islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए अनआम, आयतें 150-152, (कार्यक्रम 228)

    सूरए अनआम, आयतें 150-152, (कार्यक्रम 228)

    Rate this post

    आइये सूरए अनआम की आयत नंबर 150 की तिलावत सुनते हैंقُلْ هَلُمَّ شُهَدَاءَكُمُ الَّذِينَ يَشْهَدُونَ أَنَّ اللَّهَ حَرَّمَ هَذَا فَإِنْ شَهِدُوا فَلَا تَشْهَدْ مَعَهُمْ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا وَالَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآَخِرَةِ وَهُمْ بِرَبِّهِمْ يَعْدِلُونَ (150)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि ज़रा तुम अपने गवाहों को तो लाओ जो इस बात की गवाही देते है कि ईश्वर ने इस (वस्तु) को वर्जित किया है। तो यदि वे (झूठी) गवाही दे भी दें तो आप उनके साथ गवाही मत दीजिए और उन लोगों की इच्दाओं का अनुसरण न कीजिए जिन्होंने हमारी निशानियों को झुठलाया और जो प्रलय पर ईमान नहीं रखते और किसी व्यक्ति या वस्तु को अपने पालनहार का समकक्ष ठहराते हैं। (6:150)इससे पहले हमने बताया था कि अनेकेश्वरवादियों ने अपनी ओर से कुछ वस्तुओं को वर्जित कर रखा था और ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को इस प्रकार के अंधविश्वास का मुक़ाबला करने का आदेश दिया। यह आयत कहती है। हे पैग़म्बर! उनसे कहिए कि वे गवाह पेश करें, जो उनके पास नहीं है, परंतु यदि वे झूठी गवाही के लिए कुछ लोगों को ले भी आएं तो आप उनकी बात स्वीकार मत कीजिए और उनको अपने धर्म की आकृष्ट करने के लिए उनके साथ मत हो जाइये।क्योंकि वे कभी भी आप और आपकी किताब पर ईमान नहीं लाएंगे। यह मत सोचिए कि यदि कुछ मामलों में आप उनके साथ हो जाएं और उनकी बात स्वीकार कर लें तो वे भी आपकी बात मान लेंगे और आप पर ईमान ले आएंगे।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम, तर्क और बुद्धि का धर्म है तथा अंधविश्वास से मेल नहीं खाता, इसी कारण वो अपने विरोधियों से भी तर्क की मांग करता है।मानवीय इच्छाओं के आधार पर बनाए गये सांसारिक क़ानून, अनुसरण के योग्य नहीं हैं और ईमान वाला व्यक्ति केवल ईश्वरीय क़ानूनों का पालन करता है।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 151 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ تَعَالَوْا أَتْلُ مَا حَرَّمَ رَبُّكُمْ عَلَيْكُمْ أَلَّا تُشْرِكُوا بِهِ شَيْئًا وَبِالْوَالِدَيْنِ إِحْسَانًا وَلَا تَقْتُلُوا أَوْلَادَكُمْ مِنْ إِمْلَاقٍ نَحْنُ نَرْزُقُكُمْ وَإِيَّاهُمْ وَلَا تَقْرَبُوا الْفَوَاحِشَ مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَمَا بَطَنَ وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ ذَلِكُمْ وَصَّاكُمْ بِهِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ (151)(हे पैग़म्बर! अनेकेश्वरवादियों से) कह दीजिए कि आओ मैं तुम्हें बताऊं कि तुम्हारे पालनहार ने क्या हराम अर्थात वर्जित किया है। किसी को उसका समकक्ष न ठहराओ, माता पिता के साथ भलाई करो, दरिद्रता (के डर) से अपन संतान की हत्या न करो कि हम (ही) तुम्हें भी रोज़ी देते हैं और उन्हें भी, कुकर्मों के निकट न जाओ चाहे वे प्रकट हों या गुप्त, किसी ऐसे की हत्या न करो कि जिसकी हत्या ईश्वर ने वर्जित की हो, सिवाए इसके कि (तुम्हारा) कोई अधिकार हो। ये वे बातें हैं जिनकी ईश्वर ने तुम्हें सिफ़ारिश की है कि शायद तुम सोच विचार करो (और स्वीकार कर लो) (6:151)पिछली आयतों में अंधविश्वास का विरोध करने के पश्चात ईश्वर कुछ वर्जित बातों की ओर संकेत करता है जो पिछले सभी आसमानी धर्मों में भी वर्जित थीं और इस्लाम से विशेष नहीं हैं। सबसे बड़ा वर्जित कर्म, किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराना है जिसमें तुम अनेकेश्वरवादी ग्रस्त हो और कुछ वस्तुओं को अपने ऊपर वर्जित करके, सोचते हो कि ईश्वर को प्रसन्न कर रहे हो, जबकि तुमने सबसे बड़ा पाप किया है और तुम्हें पता ही नहीं है।अनेकेश्वरवाद के अतिरिक्त तुम दरिद्रता, सूखे और अकाल जैसे विभिन्न बहानों से अपने बच्चों की हत्या करते हो और उन्हें मूर्तियों की भेंट चढ़ाते हो ताकि वे सूखे और अकाल को टाल दें। तुम सोचते हो कि तुम्हारी और तुम्हारे बच्चों की रोज़ी मूर्तियों के हाथ में है, जबकि हम तुम्हें और तुम्हारी संतान को रोज़ी देते हैं।तुम लोग कभी खुलकर और कभी छिप कर ऐसे बुरे कर्म करते हो जिनकी बुराई से स्वयं भी अवगत हो। तुम लोग छोटी-2 बातों पर एक दूसरे से झगड़ते और युद्ध तथा रक्तपात करते हो, जबकि ईश्वर ने बुरे कर्म करने और अकारण किसी की हत्या करने को वर्जित किया है। यदि तुम स्वयं इस बारे में चिंतन और सोचविचार करो तो इन बातों की बुराई से अवगत हो जाओगे जबकि ईश्वर भी इस बारे में तुमसे सिफ़ारिश करता है कि शायद तुम अधिक सोच विचार करके इन बातों को छोड़ दो।इस आयत से हमने सीखा कि अनेकेश्वरवाद सारी बुराइयों की जड़ है अतः इसे सारी वर्जित बातों के ऊपर रखा गया है, इसी प्रकार माता पिता के साथ भलाई सबसे अच्छे कर्मों में से है अतः सदैव इसे ईश्वर के अनन्य होने की विशेषता के पश्चात वर्णित किया गया है।आजकल के विकसित समाजों में तेज़ी से बढ़ने वाला गर्भपात, अज्ञानता के काल की निशानियों में से एक है।कुछ पाप इतने ख़तरनाक हें कि न केवल उन्हें नहीं करना चाहिए बल्कि उनके निकट भी नहीं जाना चाहिए।ईश्वरीय आदेश बुद्धि से समन्वित हैं और उसकी प्रगति और विकास की भूमि समतल करते हैं।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 152 की तिलावत सुनते हैं।وَلَا تَقْرَبُوا مَالَ الْيَتِيمِ إِلَّا بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ حَتَّى يَبْلُغَ أَشُدَّهُ وَأَوْفُوا الْكَيْلَ وَالْمِيزَانَ بِالْقِسْطِ لَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا وَإِذَا قُلْتُمْ فَاعْدِلُوا وَلَوْ كَانَ ذَا قُرْبَى وَبِعَهْدِ اللَّهِ أَوْفُوا ذَلِكُمْ وَصَّاكُمْ بِهِ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ (152)और अनाथों के माल के निकट (भी) मत जाओ सिवाए सबसे अच्छे ढंग से (कि जो उनके हित में हो) यहां तक कि वे वयस्क हो जाएं। और (लेन देन) तथा नाप तोल में तराज़ू को न्याय के साथ पूरा पूरा भरो। हम किसी को भी उसकी क्षमता से अधिक दायित्व नहीं देते और जब बात करो तो न्याय का पालन करो चाहे (तुम्हारे और) तुम्हारे परिजनों (के विरुद्ध ही क्यों न) हो। और ईश्वर के वचन को (अवश्य) पूरा करो। ये वे बातें हैं जिनकी ईश्वर ने तुम्हें सिफ़ारिश की है कि शायद तुम समझ जाओ और सीख ले लो। (6:152)पिछली आयत में कुछ वर्जित बातों का उल्लेख करने के पश्चात, इस आयत में ईश्वर कुछ बातों को महत्त्वपूर्ण बताते हुए कहता है। समाज में अनाथों और वंचितों का माल नहीं खाया जाना चाहिए बल्कि बेहतरीन ढंग से उसकी सुरक्षा की जानी चाहिए और जब वे समझदार और व्यस्क हो जाएं तो उनका माल उन्हें सौंप देना चाहिए।आयत इसी प्रकार बल देकर कहती है कि जब तक वे अव्यस्क रहें उनकी संपत्ति से कोई काम नहीं करना चाहिए सिवाए इसके उसमें उनका हित हो।आगे चलकर आयत कहती है कि आर्थिक मामलों, लेन देन और क्रय-विक्रय में कमी नहीं करनी चाहिए बल्कि मूल्य के अनुसार ही सामान देना चाहिए। व्यापार में भी पूर्ण रूप से न्याय करना चाहिए। जिस प्रकार से कि सामाजिक मामलों में ही हमें सदैव सच्चाई से काम लेना चाहिए चाहे हमारा सत्य, हमारे परिजनों के विरुद्ध ही क्यों न हो।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर जो अपने सारे काम सर्वोत्तम ढंग से करता है, हमसे चाहता है कि हम भी अपने सारे कर्मों को सबसे अच्छे ढंग से पूरा करें। चाहे वो अपने संबंध में हों या दूसरों के संबंध में।समाज में अर्थव्यवस्था न्याय के आधार पर होनी चाहिए न कि संपत्ति बढ़ाने या पूंजिपतियों के हितों की रक्षा के आधार पर।ईश्वरीय आदेश और दायित्व, मनुष्य की क्षमता से अधिक नहीं है। दायित्व क्षमता के अनुसार होता है, जिसमें अधिक क्षमता होती है, उसका दायित्व भी भारी होता है।कथन और व्यवहार में न्याय से काम लेना, इस्लाम के उन महत्त्वपूर्ण सिद्धांतों में है जिनकी ईश्वर सदैव सिफ़ारिश करता है।क़ानून व सिद्धांत, संबंधों पर श्रेष्ठता रखता है। रिश्तेदारी को सत्य व न्याय के सिद्धांत पर प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए।