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    सूरए अनआम, आयतें 162-165 (कार्यक्रम 231)

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    आइये सूरए अनआम की आयत संख्या 162 और 163 की तिलावत सुनते हैंقُلْ إِنَّ صَلَاتِي وَنُسُكِي وَمَحْيَايَ وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ (162) لَا شَرِيكَ لَهُ وَبِذَلِكَ أُمِرْتُ وَأَنَا أَوَّلُ الْمُسْلِمِينَ (163)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि मेरी नमाज़, मेरी उपासनाएं, मेरा जीवन और मेरी मृत्यु सब कुछ ईश्वर के लिए है जो पूरे ब्रह्मांड का पालनहार है। (6:162) और मैं ही उसके आदेशों के प्रति सबसे पहले नतमस्तक होने वाला हूं। (6:163)इससे पहले हमने बताया था कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम स्वयं को हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के धर्म को आगे बढ़ाने वाला बताते थे और ईश्वर के सीधे मार्ग पर चलने पर बल देते थे। यह आयतें सीधे मार्ग की सबसे बड़ी विशेषता, ईश्वर के समक्ष नतमस्तक रहना और निष्ठा के साथ उसका आज्ञापालन करना बताती हैं। यह पैग़म्बरे इस्लाम को आदेश देती हैं कि वे लोगों के समक्ष इस बात की घोषणा कर दें कि मेरा जीवन, मेरी मृत्यु, मेरी सारी उपासनाएं और मेरी नमाज़ सब कुछ ईश्वर के मार्ग में है और ईश्वर ही के लिए है। ईश्वर के अतिरिक्त मेरा कोई लक्ष्य नहीं है और मैं केवल उसी के लिए काम करता हूं।यह आयत आगे चलकर पैग़म्बर की ओर संकेत करते हुए कहती है कि तुम जिन वस्तुओं या लोगों को ईश्वर का समकक्ष ठहराते हो, मैं उनसे विरक्त हूं और ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होने में, मैं अग्रणी हूं। यदि मैं दूसरों को ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होने का आदेश या निमंत्रण देता हूं तो सबसे पहले स्वयं उसके आदेशों के प्रति समर्पित हूं और इस मार्ग पर अन्य लोगों को आमंत्रित करने का मुझपर दायित्व है।न केवल पैग़म्बरे इस्लाम बल्कि सारे ही पैग़म्बर अपने पालनहार के समक्ष पूर्णतः समर्पित थे और ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि वे जीवन में उसके समक्ष नतमस्तक रहें तथा मृत्यु के समय भी उसके आदेशों के प्रति नतमस्तक रहते हुए संसार से जाएं।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर पर ईमान रखने वाला व्यक्ति केवल नमाज़ और उपासना के समय ही ईश्वर का बंदा नहीं होता बल्कि वह अपनी पूरी आयु में हर क्षण ईश्वर का निष्ठावान और समर्पित बंदा रहता है।जीवन या मृत्यु महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्त्वपूर्ण यह है कि मनुष्य ईश्वर क मार्ग पर रहे और उसी के लिए जीवन बिताए या मौत को गले लगाए।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 164 की तिलावत सुनते हैंقُلْ أَغَيْرَ اللَّهِ أَبْغِي رَبًّا وَهُوَ رَبُّ كُلِّ شَيْءٍ وَلَا تَكْسِبُ كُلُّ نَفْسٍ إِلَّا عَلَيْهَا وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى ثُمَّ إِلَى رَبِّكُمْ مَرْجِعُكُمْ فَيُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ (164)(हे पैग़म्बर! उनसे) कह दीजिए कि क्या मैं (एकमात्र) ईश्वर के अतिरिक्त किसी पालनहार को खोजूं जबकि वह हर वस्तु का पालनहार है। और जो कोई जो कुछ करेगा उसका घाटा वही उठाएगा और कोई भी दूसरे (के पाप) का बोझ नहीं उठाएगा। तुम्हारी वापसी, तुम्हारे पालनहार ही की ओर है। फिर वह तुम्हें उस बात के बारे में अवगत करा देगा जिसमें तुम मतभेद कर रहे थे। (6:164)इस आय में पैग़म्बरे इस्लाम आश्चर्य के साथ अनेकेश्वरवादियों से पूछते हैं कि मैं क्यों पूरे ब्रह्मांड के पालनहार, एकमात्र ईश्वर को छोड़कर तुम्हारी मूर्तियों को पालनहार मानूं? तुम्हारी मूर्तियां ऐसा कौन सा काम करती हैं जिसमें वह सक्षम नहीं है। तुम मुझे इन निर्जीव मूर्तियों की ओर बुलाकर क्यों कहते हो कि हमारा अनुसरण करो। हम तुम्हारा समर्थन करेंगे और यदि हमारा मार्ग ग़लत हुआ तो हम तुम्हारा पाप अपने ऊपर ले लेंगे।क्या तुम्हें ज्ञात नहीं है कि हर किसी का पाप उसी की गर्दन पर होता है और कोई किसी के पाप का बोझ नहीं उठा सकता। क्या तुम्हें पता नहीं है कि मनुष्य जो कुछ करता है उसका लाभ और हानि उसी के लिए होती है और दूसरों की इसमें कोई भूमिका नहीं होती। जान लो कि तुम सबको एक दिन ईश्वर के सामने जाना है और अपने विवादास्पद कर्मों तथा आस्थाओं का जवाब देना है।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों के कुफ़्र और ईमान या भलाई और बुराई से ईश्वर को कोई लाभ या हानि नहीं है बल्कि अपने कर्मों का परिणाम स्वयं मनुष्य को भुगतना पड़ता है।हर व्यक्ति के कर्म का दायित्व स्वयं उसी पर है। अपने बुरे कर्मों को समाज, परिवार या मित्रों की गर्दन पर नहीं डालना चाहिए कि यह औचित्य दर्शाने के अतिरिक्त कुछ नहीं है।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 165 की तिलावत सुनते हैंوَهُوَ الَّذِي جَعَلَكُمْ خَلَائِفَ الْأَرْضِ وَرَفَعَ بَعْضَكُمْ فَوْقَ بَعْضٍ دَرَجَاتٍ لِيَبْلُوَكُمْ فِي مَا آَتَاكُمْ إِنَّ رَبَّكَ سَرِيعُ الْعِقَابِ وَإِنَّهُ لَغَفُورٌ رَحِيمٌ (165)और वह वही ईश्वर है जिसने तुम्हें धरती में (एक दूसरे का) उत्तराधिकारी बनाया और तुममें से कुछ के दर्जों को कुछ दूसरों से श्रेष्ठता दी ताकि जो कुछ तुम्हें दिया गया है उसमें तुम्हारी परीक्षा ले। निसंदेह, तुम्हारा पालनहार बहुत ही जल्दी हिसाब करने वाला है और निसंदेह, वह अत्यंत ही क्षमाशील तथा दयावान है। (6:165)सूरए अनआम की अंतिम आयत, धरती पर मानव जीवन और समस्त अनुकंपाओं तथा संभावनाओं से लाभान्वित होने की ओर संकेत करते हुए कहती है कि जो कुछ ईश्वर ने तुम्हें दिया है वह सब तुम्हारी परीक्षा के साधन है। जान लो तुमसे पहले भी अनेक मनुष्य आए और चले गये और तुम भी जो उनके उत्तराधिकार हो उन्हीं की भांति चले जाओगे और तुम्हारे स्थान पर दूसरे आ जाएंगे।तो अब जो तुम्हें अवसर प्राप्त है उससे बेहतरीन ढंग से लाभान्वित हो और जान लो कि ईश्वर द्वारा दी गयी अनुकंपाएं अकारण नहीं हैं जिनको जितना भी दिया गया है वह उसी मात्रा में उत्तरदायी भी है। धरती की संभावनाओं से लाभान्वित होने में सारे मनुष्य एक समान नहीं हैं। यही अंतर परीक्षा की भूमि है।इस आयत से हमने सीखा कि अनुकंपाओं से लाभान्वित होने के संबंध में मनुष्य के बीच अंतर, कुछ लोगों के श्रेष्ठ होने का मानदंड नहीं है बल्कि यह परीक्षा का साधन है। धनी और निर्धन दोनों की परीक्षा होती है। धनवान की माल से और निर्धन की दरिद्रता से।परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने वालों के संबंध में ईश्वर तत्काल हिसाब करने वाला है जबकि उत्तीर्ण होने वालों के प्रति दयालु और कृपालु है।जो कुछ हमारे पास है उसे ईश्वर का ही समझना चाहिए अपना कदापि नहीं। ऐसी स्थिति में हम उसे ईश्वर के मार्ग में देने पर तैयार हो जाएंगे।