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    सूरए अनआम, आयतें 158-161, (कार्यक्रम 230)

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    आइये सूरए अनआम की आयत संख्या 158 की तिलावत सुनते हैंهَلْ يَنْظُرُونَ إِلَّا أَنْ تَأْتِيَهُمُ الْمَلَائِكَةُ أَوْ يَأْتِيَ رَبُّكَ أَوْ يَأْتِيَ بَعْضُ آَيَاتِ رَبِّكَ يَوْمَ يَأْتِي بَعْضُ آَيَاتِ رَبِّكَ لَا يَنْفَعُ نَفْسًا إِيمَانُهَا لَمْ تَكُنْ آَمَنَتْ مِنْ قَبْلُ أَوْ كَسَبَتْ فِي إِيمَانِهَا خَيْرًا قُلِ انْتَظِرُوا إِنَّا مُنْتَظِرُونَ (158)क्या यह लोग इस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि फ़रिश्ते इनके पास आएं या स्वयं तुम्हारा पालनहार ही आ जाए या (फिर) तुम्हारे पालनहार की कोई निशानी आए? जिस दिन तुम्हारे पालनहार की कुछ (विशेष) निशानियां आएंगी, उस दिन ऐसे किसी को उसका ईमान, लाभ नहीं पहुंचाएगा जो (उन्हें देखने से) पहले ईमान न लाया हो, या जिसने अपने ईमान के दौरान कोई भलाई न की हो। (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि (ईश्वर के प्रकोप की) प्रतीक्षा करो कि निसंदेह, हम भी प्रतीक्षा करने वाले हैं। (6:158)इससे पहले हमने सुना कि क़ुरआने मजीद, पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम का मुख्य चमत्कार है और ऐसी किताब है जो इस्लाम का क़ानून है और चमत्कार भी परंतु काफ़िर और अनेकेश्वरवादी, बिना कोई तर्क प्रस्तुत किए और क़ुरआन के किसी भी एक सूरे तक का उत्तर देने की क्षमता रखे बिना, बहानेबाज़ी और हठधर्म के कारण उसकी बातों को अस्वीकार करके अन्य चमत्कारों की मांग करते थे। अपने ऊपर फ़रिश्तों का उतरना, ईश्वर का धरती पर आना, आसमानी आवाज़ें या भयभीत करने वाली गरज जैसी बातों की वे चमत्कार के रूप में मांग करते थे।परंतु पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम उनसे कहते थे कि तुम ईमान लाने वाले नहीं हो और यदि यह बातें हो भी जाएं तो तुम्हारे हित में नहीं हैं क्योंकि यदि तुम ईमान न लाए और अपने क़ुफ़्र पर जमे रहे तो ईश्वर के कड़े दंड के पात्र बन कर नष्ट हो जाओगे। ऐसा ईमान मूल्यवान होता है जो बुद्धि, ज्ञान और स्वतंत्रता से अपनाया गया हो न कि भय और विवशता के कारण।जिस प्रकार के चमत्कारों की तुम मांग कर रहे हो वे न केवल स्वेच्छा से ईमान स्वीकार करने का मार्ग बंद कर देते हैं बल्कि यह केवल तुम्हारी तबाही का कारण बनेंगे। जिस प्रकार से कि हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम ने पहाड़ से एक ऊंट बाहर निकाला परंतु विरोधियों ने ईमान लाने के स्थान पर उस ऊंट की हत्या कर दी और ईश्वरीय दंड के पात्र बने।इस आयत से हमने सीखा कि हठधर्मी लोग, कई ईश्वरीय चमत्कारों को देखने के पश्चात भी उन्हें स्वीकार नहीं करते, जबकि ईमान लाने के लिए तो एक चमत्कार भी काफ़ी है।बिना भले कर्म के ईमान और बिना ईमान के कर्मों का कोई मूल्य नहीं है।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 159 की तिलावत सुनते हैंإِنَّ الَّذِينَ فَرَّقُوا دِينَهُمْ وَكَانُوا شِيَعًا لَسْتَ مِنْهُمْ فِي شَيْءٍ إِنَّمَا أَمْرُهُمْ إِلَى اللَّهِ ثُمَّ يُنَبِّئُهُمْ بِمَا كَانُوا يَفْعَلُونَ (159)(हे पैग़म्बर!) आप उन लोगों के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं जिन्होंने अपने धर्म में जुदाई डाल दी और (स्वयं) गुट-गुट बन गये। उनका मामला ईश्वर के हाथ में है फिर वह उन्हें उनके कर्मों से (प्रलय में) अवगत कराएगा। (6:159)न केवल काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों बल्कि ईमान का दावा करने वाले उन लोगों का मामला भी ईश्वर के हाथ में है जो अंधविश्वासों, अपनी इच्छानुसार धर्म की व्याख्या और उसमें ग़लत बातें प्रचलित करके धर्म में फूट का कारण बनते हैं। ऐसे लोगों को प्रलय में अपने कर्मों का उत्तर देना होगा।अन्य धर्मों के अनुयाइयों पर क़ुरआने मजीद जो टिप्पणियां करता है उनमें से एक, उनके द्वारा अपनी आसमानी किताबों की शिक्षाओं में किए जाने वाले फेर-बदल से संबंधित है। यहां पर यह बात उल्लेखनीय है कि क़ुरआन के शब्दों और अर्थों में कोई फेर-बदल नहीं हुआ हैं परंतु कुछ लोगों ने उसकी आयों और पैग़म्बरों के कथनों की मनचाही व्याख्या अवश्य की है। यही विषय मुसलमानों के मध्य फूट का कारण बना है। अतः जिन लोगों का इसमें हाथ है उन्हें अपने इस कड़े अपराध का उत्तर देना होगा।इसी प्रकार धर्म गुरूओं का भी दायित्व है कि वे इस प्रकार की ग़लत बातों का पर्दाफ़ाश करके धर्म को अंधविश्वासों और ग़लत बातों से पवित्र करें। ऐसी स्थिति में वास्तविक एकता अस्तित्व में आएगी।इस आयत से हमने सीखा कि धर्म के सभी आदेशों और शिक्षाओं पर ईमान रखना आवश्यक है, कुछ का इन्कार और कुछ की स्वीकृति, धर्म की आत्मा से मेल नहीं खाती।मुसलमानों के बीच फूट, क़ुरआन तथा पैग़म्बर के कथनों में फेर-बदल की निशानी है अतः इसे ठीक किया जाना चाहिए।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 160 की तिलावत सुनते हैं।مَنْ جَاءَ بِالْحَسَنَةِ فَلَهُ عَشْرُ أَمْثَالِهَا وَمَنْ جَاءَ بِالسَّيِّئَةِ فَلَا يُجْزَى إِلَّا مِثْلَهَا وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ (160)जो कोई भलाई करेगा उसे उससे दस गुना अधिक (पारितोषिक) मिलेगा और जो कोई बुराई करेगा उसे उसी के जितना दंड मिलेगा और उन पर अत्याचार नहीं किया जाएगा। (6:160)मानवीय क़ानूनों से ईश्वरीय क़ानून की श्रेष्ठता के उदाहरणों में से एक, दायित्व के पालन का पारितोषिक है। मानवीय क़ानूनों में क़ानून विरोध और उल्लंघन पर दंड दिया जाता है किन्तु क़ानून के पालन पर कोई पारितोषिक नहीं दिया जाता। परंतु ईश्वरीय क़ानूनों में जिस प्रकार क़ानून के उल्लंघन पर दंड दिया जाता है उसी प्रकार से क़ानून के पालन पर भी पारितोषिक दिया जाता है। यह पारितोषिक उस कर्म से दस गुना या उससे भी अधिक होता है। यह कार्य अपने बंदों के प्रति ईश्वर की दया व कृपा की निशानी है।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम की प्रशिक्षणिक पद्धति के अनुसार, दंड से पहले प्रोत्साहन होना चाहिए।इस संसार से मनुष्य के साथ जो चीज़ परलोक जाती है व केवल उसके भले या बुरे कर्म ही हैं।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 161 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ إِنَّنِي هَدَانِي رَبِّي إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ دِينًا قِيَمًا مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ (161)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि निसंदेह, मेरे पालनहार ने सीधे रास्ते की ओर मेरा मार्गदर्शन किया है जो एक सुदृढ़ धर्म और सत्यवादी इब्राहीम का धर्म है और वह अनेकेश्वरवादियों में से न थे। (6:161)चूंकि अनेकेश्वरवादी स्वयं को हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के धर्म का अनुयाई समझते और हज के समान संस्कारों को उसकी निशानी बताते थे अतः ईश्वर इस आयत में अपने पैग़म्बर को आदेश देता है कि वह उनसे कह दें कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम भी उनके कर्मों से विरक्त हैं और उनका सत्यवादी धर्म भी अन्य ईश्वरीय धर्मों की भांति मज़बूत आधारों और सत्य के तर्क पर आधारित है और उसमें अनेकेश्वरवाद का कोई भी स्थान नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बर, ईश्वर के सीधे मार्ग का आदर्श हैं तथा उनके कथनों और कर्मों का अनुसरण मनुष्य को सीधे मार्ग पर ले आता है।सभी एकेश्वरवादी धर्मों का आधार एक ही है तथा इस्लाम भी हज़रत इब्राहीम के धर्म का ही अगला क्रम है।