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    सूरए अनआम, आयतें 20-24, (कार्यक्रम 198)

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    आइये सूरए अनआम की 20वीं आयत की तिलावत सुनते हैंالَّذِينَ آَتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَعْرِفُونَهُ كَمَا يَعْرِفُونَ أَبْنَاءَهُمُ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنْفُسَهُمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ (20)जिन लोगों को हमने आस्मानी किताब दी है वे पैग़म्बर को अपने बच्चों की भांति पहचानते हैं (परंतु) जिन लोगों ने अपने आप को घाटे में डाल रखा है वे ईमान नहीं लाएंगे। (6:20)यह आयत कहती है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के काल के यहूदी और ईसाई उन्हें भली भांति जानते और पहचानते थे। वैसे ही जैसे कोई मनुष्य अपने बच्चों को पहचानता है और जन्म से ही उसकी सभी निशानियों से भली भांति अवगत होता है क्योंकि पैग़म्बर के नाम और उनकी निशानियों का भी तौरैत और इंजील में उल्लेख हुआ था और ईसाईयों तथा यहूदियों के धर्मगुरू भी अंतिम पैग़म्बर के रूप में उनके आने की शुभ सूचना देते रहे थे।अंत में आयत कहती है कि जो लोग सत्य स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं और ईमान नहीं लाएंगे उन्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि वे पैग़म्बर या उनके धर्म को कोई क्षति नहीं पहुंचा सकते बल्कि वे स्वयं को क्षति पहुंचा रहे हैं और अपनी आंतरिक प्रगति तथा विकास के मार्ग में बाधा बन रहे हैं।इस आयत से हमने सीखा कि केवल सत्य को जानना और पहचानना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसका पालन और अनुसरण भी आवश्यक है। बहुत से लोग पैग़म्बरे इस्लाम को पहचानते थे परंतु द्वेष और हठधर्म के कारण उनका धर्म स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते थे।क़ुरआन की दृष्ट में घाटा केवल आर्थिक और सांसारिक मामलों में नहीं होता बल्कि सबसे बड़ा घाटा आत्मिक व आध्यात्मिक घाटा है जो मनुष्य को आत्मिक व आध्यात्मिक परिपूर्णताओं को समझने से वंचित रखता है।अब सूरए अनआम की 21वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَى عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِآَيَاتِهِ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ (21)उससे बड़ा अत्याचारी कौन होगा जो ईश्वर पर झूठा आरोप लगाए या उसकी निशानियों को झुठलाए? निसंदेह अत्याचार (कभी) सफल नहीं होंगे। (6:21)पिछली आयतों में काफ़िरों, अनेकेश्वरवादियों तथा उनकी भ्रष्ट आस्थाओं के वर्णन के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है। सबसे बड़ा अत्याचार, विचार और आस्था का अत्याचार है कि मनुष्य बिना किसी तर्क और कारण के, किसी वस्तु या मनुष्य को ईश्वर का समकक्ष ठहराए या मनुष्यों के मार्गदर्शन के लिए उतारी गयी ईश्वर की आयतों को झुठलाए।यद्यपि सामूहिक अत्याचार और लोगों के अधिकारों की अनदेखी बहुत बुरा और अप्रिय कार्य है परंतु यदि गहराई से देखा जाए तो सभी सामाजिक व सामूहिक अत्याचारों की जड़ एक प्रकार का कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद है जो लोगों के अधिकारों के हनन का मार्ग प्रशस्त करता है।यदि कोई केवल ईश्वर की उपासना करे और स्वयं को उसका बंदा माने तथा ईश्वरीय पैग़म्बर की शिक्षाओं का पालन करे तो कदापि दूसरों के अधिकारों का हनन नहीं करेगा क्योंकि उसे ज्ञात होगा कि अन्य लोगों के अधिकारों का सम्मान करना, सभी ईश्वरीय धर्मों की सबसे महत्त्वपूर्ण सिफ़ारिशों में से एक है।अंत में आयत कहती है कि अलबत्ता अत्याचारियों को यह नहीं सोचना चाहिए कि अपने उन ग़लत विचारों और व्यवहार द्वारा वे सफल हो जाएंगे और उन्हें कल्याण प्राप्त हो जाएगा, क्योंकि अत्याचार का अंत कभी भी भला नहीं होता।इस आयत से हमने सीखा कि कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद सभी अत्याचारों व अतिक्रमणों का स्रोत हैं।झूठ मनुष्य को सफलता व कल्याण प्राप्ति क मार्ग पर चलने से रोक देता है।आइये अब सूरए अनआम की 22वीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَيَوْمَ نَحْشُرُهُمْ جَمِيعًا ثُمَّ نَقُولُ لِلَّذِينَ أَشْرَكُوا أَيْنَ شُرَكَاؤُكُمُ الَّذِينَ كُنْتُمْ تَزْعُمُونَ (22)और उस दिन जब हम उन सबको एकत्रित करेंगे फिर अनेकेश्वरवादियों से कहेंगे कि कहां हैं वे, जिन्हें तुम ईश्वर का समकक्ष समझते थे? (6:22)अनेकेश्वरवादियों को न केवल संसार में कल्याण प्राप्त नहीं होगा बल्कि प्रलय में भी उनके हाथ ख़ाली होंगे और उनका कोई शरणस्थल नहीं होगा क्योंकि वे संसार में जिन शक्तियों पर भरोसा करते थे और उन्हें ईश्वर की भांति प्रभावी और शक्तिमान समझते थे, प्रलय में उनके पास कोई शक्ति नहीं होगी और वे किसी की कोई सहायता नहीं कर सकेंगे बल्कि उन्हें स्वयं सहायता की आवश्यकता होगी।इस आयत से हमने सीखा कि संसार में वस्तुओं या लोगों पर भरोसा नहीं करना चाहिए क्योंकि प्रलय में वो हमें कोई लाभ नहीं पहुंचा सकेंगे।अनेकेश्वरवाद, कल्पना और विचार के अतिरिक्त कुछ नहीं। इसका काल्पनिक और निराधार होना प्रलय में सिद्ध होगा।आइये अब सूरए अनआम की 23वीं और 24वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं। ثُمَّ لَمْ تَكُنْ فِتْنَتُهُمْ إِلَّا أَنْ قَالُوا وَاللَّهِ رَبِّنَا مَا كُنَّا مُشْرِكِينَ (23) انْظُرْ كَيْفَ كَذَبُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ وَضَلَّ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَفْتَرُونَ (24)फिर उनके पास केवल यह भ्रष्टता रह जाएगी कि वे यह कहें कि ईश्वर की सौगन्ध जो हमारा पालनहार है, हम अनेकेश्वरवादी नहीं थे। (6:23) (हे पैग़म्बर!) देखिए कि किस प्रकार वे अपने आपको झुठलाते हैं और ईश्वर पर वे जो झूठा आरोप लगाते थे वह किस प्रकार उनके हाथ से निकल गया। (6:24)ये आयतें प्रलय में ईश्वरीय न्यायालय में अनेकेश्वरवादियों की उपस्थिति के दृश्य को रेखांकित करते हुए कहती है कि वे लोग जो संसार में अपने काल्पनिक देवताओं पर ही भरोसा करते थे, निश्चेतना की निंद्रा से जाग जाएंगे और वास्तविकता को समझ लेंगे परंतु उनके पास भागने का कोई मार्ग नहीं होगा और उन्हें कहना ही पड़ेगा कि हम इन काल्पनिक देवताओं से विरक्त हैं और अनेकेश्वरवादी नहीं हैं। हम भी तुम्हारी भांति एकमात्र ईश्वर को अपना पालनहार मानते हैं।वही अनेकेश्वरवादी जो संसार में ईश्वर की सच्ची निशानियों को झुठलाते थे और उनका इन्कार करते थे आज प्रलय में अपने ग़लत मार्ग को झुठलाएंगे और उससे विरक्त हो जाएंगे परंतु इसका कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि समय बीत चुका होगा।इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय में न क्षमायाचना काम आएगी न सौगंध। न ग़लत विचारों का कोई लाभ होगा न सत्य स्वीकार करने का।ऐसा काम नहीं करना चाहिए कि प्रलय में हमें अपने ही विरुद्ध बात करने पर विवश होना पड़े।संसार में मनुष्य जिन वस्तुओं पर भरोसा करता है वह सब प्रलय में समाप्त हो जाएंगी और मनुष्य के पास, ईश्वर के शरण के अतिरिक्त कोई ठिकाना नहीं होगा।