दंड है जिसे सहन करने की क्षमता मुझमें नहीं है।अलबत्ता यह बात स्पष्ट है कि पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने कभी भी ईश्वर की अवज्ञा नहीं की, परंतु इस बात का वर्णन दर्शाता है कि मुसलमानों को दूसरों के प्रलोभन के मुक़ाबले में प्रलय को याद करना चाहिए और दंड से भय द्वारा स्वयं को नियंत्रित करना चाहिए।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के दंडात्मक क़ानून सबके लिए एक समान हैं। यदि ईश्वर का पैग़म्बर भी अवज्ञा करे तो उसे भी दंड दिया जाएगा।ईश्वरीय दंड से डरना, अत्याचारी शक्तियों और मनुष्य से डरने के विपरीत एक उचित और प्रशंसनीय भय है।पाप के ख़तरे में सभी फंस सकते हैं। केवल ईश्वरीय दया ही है जो मनुष्य को पापों से दूर रखती है या पाप करने के पश्चात, तौबा और फिर क्षमा का मार्ग उसके लिए प्रशस्त करती है।आइये अब सूरए अनआम की 17वीं और 18वीं आयतों की तिलावत सुनते हैंوَإِنْ يَمْسَسْكَ اللَّهُ بِضُرٍّ فَلَا كَاشِفَ لَهُ إِلَّا هُوَ وَإِنْ يَمْسَسْكَ بِخَيْرٍ فَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (17) وَهُوَ الْقَاهِرُ فَوْقَ عِبَادِهِ وَهُوَ الْحَكِيمُ الْخَبِيرُ (18)और यदि ईश्वर तुम्हें कोई क्षति पहुंचाना चाहे तो स्वयं उसी के अतिरिक्त कोई भी उसे टालने वाला नहीं है और यदि वह तुम्हें कोई भलाई देना चाहे (तब भी उसमें कोई बाधा नहीं डाल सकता क्योंकि) वह हर बात में सक्षम है। (6:17) और वह अपने बंदों पर नियंत्रण और वर्चस्व रखता है तथा वह तत्वदर्शी और हर बात से अवगत है। (6:18)पिछली आयतों में अनेकेश्वरवादियों के सांसारिक प्रलोभन का कड़ा उत्तर देने के पश्चात इन आयतों में ईश्वर कहता है कि हे पैग़म्बर, उनसे कह दीजिए कि हर वस्तु और हर बात ईश्वर के हाथ में है। अच्छी और कटु घटनाएं, उसकी मर्ज़ी के बिना नहीं घट सकतीं। यदि किसी को क्षति पहुंचाना चाहे तो उससे बचने का कोई मार्ग नहीं है।इसी प्रकार यदि वह किसी को भलाई और आराम देना चाहे तो उसमें भी कोई बाधा नहीं बन सकता। अतः तुम मुझे जो लोभ देते हो या वादा करते हो उसका कोई लाभ नहीं है क्योंकि यदि ईश्वर न चाहे तो मुझे कोई आराम नहीं मिल सकता। इसी प्रकार यदि तुम मुझे धमकी दो तो जब तक वह न चाहे तुम मुझे कोई क्षति नहीं पहुंचा सकते।इन आयतों से हमने सीखा कि सारी आशाएं और इसी के साथ सारे भय भी ईश्वर से ही होने चाहिए क्योंकि सारी बातें उसी के हाथ में है।ईश्वर के अतिरिक्त किसी से नहीं डरना चाहिए कि किसी के पास कोई शक्ति नहीं है। केवल ईश्वर से ही डरना चाहिए कि उसकी शक्ति सब शक्तियों से महान है।उस शक्ति का मूल्य है जो तत्वदर्शिता के साथ हो। इन आयतों में ईश्वर की शक्ति को उसके ज्ञान और तत्वदर्शिता के साथ वर्णित किया गया है।अब सूरए अनआम की 19वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قُلْ أَيُّ شَيْءٍ أَكْبَرُ شَهَادَةً قُلِ اللَّهُ شَهِيدٌ بَيْنِي وَبَيْنَكُمْ وَأُوحِيَ إِلَيَّ هَذَا الْقُرْآَنُ لِأُنْذِرَكُمْ بِهِ وَمَنْ بَلَغَ أَئِنَّكُمْ لَتَشْهَدُونَ أَنَّ مَعَ اللَّهِ آَلِهَةً أُخْرَى قُلْ لَا أَشْهَدُ قُلْ إِنَّمَا هُوَ إِلَهٌ وَاحِدٌ وَإِنَّنِي بَرِيءٌ مِمَّا تُشْرِكُونَ (19)(हे पैग़म्बर! उनसे) कह दीजिए कि गवाही के लिए सबसे बड़ी वस्तु क्या है? कह दीजिए कि ईश्वर मेरे और तुम्हारे बीच गवाह है और वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश द्वारा यह क़ुरआन मेरी ओर भेजा गया है ताकि इसके द्वारा तुम्हें और जिस व्यक्ति तक यह संदेश पहुंचे, उसे डराऊं। क्या तुम लोग गवाही देते हो कि ईश्वर के साथ कुछ अन्य ईश्वर भी हैं? कह दीजिए कि मैं इसकी गवाही नहीं दे सकता। कह दीजिए कि निसंदेह वही एकमात्र ईश्वर है और मैं तुम्हारे अनेकेश्वरवाद से विरक्त हूं। (6:19)मक्के के अनेकेश्वरवादियों का एक गुट पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के पास आया और उसने कहा कि कोई भी आपकी सत्यता की गवाही नहीं देता। यहां तक कि यहूदी और ईसाई भी जिनके पास आसमानी किताब है, आपकी पैग़म्बरी को स्वीकार नहीं करते। कम से कम एक ऐसा आदमी तो दिखा दीजिए कि जो आपकी पैग़म्बरी की गवाही दे।उनके उत्तर में यह आयत कहती है कि तुम्हारे विचार में सबसे अच्छा गवाह कौन है? क्या ईश्वर की गवाही सबसे बड़ी गवाही नहीं है? तो ईश्वर ने मुझ पर क़ुरआन उतारकर मेरी पैग़म्बरी की गवाही दी। क़ुरआन ऐसी पुस्तक है कि जिसके शब्द और बातें मनुष्यों के विचारों का परिणाम नहीं हैं और न ही हो सकती है।आगे चलकर आयत, पैग़म्बरी के लक्ष्य के बारे में कहती है। मैं धन और पद प्राप्त करने के लिए नहीं आया हूं। मैं तुमसे कुछ भी नहीं चाहता। मैं तो केवल तुम्हें इस बात की चेतावनी देने आया हूं कि मूर्तियों की उपासना और शैतानी शक्तियों का आज्ञापालन छोड़ दो और केवल, एकमात्र व अनन्य ईश्वर की उपासना करो।इस आयत में ध्यान योग्य बात इस्लाम के विश्वव्यापी लक्ष्य और क़ुरआन के सार्वजनिक व सर्वकालिक निमंत्रण की घोषणा है ताकि कोई यह न सोचे कि पैग़म्बरे इस्लाम का निमंत्रण अरब मूल या किसी ख़ास समय या स्थान से विशेष था। जैसा कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने इस आयत की व्याख्या में कहा कि यदि अन्य ईश्वर भी होते तो वे लोगों के लिए अपने अपने पैग़म्बर भेजते जबकि पूरे मानव इतिहास में सारे पैग़म्बर एक ही ईश्वर की ओर से आए हैं।इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआन, पैग़म्बरे इस्लाम की सत्यता का सबसे बड़ा गवाह है।पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी, विश्वव्यापी, अनंत तथा सभी लोगों, सभी कालों और वंशों के लिए है।पैग़म्बर के पश्चात ईमान वालों और भले लोगों पर धर्म के प्रचार का दायित्व है क्योंकि जब तक लोगों तक ईश्वरीय संदेश न पहुंचे उनका कोई दायित्व नहीं है।आसमानी धर्म और उसके नेता से वफ़ादारी की घोषणा भी आवश्यक है और अनेकेश्वरवाद तथा अनेकेश्वरवादियों से विरक्तता की घोषणा भी।