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    सूरए अनआम, आयतें 153-157, (कार्यक्रम 229)

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    आइये सूरए अनआम की 153वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَأَنَّ هَذَا صِرَاطِي مُسْتَقِيمًا فَاتَّبِعُوهُ وَلَا تَتَّبِعُوا السُّبُلَ فَتَفَرَّقَ بِكُمْ عَنْ سَبِيلِهِ ذَلِكُمْ وَصَّاكُمْ بِهِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ (153)और निसंदेह यह मेरा सीधा मार्ग है, तो इसका अनुसरण करो और अन्य मार्गों पर मत चलो कि वे तुम्हें ईश्वर के मार्ग से दूर कर देंगे ईश्वर ने तुम्हें इसी की सिफ़ारिश की है कि शायद तुममें ईश्वर का भय उत्पन्न हो जाए। (6:153)पिछली आयतों में क़ुरआने मजीद ने अनेकेश्वरवादियों के संस्कारों और आस्थाओं का वर्णन करते हुए विभिन्न मामलों में हलाल व हराम अर्थात वैध व वर्जित बातों का उल्लेख किया। यह आयत उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहती है। लोगों के विभिन्न मार्गों और पद्धतियों का अनुसरण करने के स्थान पर, जिनमें से हर एक, एक अलग दिशा में जाता है, ईश्वर के सीधे मार्ग पर चलो कि जो लोगों के अनेक व बिखरे हुए मार्गों के मुक़ाबले में एक व स्पष्ट है।रोचक बात यह है कि अधिकांश अंधविश्वासों और ग़लत आस्थाओं को ऐसे लोग अस्तित्व में लाएं हैं जो स्वयं को अत्यंत ईमानदार और धर्म का पालनकर्ता समझते हैं। वस्तुतः इन लोगों ने अपने व्यक्तिगत विचारों को धर्म का अंग बताते हुए कहा है कि धर्म ऐसा कहता है जबकि धर्म का मार्ग संतुलन का मार्ग और क़ुरआने मजीद के शब्दों में सीधा मार्ग है कि जो आस्था और कर्म में हर प्रकार की अतिश्योक्ति या कमी से दूर है। ईश्वर का सही भय इसी मार्ग पर चलने से प्राप्त होता है। इस आयत से हमने सीखा कि समाज के सभी लोगों के बीच एकता व एकजुटता का सबसे अच्छा मार्ग ईश्वरीय आदेशों का पालन है, इसी प्रकार हर प्रकार की फूट और मतभेद का कारण, धर्म के आदेशों से दूरी है।ईश्वर का मार्ग एक ही है जिस प्रकार से कि सत्य भी सदैव एक होता है और किसी भी मामले में दो सत्य नहीं हो सकते।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 154 की तिलावत सुनते हैं।ثُمَّ آَتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ تَمَامًا عَلَى الَّذِي أَحْسَنَ وَتَفْصِيلًا لِكُلِّ شَيْءٍ وَهُدًى وَرَحْمَةً لَعَلَّهُمْ بِلِقَاءِ رَبِّهِمْ يُؤْمِنُونَ (154)फिर हमने मूसा को किताब दी ताकि उस व्यक्ति पर अपनी अनुकंपा को पूर्ण कर दें जिसने भलाई की। (वह किताब) हर बात को विस्तार से बयान करने वाली, मार्गदर्शक तथा कृपा थी कि शायद लोग (प्रलय में) अपने पालनहार से भेंट पर ईमान ले आएं। (6:154)कुछ लोग सोचते हैं कि आसमानी धर्मों के बीच मतभेद और विरोधाभास है परंतु इसके विपरीत सभी आसमानी किताबें एक दूसरे की पुष्टि करती हैं। ये किताबें पैग़म्बरों के आगमन को ऐसी प्रक्रिया मानती हैं, जो एक दूसरे की पूर्ति तथा एक ही लक्ष्य के लिए आए हैं और वह लक्ष्य लोगों का मार्गदर्शन तथा विभिन्न विषयों के बारे में ईश्वरीय आदेशों का वर्णन है।इस आयत में क़ुरआने मजीद तौरैत को हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की जाति के मार्गदर्शन के लिए ईश्वर की दया व कृपा बताता है। तौरैत ऐसी किताब है जो हज़रत मूसा व उनकी जाति पर अनुकंपाओं को संपूर्ण करने के समान और प्रलय की घटनाओं को याद दिलाने वाली हैं।इस आयत से हमने सीखा कि आसमानी किताबों ने प्रगति, परिपूर्णता और कल्याण प्राप्ति के लिए मनुष्य की सभी आवश्यकताओं का उल्लेख किया है।केवल भले कर्म करने वाले और भले विचार रखने वाले ही आसमानी किताबों से सही लाभ उठाते हैं और बुरे कर्म करने वाले इससे वंचित हैं।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 155 और 156 की तिलावत सुनते हैं।وَهَذَا كِتَابٌ أَنْزَلْنَاهُ مُبَارَكٌ فَاتَّبِعُوهُ وَاتَّقُوا لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ (155) أَنْ تَقُولُوا إِنَّمَا أُنْزِلَ الْكِتَابُ عَلَى طَائِفَتَيْنِ مِنْ قَبْلِنَا وَإِنْ كُنَّا عَنْ دِرَاسَتِهِمْ لَغَافِلِينَ (156)और यह (क़ुरआन भी) जिसे हमने उतारा है (पवित्र और) विभूतिपूर्ण किताब है तो इसका पालन करो और ईश्वर से डरो कि शायद दया के पात्र बन जाओ। (6:155) (हमने क़ुरआन को उतारा) ताकि तुम यह न कहो कि आसमानी किताब तो हमसे पूर्व केवल दो समुदाय (अर्थात यहूदियों और ईसाइयों) पर उतर चुकी है और हम उसके पाठों की ओर से निश्चेत थे। (6:156)पिछली आयत में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की जाति के लिए ईश्वरीय किताब भेजने का उल्लेख करने के पश्चात इन आयतों में ईश्वर कहता है। इस क़ुरआन को हमने तुम्हारे लिए भेजा है कि जो तौरैत की भांति विभूतिपूर्ण किताब है और इसके आदेशों का पालन करने से तुम्हें प्रगति मिलेगी और तुम्हारी आयु में वृद्धि होगी।हमने यह किताब भेजी है ताकि तुम यह बहाना न बना सको कि हमें आसमानी किताबों के बारे में कुछ पता नहीं था। तो अब तुम लोग इसका पालन करो और केवल ईश्वर से डरो कि उसकी विशेष दया व कृपा के पात्र बन सको।इन आयतों से हमने सीखा कि कि क़ुरआने मजीद दृष्टिकोण की किताब नहीं बल्कि कर्म की किताब है और इसे अपने जीवन का आदर्श बनाना चाहिए।मनुष्य का कल्याण दो बातों में निहित है, एक, सत्य का अनुसरण और दूसरे असत्य से दूरी।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 157 की तिलावत सुनते हैं।أَوْ تَقُولُوا لَوْ أَنَّا أُنْزِلَ عَلَيْنَا الْكِتَابُ لَكُنَّا أَهْدَى مِنْهُمْ فَقَدْ جَاءَكُمْ بَيِّنَةٌ مِنْ رَبِّكُمْ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنْ كَذَّبَ بِآَيَاتِ اللَّهِ وَصَدَفَ عَنْهَا سَنَجْزِي الَّذِينَ يَصْدِفُونَ عَنْ آَيَاتِنَا سُوءَ الْعَذَابِ بِمَا كَانُوا يَصْدِفُونَ (157)या तुम यह न कहो कि यदि आसमानी किताब हम पर उतारी जाती तो हम उन (यहूदियों और ईसाइयों) से अधिक मार्गदर्शित होते, अतः तुम्हारे पालनहार की ओर से स्पष्ट तर्क, मार्गदर्शन और दया आई। तो अब उससे अधिक अत्याचारी कौन होगा जो ईश्वर की निशानियों को झुठलाए और उनसे मुंह मोड़ ले? हम शीघ्र की अपनी आयतों या निशानियों की ओर से मुंह मोड़ लेने वालों को, उनके इस कार्य पर कड़ा दंड देंगे। (6:157)यह आयत कहती है कि हमने तुम्हारे पास क़ुरआन भेजा है कि ताकि अब तुम अनेकेश्वरवाद और कुफ़्र के लिए कोई बहाना न बना सको। हमने क़ुरआन भेजा है ताकि तुम यह न कह सको यदि आसमान किताब हमारे पास आती तो हम अन्य धर्मों के अनुयाइयों से कहीं अधिक ईमान वाले होते। अब जबकि क़ुरआन आ चुका है तो उसकी आयतों का इन्कार और उससे मुंह मोड़ना, बहुत बड़ा पाप है और इस पर अत्यंत कड़ा दंड दिया जाएगा और उससे बचना भी संभव न होगा।इस आयत से हमने सीखा कि ईमान का दावा करने वाले बहुत हैं, परीक्षा और कर्म के समय सच्चाई सिद्ध होती है।मानवता पर सबसे बड़ा अत्याचार, आसमानी किताबों और ईश्वरीय निशानियों की ओर से मुंह मोड़ना है।