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    सूरए अनआम, आयतें 25-28, (कार्यक्रम 199)

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    आइये सूरए अनआम की 25वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَمِنْهُمْ مَنْ يَسْتَمِعُ إِلَيْكَ وَجَعَلْنَا عَلَى قُلُوبِهِمْ أَكِنَّةً أَنْ يَفْقَهُوهُ وَفِي آَذَانِهِمْ وَقْرًا وَإِنْ يَرَوْا كُلَّ آَيَةٍ لَا يُؤْمِنُوا بِهَا حَتَّى إِذَا جَاءُوكَ يُجَادِلُونَكَ يَقُولُ الَّذِينَ كَفَرُوا إِنْ هَذَا إِلَّا أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ (25)(हे पैग़म्बर!) कुछ अनेकेश्वरवादी आपकी बातें सुनते हैं परंतु हमने उनके हृदयों पर पर्दे डाल दिए हैं ताकि वे समझ न सकें और उनके कानों को भी बहरा बना दिया है। और यदि ये लोग सभी निशानियों को देख लें तब भी ईमान नहीं लाएंगे। यहां तक कि जब आपके पास आएंगे तब भी बहस करेंगे और काफ़िर कहेंगे यह (क़ुरआन) पुराने लोगों की कहानियों के अतिरिक्त कुछ और नहीं। (6:25)यह आयत कुछ लोगों की हठधर्मी प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है। ये लोग अपनी ग़लत आस्थाओं और विचारों में इतने कट्टर हैं और सत्य विचारों व आस्थाओं के प्रति इतना द्वेष और हठधर्म रखते हैं कि न केवल सच बात को नहीं सुनते और स्वीकार नहीं करते बल्कि उससे शत्रुता करने लगते हैं और क़ुरआने मजीद को क़िस्से कहानी की पुस्तक बताने लगते हैं।यद्यपि इस आयत में ऐसे लोगों द्वारा सत्य न सुनने और स्वीकार न करने को ईश्वर से संबंधित बताया गया है परंतु वास्तव में यह उनके कर्मों के परिणाम की ओर संकेत है। दूसरे शब्दों में अपनी ग़लत इच्छाओं के पालन ने उनकी सोच समझ पर ऐसा पर्दा डाल दिया है मानो ईश्वर ने उन्हें सोचने, समझने तथा सुनने की क्षमता के बिना ही पैदा किया है।ईश्वर ने मनुष्य की बुद्धि को एक साफ़ सुथरे दर्पण की भांति बनाया है जिसमें जो बात जैसी है, वैसी ही दिखाई पड़ती है परंतु पाप, बुराई, अपवित्रता, हठधर्म और आंतरिक इच्छाओं के पालन के कारण इस दर्पण पर धूल की एक मोटी तह बैठ जाती है और उसे ऐसा बना देती है कि जिसमें हर वस्तु टेढ़ी मेढ़ी दिखाई देने लगती है। स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति में मनुष्य न केवल सत्य को स्वीकार नहीं करेगा बल्कि उससे शत्रुता भी करने लगेगा।इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआन का पढ़ना और सुनना उस समय मूल्यवान है जब वो हृदय पर प्रभाव डाले वरना अनेकेश्वरवादी भी स्वयं पैग़म्बर की ज़बान से क़ुरआन की आयतें सुनते थे।क़ुरआन व इस्लाम के तर्क के समक्ष, काफ़िरों के पास कोई तर्कसंगत उत्तर नहीं है अतः वे आरोप, अनादर और हठधर्म की शरण लेते हैंआइये अब सूरए अनआम की 26वीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَهُمْ يَنْهَوْنَ عَنْهُ وَيَنْأَوْنَ عَنْهُ وَإِنْ يُهْلِكُونَ إِلَّا أَنْفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ (26)अनेकेश्वरवादी लोगों को क़ुरआन (की आयतें सुनने) से रोकते हैं और स्वयं भी उससे दूर भागते हैं (परंतु उन्हें जान लेना चाहिए कि) वे स्वयं के अतिरिक्त किसी को तबाह नहीं कर रहे हैं और वे इसे नहीं समझते। (6:26)पिछली आयत में पैग़म्बर के समक्ष अनेकेश्वरवादियों के हठधर्म और द्वेष का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि वे न केवल यह कि पैग़म्बर से दूर भागते हैं ताकि उनके मुख से क़ुरआन की आयतें न सुन सकें, बल्कि वे दूसरों को भी इस काम से रोकते हैं ताकि वे न क़ुरआन सुनें और न उसे स्वीकार करें, जबकि सत्य का सूर्य सदैव बादलों के पीछे छिपा नहीं रहता, वो अवश्य ही सामने आता है और असत्य के अंधियारों को मिटा देता है।अतः अन्य लोगों को सत्य के मार्ग से विचलित करने का पथभ्रष्ठों का प्रयास विफल रहता है और परिणाम स्वरूप वे स्वयं तबाह और बर्बाद हो जाते हैं परंतु वे स्वयं इस वास्तविकता को नहीं समझ पाते और इसे स्वीकार करने के लिए तैयार भी नहीं होते।इस आयत से हमने सीखा कि हमें इस बात की ओर से सचेत रहना चाहिए कि अभिव्यक्ति और विचारों की स्वतंत्रता के नाम से जो लोग कुफ़्र और अधर्म का मार्ग अपनाते हैं वे कदापि इस बात की अनुमति नहीं देंगे कि सच बोलने वाले स्वतंत्रतापूर्वक अपनी बात कहें कि सत्य की खोज में रहने वाले उसे सुनकर मार्गदर्शन प्राप्त करें।कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद के नेता, दूसरों को बर्बाद करने के स्थान पर स्वयं अधिक तबाह होते हैं परंतु वे स्वयं उसे समझ नहीं पाते।आइये सूरए अनआम की 27वीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَلَوْ تَرَى إِذْ وُقِفُوا عَلَى النَّارِ فَقَالُوا يَا لَيْتَنَا نُرَدُّ وَلَا نُكَذِّبَ بِآَيَاتِ رَبِّنَا وَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ (27)(हे पैग़म्बर!) यदि आप देखते हैं कि किस प्रकार अनेकेश्वरवादियों को (नरक की) आग के सामने खड़ा किया गया है तो वे कहते हैं कि काश हमें (एक बार फिर संसार में) पलटा दिया जाता और हम अपने ईश्वर की निशानियों को न झुठलाते और ईमान वालों में शामिल हो जाते। (6:27)पिछली आयतों में, ईश्वरीय पैग़म्बरों के निमंत्रण के मुक़ाबले में कुछ लोगों के ग़लत व्यवहार का वर्णन किया गया। यह आयत प्रलय में उनके बुरे अंत की ओर संकेत करते हुए कहती है।उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि उनके कर्म निरुत्तर रहेंगे, बल्कि कड़ा ईश्वरीय दंड उनकी प्रतीक्षा में है। यह दंड ऐसा होगा जो उन्हें निश्चेतता की निंद्रा से जगा देगा परंतु अब कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि संसार में वापसी और क्षतिपूर्ति का कोई मार्ग नहीं होगा, यद्यपि वे गिड़गिड़ाकर यह इच्छा प्रकट करेंगे परंतु उनकी यह इच्छा स्वीकार नहीं होगी।संसार में वापसी की इच्छा ऐसी इच्छा है जिसे बुरे कर्म करने वाले मरते समय, क़ब्र में जाते समय और प्रलय में उपस्थित होने के समय बार-2 दोहराएंगे परंतु उनकी यह इच्छा कदापि पूरी नहीं होगी।इस आयत से हमने सीखा कि जब तक हम जीवित हैं और समय तथा अवसर है, हमें अतीत के पापों की क्षतिपूर्ति और भविष्य के सुधार की चिंता में रहना चाहिए क्योंकि मृत्यु के पश्चात लौटने की कोई संभावना नहीं है।प्रलय का दिन पछतावे का दिन होगा। ऐसे कर्मों पर पछतावा जो होना चाहिए था परंतु नहीं हुआ और ऐसे कर्मों पर पछतावा जो नहीं होना चाहिए थे, परंतु हुआ।आइये सूरए अनआम की 28वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।بَلْ بَدَا لَهُمْ مَا كَانُوا يُخْفُونَ مِنْ قَبْلُ وَلَوْ رُدُّوا لَعَادُوا لِمَا نُهُوا عَنْهُ وَإِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ (28)बल्कि उनके लिए वह सब स्पष्ट हो गया है जो ये पहले से (संसार में) छिपा रहे थे। और यदि उन्हें (संसार में) पलटा भी दिया जाए, तब भी ये वही करेंगे, जिससे उन्हें रोका गया और ये झूठ बोलने वाले हैं। (6:28)यह आयत मनुष्य के व्यवहार की पहचान के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु की ओर संकेत करते हुए कहती है। कभी-2 मनुष्य अपने आप को भी धोखा देता है और अपनी अंतरात्मा और प्रवृत्ति पर पर्दा डालना चाहता है। वो ऐसे बुरे कर्म करता है जिनकी बुराई को स्वयं भी समझता है परंतु इस कारण से कि उसकी अंतरात्मा उसे कचोके न लगाए, अनभिज्ञ बनने का प्रयास करता है।क़ुरआने मजीद ने अनेक आयतों में कहा है कि प्रलय में बुरे कर्म करने वालों के समक्ष उनके पापों की बुराई स्पष्ट हो जाएगी। और जिस बात को वो संसार में छिपाने का प्रयास करते थे, प्रलय में जगज़ाहिर हो जाएगी।यह आयत कहती है कि वे संसार में वापसी की इच्छा इसलिए करेंगे कि उनके पापों की बुराई उनके लिए स्पष्ट हो जाएगी, परंतु उनकी ये चेतना अस्थाई और जल्द ही समाप्त होने वाली है तथा यदि उन्हें दोबारा संसार में भेज दिया जाए तो उनकी बुरी प्रवृत्ति उन्हें फिर से पापों की ओर ले जाएगी।इस आयत से हमने सीखा कि अवसर उन लोगों को दिया जाता है जिनके सुधार की आशा होती है जैसे संसार में पाप करने वालों को तौबा अर्थात प्रायश्चित का अवसर, परंतु जिन लोगों के हृदय और आत्मा में बुराई बैठ चुकी हो वे नरक देखने के पश्चात भी नहीं सुधरेंगे।जिन बातों को हम संसार में अपनी अंतरात्मा और अन्य लोगों से छिपाते हैं वे प्रलय में स्पष्ट हो जाएंगी।